Kapil Shastri

Drama

2.6  

Kapil Shastri

Drama

वो साठ रुपये

वो साठ रुपये

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कैनेडा वाले नरेश मामाजी जो दरअसल मेरी मम्मी के मामाजी हैं को पारकिनसन्स हो गया था, पता पड़ा था। मामीजी इस बार उन्हें जैसे-तैसे साथ लेकर इंडिया आयी हैं। बीचले मामाजी की बेटी के यहाँ रुके हैं। बीचले और बड़े तो गुजर चुके हैं।

मिलने गया तो अंदर से वॉकर के सहारे कंपकपाते हुए आये और डाइनिंग टेबल पर प्रेम से अपने पास बिठा लिया। मामीजी बड़े के परिवार से मिलने गयी हुई थीं। चाय आयी तो मैंने कप उठाकर देना चाहा तो मना कर दिया कि "नहीं मैं ही उठाऊंगा, मुझे तो आदत हो गयी है। फिर उन्हीं कंपकपाते हाथों से पीने भी लगे थे। इतने करीब होने के बावजूद उनकी बात सुनने के लिए कान उनके मुँह के करीब ले जाना पड़ रहा था। नाना, नानी, मम्मी, पापा, बड़ी बहन सब तो गुजर चुके हैं तो उन्ही के बारे में पूछा जो हैं जैसे मेरी पत्नी ,मेरी बेटी क्या कर रही है। उन्होंने बताया कि "कैनेडा में तो दिमाग मे एक चिप लगा देते हैं जिससे ये कंपकपाहट बंद हो जाती है, पर अस्सी से ऊपर के लोगों को नहीं लगाते।"

गुजरा समय और गुजरे लोग जैसे उनकी आँखों मे तैर रहे थे। "वो सा....रु" कुछ शब्द फुसफुसाहट में सुनाई दिए तो फिर मैं कान उनके होठों के पास ले गया तो सुनाई दिया "चलो छोड़ो।"फिर कुछ और बातचीत के बाद वही शब्द। इस बार मैंने पकड़ लिए। "वो साठ रुपये।"

"कौन से साठ रुपये ?" मैंने अचरज से पूछा।

"वही जो बेन ने दिए थे।"

"कब दिए थे ?"

"1960 में ही दिए थे।"

"क्यों दिए थे ?" मैं भी यादों की गहराई में घुसता जा रहा था।

"1960 में तो मामाजी मैं पैदा भी नहीं हुआ था। फिर भी बताइए क्यों दिए थे। "टोरंटो में करोड़पति डेंटिस्ट मामाजी के मुँह से साठ रुपये सुनकर अंदर ही अंदर मुझे हँसी भी आ रही थी। उत्सुकतावश मेरे पूछने पर वो अतीत की गहराइयों में जाकर सुनाने लगे।

"बचपन मे मैं बहुत शरारती था। फिर पढ़ने में लद्दड़। हर साल सप्लीमेंट्री। "गद्दिखेड़ी का मास्टर बनेगा" बस यही सुनने को मिलता था। "स्वर कमजोर थे पर मेरे कान समीप और चौकन्ने थे इसलिए मैं समझ पा रहा था। बीच मे नौकर द्वारा ड्राई फ्रूट्स की प्लेट लगाने से थोड़ी तारतम्यता भंग हुई थी।

"बड़े भैया जब इंदौर में मेडिकल की पोस्टग्रेड्यूएशन कर रहे थे तो उन्होंने मेरे लिए लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज के डेंटल डिपार्टमेंट में एडमिशन की बात कर ली थी पर पिताजी से किस मुँह से माँगता ! मैंने उनसे भोपाल तक के ही पैसे लिए थे। मैं नर्सिंगढ़ से निकलकर बस से भोपाल तक तो पहुँच गया था पर अब भोपाल से लखनऊ जाने के लिए साठ रुपये की ज़रूरत थी। मैं बेन (बहन) के पास गया। तब जीजाजी भी घर पर नहीं थे इसलिए उन्होंने शाम को देने की बात कही तो मैंने कही की शाम को तो मेरी गाड़ी है।तब बेन ने अपनी साड़ी की अंटी खोलकर उस समय जो साठ रुपये दिए थे वो मुझे तरक्की की सीढ़ी चढ़ा गए। अब तो बेन भी नहीं रहीं तो मुझे वो याद आ रही है। ताउम्र बेन ने ये बात अपने सीने में दफन कर ली थी। किसी को नहीं बताया। शायद उस दिन सिक्कों से फिर उतनी ही बड़ी अंटी बना ली थी। कुछ कर्ज़ ऐसे होते हैं जो कभी चुका भी नहीं सकते।" पूरी घटना सुनाकर उन्होंने गहरी साँस छोड़ी।

इतने में ही मेरे मोबाइल पर श्रीमतीजी का फ़ोन आ गया "सुनो घर आयो तो मेरे लिए कलरमेट हेयर कलर ब्लैक के तीन पाउच लेते आना।" मैंने उसे आश्वस्त किया और नरेश मामाजी के भी पैर पड़कर विदा ली। उन्होंने गदगद होकर बहुत-बहुत आशीर्वाद दिए जैसे वह यह घटना सुनाकर बहुत हल्के हो गए हों और जैसे यह आखरी मुलाकात ही हो।

मोटवानी जी के राजेश प्रोविशन से तीन पाउच के साठ रुपये चुकाए तो मेरे हाथों में भी झुनझुनी सी होने लगी थी।


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