यात्रा day-18
यात्रा day-18
अपने ऑफिस के काम से मुझे कुछ 3 -4 महीने के लिए बैंगलोर में रहना था। ऑफिस में 6 डे वर्किंग होते थे तो केवल संडे ही छुट्टी होती थी। मैंने सोच रखा था कि कम -से -कम बैंगलोर के आसपास की जगहों को तो एक्स्प्लोर कर ही लूँ। मुझे यात्रा करने ,नयी जगहों को देखने और नए लोगों से मिलने का बहुत शौक भी है।
मैंने ऐसे ही एक संडे श्रवणबेलगोला जाने की योजना बनाई। ऑफिस में 2 -1 लोगों से साथ में चलने के लिए पूछा ;लेकिन सभी के पास न जाने की अपनी-अपनी वजह थी। मुझे अपने पूरे टूर के दौरान 10 -11 संडे ही मिलने वाले थे ;मैं अपना एक भी संडे व्यर्थ गँवाना नहीं चाहती थी। तो मैंने अकेले ही श्रवणबेलगोला जाने का निर्णय ले लिया।
बैंगलोर से श्रवणबेलगोला के लिए चन्नापटना ,ऐसा सा ही कुछ नाम था ;वैसे भी हम उत्तर भारतीयों के लिए कन्नड़ में उच्चारण करना बहुत ही मुश्किल है;तक बस से जाते हैं।उसके बाद ऑटो से श्रवणबेलगोला चले जाते हैं। वहां पहाड़ी पर गोमतेश्वर की एक विशाल मूर्ति है,जिसे बाहुबली के रूप में पूजा जाता है .
मैं कर्नाटक सरकार द्वारा संचालित बस में बैठकर चन्नापटना पहुंच गयी थी । वहां से ऑटो लेकर श्रवणबेलगोला। मेरे पास एक बैकपैक था ,जिसमें एक पानी की बोतल और एक कैमरा था। मैं सामान्यतया अपने साथ एक पानी की बोतल लेकर चलती ही हूँ। मेरी कोशिश रहती है कि मुझे बाजार से पानी न खरीदना पड़े।
अरे रुको ;आप मेरे बारे में कोई राय कायम मत कर लेना। मैं कंजूस नहीं हूँ। मैं बस अनावश्यक प्लास्टिक के कचरे को बढ़ाने से बचना चाहती हूँ , बोतल बंद पानी खरीदने से प्लास्टिक की बोतल प्लास्टिक कचरा बढ़ायेगी;इसलिए खरीदने से बचती हूँ। जानती हूँ एक प्लास्टिक की बोतल से पर्यावरण पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा ;लेकिन मुझ फर्क पड़ता ही है।
सोलो ट्रिप पर जाने का सबसे बड़ा नुक्सान मेरे जैसे सेल्फी न खींच सकने वाली के लिए यह हुआ कि किसी भी मनचाहे फ्रेम में, मैं खुद को रखकर पिक्चर क्लिक नहीं कर सकी। किसी साथी टूरिस्ट को रिक्वेस्ट करके ही मैं अपनी कुछ फोटोज क्लिक करवा सकी।
सोलो ट्रिप का सबसे बड़ा फायदा जो मुझे महसूस हुआ वह यह था कि ,"मुझे कहीं भी जाने की जल्दबाज़ी नहीं थी। जो भी था ,मैं उसका भरपूर आनंद ले पा रही थी। पहाड़ी पर चढ़ने-उतरने जो सीढ़ियाँ थी ;मैं उन पर घंटों बैठी रही।जो कोना मुझे अच्छा लग रहा था ,में वहां अपना समय व्यतीत कर रही थी . ठहराव में एक अलग ही सुकून है ,जो चलते रहने में नहीं मिलता। अकेलापन नहीं ,वहां एकांत था। "
सोलो ट्रिप पर आप होते हैं तो आपके आसपास के लोगों के लिए आप शायद एक अचरज का विषय होते हैं। लोगों के शारीरिक हावभाव से मुझे ऐसा ही लगा। मैं अपने आसपास की चीज़ों का अच्छे से अवलोकन कर पा रही थी।
मेरे हाथ में कैमरा होने के कारण कुछ लोग मुझे फोटोग्राफर भी समझ रहे थे। एक स्कूल के बच्चे शायद पिकनिक पर आये हुए थे ;उनमें दो दोस्त बार-बार मेरे कैमरे की तरफ इशारा कर रहे थे। मैंने उनकी फोटो क्लिक की ,उनकी स्माइल ने मेरा दिन बना दिया था। बच्चे छोटी-छोटी चीज़ों में बड़ी-बड़ी खुशियां ढून्ढ लेते हैं और हम बड़े छोटी -छोटी बातों से दुःखी होकर हम बड़े खुश हो जाना तक ही भूल जाते हैं।
यह एक काम खर्चे वाली इकनोमिक ट्रिप थी। मेरे आने -जाने और खाने -पीने में मुश्किल से 1000 /- खर्च हुए। मुझे ऑटो ड्राइवर से कोई भाव-ताव नहीं करना पड़ा था।दोनों ही बार उन्होंने वाजिब दाम लिए थे। जिस ऑटो से मैं लौट रही थी ,उसके चालक ने मुझे बाहुबली के अभिषेक में आने के लिए आमंत्रित भी किया।
पूरी यात्रा में मैंने एक सेकंड भी खुद को असुरक्षित महसूस नहीं किया। इस यात्रा ने मेरे कई पूर्वाग्रहों को दूर कर दिया। मुझे हमेशा यही लगता था कि घूमने में आनंद तो किसी के साथ होने में ही है। लेकिन एकांत में भी आनंद है ;यह इस ट्रिप पर जाने से पता चला। सिर्फ पैसा खर्च करने से ही आनंद मिलता है ;यह मिथक भी मेरा टूट गया था।सोलो ट्रिप ने मेरे आत्मविश्वास को दुगुना कर दिया था; मुझे अपने एक नए रूप से मिलवाने वाली यह सोलो ट्रिप हमेशा मेरे दिल के करीब रहेगी।
