STORYMIRROR

Kanchan Prabha

Abstract

3  

Kanchan Prabha

Abstract

ब्रज की होली

ब्रज की होली

1 min
259

कृष्ण गोपियां भर पिचकारी

ब्रज में खेले होली

उड़ते गहरे रंग कही तो

उड़ते हैं कहीं रोली

ओ भैया


ब्रज में खेले होली

नार नवेली करे ठिठोली

ओ भैया


ब्रज में खेले होली

रास रंग में सरोवार सब

मीठी बोले बोली

ओ भैया


ब्रज मे खेले होली

सुर्ख लाल अब नैन हुये हैं

पी कर भांग की गोली

ओ भैया


ब्रज में खेले होली

राधा भी अब बच ना पायी

फंस गई जाल मे भोली

ओ भैया

ब्रज में खेले होली।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract