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किसान अन्नदाता
किसान अन्नदाता
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© Shyam Kunvar Bharti

Drama Inspirational

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बिरजू यादव रामपुर गांव का एक छोटा सा किसान है। खेती बाड़ी में में नुकसान होने की वजह से वह पंजाब चला जाता है और वहाँ एक बड़े किसान मनजीत सिंह के कृषि विभाग में नौकरी करने लग जाता है जहां उसे रहने-खाने की सुविधा के साथ पाँच हज़ार प्रतिमाह तनख्वाह पर काम मिलता है। मगर उसका मालिक उसे नियमित रूप से उसकी तनख्वाह नहीं देता है। एक दिन उसके गांव से फोन आता है और पता चलता है कि, उसकी बड़ी बेटी प्रमिला की शादी उसकी पत्नी ने तय कर दिया है और कहा कि, दो लाख रूपय खर्च करना है आप अगले महीने पैसा लेकर जल्दी से घर आ जाइए। बिरजू जब अपने मालिक मनजीत से बात करता है और बताता है कि, अगले महीने उसकी बेटी की शादी है। आप इस महीने के अंत तक मेरा पूरा हिसाब किताब कर दें ताकि मैं अगले महीने अपनी बेटी की शादी कराने अपने गांव जा सकूं, शादी के बाद मैं फिर अपने काम पर आ जाऊंगा लेकिन उसका मालिक कहता है कि, अभी उसके पास पैसे नहीं है। फिर भी कोशिश करेगा। महीने के अंत में बिरजू फिर अपने मालिक को अपनी बकाया तनख्वाह देने की बात करता है। उसका मालिक अगले दिन देने की बात करता है। बिरजू हिसाब लगता है कि, एक साल में सब काट-छांट कर उसकी तनख्वाह लगभग पचास हज़ार रूपय निकल रही है। अगले दिन उसके मालिक ने उसके हाथ में मात्र पाँच हज़ार रूपय दिया और कहा कि, अभी पैसे का इंतजाम नहीं हो पाया। तुम यह रुपए रख लो, किसी तरह अपनी बेटी की शादी निपटा आने के बाद मैं तुम्हारी बाकी रुपयों का इंतजाम कर दूंगा। बिरजू पाँच हज़ार रूपय ले कर कर रोने लगता है। वह अपने मालिक से काफी मिन्नतें करता है कि, आखिर वह पाँच हज़ार में अपनी बेटी की शादी कैसे करेगा। उसे कोई कर्जा भी नहीं देगा। किसी तरह उसकी पूरी तनख्वाह दे देते। लेकिन उसका मालिक बाकी रुपए देने में असमर्थता जताता है। मजबूर होकर बिरजू पाँच हज़ार रूपय लेकर अपने गांव चला जाता है। उसकी बातें सुनकर उसकी पत्नी अपना सिर पकड़ लेती है। मालती कहती है कि, कितनी मुश्किल से पढ़ा-लिखा लड़का तैयार किया था। उनकी काफी खेती-बारी और मकान है। लड़का आटा और तेल मिल चलाता है। हमारी बेटी वहां जाकर खुश रहती। दहेज के पचास हजार और शादी विवाह में एक लाख खर्चा है। अब बोलिए आखिर इतने कम पैसे में हम अपनी बेटी का शादी कैसे करेंगे। पूरे समाज में हमारी काफी बेज्जती हो जाएगी। लड़का हाथ से निकाल जाएगा। पत्नी मालती की बात सुनकर बिरजू निरुत्तर हो जाता है।

बिरजू अपनी पत्नी को अपने मालिक से हुई बातचीत के बारे में बताता है और कहता है कि तुम चिंता मत करो मैं रामचंद्र साह (गांव के महाजन) से कर्जा ले लूंगा। अगर नहीं माना तो अपनी एक खेत गिरवी रख दूंगा। तुम अपनी बेटी की शादी की का इंतजाम करो। इतना कहकर बिरजू अपने घर से निकल जाता है। रामचंद्रा साव ने कहा, देखो में तुम्हें डेढ़ लाख रूपय दे सकता हूं लेकिन तुम्हें अपने खेत मेरे पास गिरवी रखना पड़ेगा। प्रति महीना पाँच प्रतिशत ब्याज लगेगा। जब तक तुम रूपय नहीं चुकाओगे, मैं तुम्हारे खेत में खेती करूंगा। अगर मंजूर है तो इकरारनामे पर हस्ताक्षर करो और अपने खेत का कागजात मुझे लाकर दे दो। बिरजू ने उसकी उसकी सभी शर्तें मान लिया। घर से लाकर उसने अपनी जमीन का पेपर उसे देते हुए कहा कि, एक विनती मेरी भी सुन लो साव जी। इस खेत पर यदि आप चाहें तो मैं खेती करूंगा और उसकी आय का आधा हिस्सा आपको दूंगा। रामचंद्र उसकी बात मान लेता है। बिरजू पैसे लाकर अपनी पत्नी को देता है और कहता है कि तुम अब शादी की तैयारी शुरू करो बाकी शादी के बाद देखेंगे। बिरजू अपनी बेटी की शादी बड़ी धूमधाम से कराता है। बेटी की विदाई के बाद बिरजू अपने बाकी खेतों और महाजन को बंधक दिए खेतों में खेती करने की योजना बनाता है।

उसकी पत्नी मालती शंका व्यक्त करते हुए कहती है कि, अगर इस बार भी खेती से नुकसान हो गया तो हम अपना बंधक कैसे छुड़ा पाएंगे, ब्याज सहित कर्जा कैसे चुकाएंगे। देखो प्रमिला की मां, इसके अलावा मेरे पास और कोई उपाय नहीं है। बाकी सब भगवान पर छोड़ दो। ठीक है पूंजी के लिए मेरे पास विवाह के खर्चे से दस हज़ार रूपय बच गए हैं। अगर और पूंजी की जरूरत पड़ेगी तो मैं अपना गहना भी बेच दूंगी। नहीं प्रमिला, गहने बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बिरजू बाजार से बीज और खाद खरीद कर लाता है। गांव के चार मजदूरों से बात करता है। वे लोग उसके खेत में मजदूरी करने को तैयार हो जाते हैं। बिरजू गांव के ही ट्यूबवेल मालिक से बात कर लेता है कि जब भी उसे पानी की जरूरत पड़ेगी वह उसे पानी देगा उसका जो भी खर्चा आएगा, वे देगा। बिरजू गेहूं, चना, मटर, सरसो और कुछ सब्जियों का बीज लाता है। मगर बिजली की कमी के कारण पर्याप्त सिंचाई नहीं हो पाती है। फिर भी उसकी पैदावार अच्छी होती है।

बिरजू उस बहककर महाजन के कुछ पैसे चुकाता है और कुछ घर के खाने के लिए अनाज रख लेता है। अगली बार वह धान, मकई, गन्ना अरहर और फिर सब्जियाँ लगाता है। धान के पौधे में बीमारी लग जाती है वह भागा-भागा किसी विभाग के कार्यालय जाकर अपनी समस्या सुनाता है। कृषि ऑफिसर उसके खेत पर आकर उसकी फसलों की जांच कर उसका इलाज का उपाय बताते हैं। धान के पौधों में जल्दी सुधारा आ जाता है। इस बार बीमारी से धान की खेती बच तो जाती है मगर बरसात कम होने की वजह से फसलों का नुकसान हो जाता है। अगली खेती के लिए उसी के पास पूंजी का आभाव होता है। खेतों में गोबर व खाद देने के लिए और डीजल पंप सेट खरीदने के लिए बैंक से दो लाख तक का ऋण ले लेता है। इस तरह उसके सिर पर ऋण चढ़ जाता है। इस बार उसे गन्ने की फसल भरपूर होती है। वो उसे भाड़े के ट्रैक्टर द्वारा चीनी मिल जा कर बेचता है वहां उसे उसकी गन्ने का वजन और मूल्य की रसीद मिल जाता है लेकिन पैसों के लिए अगले महीने का समय दिया जाता है। अगले महीने का बकाया पैसा नहीं मिल पाता है। वह थोड़ा अनाज बेच कर बैंक का ब्याज चुकाता है, पर मूलधन की राशि का हिस्सा नहीं दे पाता है। दोनों गायों से दूध बेच कर अपने घर का खर्च चलाता है मगर उसे उसके ऋण की चिंता सवार रहती है। घबराकर कहीं भाग जाने या फांसी लगाकर जान देने की बात सोचने लगता है। तभी नई सरकार आती है और सारे किसानों के एक लाख तक के ऋण माफ कर देती है। फिर भी उसके बैंक के एक लाख और महाजन के देस्द लाख रूपय भरने की चिंता बनी रहती है। तभी एक दिन उसका दोस्त दिलीप दास मिलता है। बिरजू उसे अपने समस्या बताता है, यार एक तो खेती से लागत से भी कम आमदनी होती है। दूसरी तरफ महाजन और बैंक का कर्ज। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा क्या करूं, कहां जाऊं। दिलीप नि उसे समझाते हुए कहा, देखो यार बिरजू यह कोई नया या बड़ी समस्या नहीं है। इस तरह लगभग सभी किसान परेशान है लेकिन भाग जाना या जान देना समस्या का कोई समाधान नहीं है। इससे निपटने के लिए तुम्हें अपनी आमदनी का अलग से कोई उपाय करना होगा। जैसे कोई व्यवसाय या कोई नौकरी। तब तुम्हारी खेती से तुम्हें फायदा मिल सकता है। किसी भी व्यवसाय करने के लिए तो मेरे पास पूंजी नहीं है सरकार। नौकरी तो मिलेगी नहीं, मैंने तो मैट्रिक पास नहीं किया है। तुम तो कचहरी में काम करते हो तुम ही कुछ उपाय करो, बिरजू ने अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए कहा। एक काम हो सकता है, मेरे वकील साहब के दोस्त की एक फैक्ट्री लग रही है। वहां दरबान की जरूरत है मैं बात करता हूं। अगर बात बन गई तो तुम्हें रात की ड्यूटी लगवा दूंगा। महीने के सात हज़ार तनख्वाह मिल जाएंगे। इससे तुम्हें बहुत राहत मिलेगी। सुनकर बिरजू खुश होते हुए बोला, यार अगर ऐसा हो गया तो मेरे अच्छे दिन जल्दी ही आ जाएंगे।

कुछ ही दिनों में बिरजू को आचार फैक्टरी में दरबान की नौकरी मिल जाती है। धीरे-धीरे बिरजू अपनी खेती को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया। अपनी तनख्वाह से वह महाजन और बैंक की किस्त चुकाने लगा और कृषि से पैदा हुई फसलों से उसने अपने साधन बढ़ाना शुरू किया। उसके दोस्त ने पैरवी करवा कर उसके खेत के पास में तालाब पास करा दिया। जिससे उसे सिंचाई एवं पशुपालन में सुविधा मिल गई। उसने एक दर्जन उच्च नस्ल की बकरियां और पांच गाय और खरीद ली जिससे उसकी आमदनी और बढ़ने लगी। सरकारी विभाग द्वारा किसानों को उन्नत कृषि का प्रशिक्षण दिया जा रहा था जिसमें उसने भी भाग लिया। उसने प्रशिक्षण के दरमियान ही सीखा कि, कैसे कृषि के साथ पशु पालन, मधुमक्खी पालन, मछली पालन और फलदार वृक्ष, सब्जी उत्पादन और मशरूम आदि पैदा कर किसान अधिक से अधिक अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं। साथ बेरोजगार लोगों को रोजगार भी देबिरजू ने अपने तालाब में मछली पालन शुरू कर दिया जिससे उसे काफी फायदा हुआ। उसने सभी कृषि संबंधित विभागों से अपने दोस्त के प्रयास से मदद लेना प्रारंभ किया और उसका लाभ उठाने लगा बैंक और महाजन का कर्जा चुका कर बिरजू ने बैंक की मदद से एक ट्रैक्टर ले लिया। उसने अपना गिरवी खेत वापिस ले लिया। उसने दूसरे किसान को मिलाकर किसान अप्रेंटिस सोसाइटी बना लिया। इसके माध्यम से दर्जनों किसान मिलकर सरकारी सुविधा का लाभ उठाते हुए सामूहिक कृषि करने लगे। इस तरह बिरजू एक बड़ा और प्रतिष्ठित किसान बन गया। सब ने मिलकर उसे किसान संघ का अध्यक्ष बना दिया। सरकार ने उसके सराहनीय कार्य हेतु कई सम्मान और पुरस्कार दिया। बिरजू ने अपना एक फॉर्म हाउस खोल लिया जिसमें पचास मजदूरों को उसने काम पर लगाकर रोजगार दिया। एक बार वह किसी काम से पंजाब गया था। काम खत्म करके उसने सोचा, चलो जरा अपने पुराने मालिक से मिल लूं। करीब दस वर्षों के बाद वह अपने मालिक के घर पहुंचा। उसकी ठाठ-बात और पहनावा देखकर उसका मालिक मनजीत सिंह उसे पहचान नहीं पाया। जब बिरजू ने उसे अपना परिचय दिया, तो तो मंजीत उसे देखता ही रह गया। अरे बिरजू, यह तुम हो मैं तुम्हें पहचान हालचाल पूछने पर उसके मालिक ने बताया कि, उसके जाने के बाद उसे उसके ही कर्मचारियों ने उसे लाखों रुपए का गबन कर लिया। उसके सिर पर कर्जा चढ़ गया जिसके लिए उसे अपने कई खेत बेचने पड़े। अभी उसका बड़ा बुरा हाल है। फिर उसने अफ़सोस करते हुए कहा, तुम्हारे जैसा ईमानदार और मेहनती आज तक मुझे आदमी नहीं मिला। लेकिन मैंने ही तुम्हारे साथ इंसाफ नहीं किया। मैंने तुम्हारी बेटी की शादी के समय भी तुम्हारा तनख्वाह नहीं दिया जिसकी मुझे गुरु साहब ने सजा दिया है। मुझे माफ कर दो बिरजू। इतना कहकर मंजीत ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। अरे नहीं मालिक, आप मेरे सामने हाथ मत जोड़िए। आपकी अपनी गलती का एहसास आपको हो गया हो गया है, यही बहुत है। मनजीत ने कहा मैं प्रायश्चित करना चाहता हूं। इसके लिए तुम्हें मेरी मदद करनी होगी। मेरा एक ही बेटा था वह भी नालायक निकल गया। मेरी उम्र भी बढ़ गई है। मुझसे अब भागदौड़ भागदौड़ नहीं हो पाती है। मैं तुम्हें अपने फॉर्म का बराबर का हिस्सेदार बनाना चाहता हूं। अब तुम मेरे फार्महाउस को संभालो। आधा हिस्सा से मैं अपने और अपने परिवार का गुजारा कर लूंगा। बिरजू के लाख मना करने के बाद भी मनजीत कोर्ट से कागजात तैयार करवा कर अपना साइन कर बिरजू को थमा दिया। बिरजू वहां अपने एक पुराने दोस्त रंजीत सिंह को उस फॉर्म हाउस का मैनेजर बनाकर काम समझा कर वापस अपने गांव आ गया। बिरजू महीने में दो-तीन बार फॉर्म हाउस जा कर वहाँ का काम समझ लिया करता था। यहां भी उसकी खेती का काम बढ़ गया और उसने लगभग ढाई सौ मजदूरों को काम पर लगा दिया। जो बिरजू घबराकर अपनी जान देना चाहता था वही अपनी मेहनत लगन और अपने दोस्त दिलीप की मदद से दूसरे किसानों का अन्नदाता बन गया था।

Farmer Life Poor

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