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बरसो ना
बरसो ना
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© Shailly Shukla

Fantasy

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बारिश की मेहनत रंग लायी है,

उग आयीं हैं

सूखी, भूरी चट्टानों पे,

नन्ही हरी पत्तियाँ !


मिट्टी से उड़ रही है

सौंधी ख़ुशबू,

उजाड़ दरख़्तों पे

कोपलें फूटी हैं,

शांत झीलों में

हलचल मची है,

अनछुए पर्वतों से

बह रहे हैं प्रेम के झरने !


टूटे ख़्वाबों के शीशे

फिर जुड़ने लगे हैं,

लू की थपेड़ों से

राहत मिली है,

देखो ज़रा फिर से

ठंडी हवा चली है !


मन की कुंठा

मिट्टी के डेले सी

ढह गयी है,

बारिश हो तो

भीग ही जाती है

आत्मा!

कि बारिश और सूखा

साथ नहीं रहता !


आज..

तुम भी बरसो ना..!

सौंधी महक हरिययाली बूंदे

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