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पुरे चाँद की अधूरी कहानी
पुरे चाँद की अधूरी कहानी
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© Asha Pandey 'Taslim'

Romance

5 Minutes   14.3K    23


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पूरनमासी का चाँद आता ही क्यों है ?ये सवाल प्रिया को हर माह खुद से करते जाने कितने साल बीत गये है। जाने क्या है इस सवाल में जो न प्रिया पूछते खुद से थकती है, न पूरनमासी का चाँद थकता और न ही कहानी उसकी पूरी होती।

आज भी चाँद अपने उरूज पर आज भी उसकी चांदनी जी जला रही ,कोई न समझ सकता कि सफ़ेद चाँदनी कितनी सुर्ख़ होती जब ये आग बन सीने में उतरती है, हर माह दर माह वर्षों से इस कैफ़ियत से गुजरते अब प्रिया थकने लगी थी ,लेकिन चाँद और चांदनी न थकते थे न थके और न हर माह का सवाल ही थकता थी।

आज फ़िर वो शाम से बेचैन थी, कुछ ही देर में चाँद फ़िर इठलायेगा नीले गगन पर और उसे उसके उस अतीत की याद में बेचैन करेगा जिसे उसने देखा भी नहीं लेकिन जो चांदनी की तरह छिटका पड़ा है उसके पुरे वज़ूद पर। लगभग 20 साल तो हो ही गए होंगे न प्रिया ने खुद से सवाल किया और अगर आज के इस हाईटेक जमाने में उसे एक बार ढूँढ पाती वो तो क्या उसे पहचान लेगी ? उसका नाम? वो दिखता कैसा होगा अब? अब! तब भी तो नहीं देखा था उसे, एक आवाज़ ही तो उसकी पहचान थी प्रिया के लिये लेकिन हाँ वो सब जानता था प्रिया के बारे में कभी कभी तो उसके पहने कपड़े तक बता देता था वो।

कैसी दीवानगी थी वो जो एक शादीसुदा ज़िन्दगी में अचानक घुसपैठ कर गया था, और शायद आज भी है।

प्रिया चाय का कप लिये चुपचाप छत पर अकेली टहल रही थी और चाँद से जैसे सवाल पूछ रही हो 'क्या तुम ने उसे देखा था, क्या आज भी उसे देखते हो, कैसा था कैसा है'....कितनी बेचैनी उफ़्फ़्फ़ और क्यों ? उसने तो देखा भी नहीं था उसे न कभी कोई खिंचाव ही महसूस हुआ था तब? फ़िर अब या तब से ही जब उसने आख़री बार फोन किया था तब से ही कुछ जो अंदर मन में जम गया कहीं वो न होकर भी बस गया हो जैसे।

ससुर जी के श्राद्ध से लौटी ही तो थी वो गोद में 1 साल का बेटा, टूटी हुई सास और बिखरे हुए बेटे को लेकर, उसी ट्रेन में वो भी है उसे कहाँ पता था।

घर आ कर ज़िन्दगी कुछ कुछ पटरी पे लौट रही थी कि वो पहला कॉल आया 'नमस्कार अब कैसे है घर पे सब'...प्रिया को यही लगा कोई जानपहचान का है गमी में कॉल किया है उसने तफ्सील से सारी बात बताई, फोन रखने से पहले पूछा 'आप का नाम शाम को इन्हें क्या बताऊँ' एक पल को ठहर के आवाज़ आई 'हम खुद कॉल कर लेंगे आप परेशान न हो'...इसमें उलझन की कोई बात भी तो न थी , लेकिन ये तो शुरुआत थी अब तो रोज़ कॉल आने लगा, प्रिया ने व्यस्त पति से भी बताया इस बारे में जवाब मिला 'अरे कोई मज़ाक कर रहा है, रुको देखते है' जब दिन में फ़ोन का सिलसिला बढ़ गया तब घर वाले भी परेशान रहने लगे, लेकिन शाम 7 बजे फोन आना बन्द न हुआ, कभी कभी तो वो आवाज़ हाँ नाम कोई था ही नहीं ,प्रिया को किसी किसी दिन ये भी बता देता कि 'प्रिया आज आप बहुत प्यारी लग रही थी, उलझे बालों में भी 'तो किसी दिन 'क्या हुलिया बनाया है प्रिया इतनी दूर से आया देख के लगा अभी ले कहीं दूर तुम्हे चला जाऊं'....अजीब हालत होती जा रही थी प्रिया की वक़ील पति दिन भर क्लाइंट्स आते उनमें वो कौन या कब आता, कभी कभी वो सोचती कैसे पहचान करूँ उसकी, बीमार हो गई इसी ख़ौफ़ में वो तब पति ने सोचना शुरू किया, एक रोज़ 7 बजे खुद ही फोन रिसीव कर के कहा 'ओ भाई है कौन और ये क्या तरीका है क्यों मेरी बीवी के जान के दुश्मन बने हो दोस्ती करनी है तो सामने आओ, या बख़्श दो मेरे बच्चे की माँ को'...कुछ दिन कोई फोन नहीं आया प्रिया खुश हुई पर अंदर कहीं 7 बजते ही इंतज़ार रहता फोन के आवाज़ का पर अब फोन कहाँ आना था सो नहीं आया, कुछ दिन बाद अचानक एक फोन आया 'हेल्लो प्रिया कैसी हो' एक पल को दिल जोर से धड़का प्रिया का इस आवाज़ को वो नहीं भूल सकती कभी नहीं, लेकिन उसने कहा 'कौन किस्से बात करनी है आपको' .....कुछ पल का मौन और फ़िर उसने कहा 'प्रिया मैं दिल्ली चला आया हूँ तुम्हारी यादों से छुप कर, तुम खुश रहो ये दुआ, लेकिन क्या करूँ प्रिया जब भी पूरनमासी का चाँद देखता हूँ , सफ़ेद कुर्ते में ट्रेन की खिड़की से सर टिकाये दो आँखे मुझे दिखती है, उस पल वो किसी की बीवी या माँ नहीं थी, मेरे सपनों की वो लड़की थी जिसे मैं तलाश रहा था पागलों की तरह मैं उसी ट्रेन में चढ़ गया, कुछ ही देर में जान गया ये मेरे ही किसी अपने की बीवी है उसके बच्चे की माँ है लेकिन प्रिया दिल कुछ मानने को तयार नहीं था, बस एक झलक तुम्हे देखना और एक बार आवाज़ सुन लेना यही तो माँगा था न तुमसे' प्रिया दम साधे बीते 3 बरस की घटनाये याद करने लगी, उस रोज़ ट्रेन में किसी को याद करने की कोशिश करने लगी लेकिन सब व्यर्थ ।

उसकी चुप्पी को उस आवाज़ ने तोड़ा, 'आज 2 साल के बाद फोन किया है ये पूछने को कि क्या एक पल को भी मेरी याद आई तुम्हे?'..प्रिया ने झट से जवाब दिया 'न क्यों आये ? हो कौन और जिसे जानती नहीं देखा नहीं मिली नहीं, नाम तक न पता उसे क्यों याद करने लगी, घर बच्चा पति बहुत कुछ है याद करने को'....एक आह के संग उसने कहा' हाँ प्रिया मैं हूँ ही कौन और क्यों हूँ ये भी सही , तुम मेरा पूरा चाँद हो और मैं तुम्हारा अधूरा हिस्सा भी नहीं, अब कभी फोन नहीं करूँगा प्रिया खुश रहना बस पूरनमासी के चाँद को रात भर अपने आसुंओं से धोता रहूंगा पूरी उम्र, खुश रहना तुम'...और वो आवाज़ ग़ुम हो गई लेकिन पूरनमासी का चाँद आज भी ...

आवाज़ फ़ोन ट्रेन

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