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DR ARUN KUMAR SHASTRI

Inspirational

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DR ARUN KUMAR SHASTRI

Inspirational

जिज्ञासु

जिज्ञासु

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जीतकर मैं जगत से क्या करूँगा

मानवीय संवेदनाओं से क्या लडूंगा


भावना संस्त्रिप्त मेरी अगर हो सकी

मैं खड्ग लेकर आस्तीन में जो चलूँगा


वेदना से वेदना यूँ कभी मरती नही है

शाँति पथ पर अगर कण्टक मैं बनूंगा


तुम मुझे स्वीकार करना या न करना 

मैं तो सदा ये याचना मग़र करता रहूँगा


रहबरी का कोई अभ्यास मुझको नहीं है

सह पथिक था मैं सदा सह पथिक ही रहूँगा


आज के सामने अब अतीत की बात न करना

भविष्य को रख सामने तुम कोई द्वंद न करना


वर्तमान में सदा जीता रहा हूँ मैं इसी में जियूँगा

जीतकर मैं जगत से क्या करूँगा


मानवीय संवेदनाओं से क्या लडूंगा

भावना संस्त्रिप्त मेरी अगर हो सकी

मैं खड्ग लेकर आस्तीन में जो चलूँगा।


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