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सम्पूर्ण है वह
सम्पूर्ण है वह
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© Agrawal Shruti

Inspirational

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तेज धूप हो, झुलसता हो तन

शीतल छाँव बन जाती है वो,

सूने दिन हों सूनी रातें

कान में कुछ कह जाती है वो !

पिहू पिहू चिल्लाए पपीहा

स्वाति की बूँद बन जाती है वो,

पथ में काँटे हों घायल पग द्वय

आँचल से सहलाती है वो !

श्रृंगार-सौंदर्य चंचल मनभावन

रस - रंग के पर्व मनाती है वो,

ममता, समर्पण, माधुर्य वही है

परहित में खुद मिट जाती है वो !

कोमल तन-मन मगर हौसला

कि वक्त से भी भिड़ जाती है वो,

लक्ष्मी, सरस्वती, महिषासुरमर्दिनी

सृष्टि का चक्र चलाती है वो !

जननी भगिनी प्रियतमा संगिनी

जग में औरत कहलाती है वो !

जननी भगिनी प्रियतमा संगिनी

जग में औरत कहलाती है वो !!

शीतल घायल भीड़

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