ना भूलने वाली यादें

ना भूलने वाली यादें

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जीवन में मैंने पहले कभी नहीं जाना ना समझा कुछ, मगर कहते हैं न वक्त और हालात हमेशा हमें अग्रसर करते हैं, अनजाने पल में कुछ कर गुजरने की।

मैं १२ वीं पास कर अपने आपको कुछ बड़ा कर गुजरने की चाहत रखती थी। मगर किस्मत को कहाँ मंजूर था ये सब, शायद किस्मत भी आजमाना चाहती थी एक नासमझ, नादान-सी लड़की के हौसले को।

खैर, १२ वीं के बाद मैंने बी फार्मा में एडमिशन के लिए सोचा, मगर पिता जी की जिम्मेदारियाँ बहुत थी फिर घर के हालात को देखते हुए मैंने पॉलिटेक्निक से फिर मेडिकल लाइन चुना। सफलता हासिल तो हुई मगर किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

२०१० की बात है, परीक्षा पास करने के बाद समय आ गया था एडमिशन लेने का। अभी घर में ये बातचीत ही चल रही थी कि कैसे क्या करना है, ( परिवार में मैं पहली लड़की थी जिसे बाहर पढ़ने जाने के लिए सब राजी हो गए थे) मगर एक सप्ताह में सारी घटनाएँ घटित हो गई, पिता जी की तबियत बहुत खराब होने की वजह से मैं इन हालातों में ही उलझ गई।

किसी एडमिशन का कोई होश ना था, जैसे-तैसे जगह-जगह डॉक्टर को दिखाने के बाद थोड़ा आराम मिला मगर समय गुजर चुका था एडमिशन का।

मेरे हालातों में मेरे समाने दो पहलू रख दिए थे जो मेरे लिए मेरे पिता ज्यादा महत्वपूर्ण थे। पिता जी को बहुत अफसोस भी था मगर उनको समझा देती थी कि आप चिंता ना कीजिए मैं फिर परीक्षा पास करके एडमिशन ले लूँगी। मगर पहले आप ठीक हो जाइए।

मेरे दिल में भी ये अफ़सोस था कि शायद इतना अच्छा मौका फिर मिलेगा या नहीं। उस साल मेरी पढ़ाई रुक गई। फिर

मैंने कभी मेडिकल लाइन से एडमिशन नहीं लिया। फिर मैंने बी.ए. और एम.ए. किया। मैं फिर अपने इस सपने की तरफ कभी मुड के देख ना पाई क्यूँकि जो हालात तूफान की तरह रुख बनाते हुए मेरे परिवार की तरफ बढ़ते गए उससे ही लड़ते-लड़ते अपने जीवन पर नजर ही ना डाल पायी।



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