बेटियों की विदाई
बेटियों की विदाई
नारी जीवन की ये कैसी सच्चाई है,
वर्षों से रीत विदाई की चली आई है,
एक ही आंगन में पलते बेटा और बेटी,
फिर बेटियां ही क्यों हो जाती पराई हैं,
बेटा- बेटी दोनों ही समान फिर फर्क कहां है,
बंद मुट्ठी में किस्मत लेकर आते हैं दोनों जहां में,
एक मां की गोद में हंसते और खेलते बड़े होते हैं,,
एक समान ही अठखेलियां करते हैं दोनों आंगन में,
बेटियां पढ़-लिखकर आज अपने पैरों पर खड़ी हैं,
समानता असमानता की बातों में ध्यान नहीं देती हैं,
पर आज भी समाज बेटियों को ही पराया समझता है,
अपना घर आंगन है जो उसका, वो अपना नहीं होता है,
हर बेटी को एक दिन बाबुल का घर छोड़कर जाना है,
पर जब तक साथ है परायेपन का एहसास ना होने देना,
जीने दो बेटियों को जीभर जिंदगी खुले एहसासों के साथ,
पराया धन कहकर उनको वक्त से पहले जुदा ना कर देना,
ससुराल में होगी मुश्किल सीख लो बेटी चौका बर्तन,
पढ़ लिखकर क्या होगा जब ससुराल में बिताना जीवन,
ये बातें सुनाकर तो बेटियों की विदाई की रस्म कर देते हैं,
विदाई का मतलब बेटियों को हम पहले ही समझा देते हैं,
बेटा बेटी दोनों के लिए मां-बाबुल का घर एक समान,
वक्त से पहले विदा न करो बेटी को छू लेने दो आसमान,
बेटियां लाचार नहीं,खुशबू बनकर उन्हें हवा में बिखरने दो,
विदाई है कड़वी सच्चाई, पर उससे पहले उन्हें मुस्कुराने दो।
