Shubhra Varshney

Drama


4.5  

Shubhra Varshney

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वो कुल्फी वाली

वो कुल्फी वाली

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अभी कल ही तो खाई थी।"

"जीजी आज की बहुत अच्छी बनी है। ताजे दूध की बनाई है मैंने। भैया जी का हुकम था आज आने को।"

"तो फिर जाओ भैया जी को उनके कार्यालय खिला आओ।"

राधा के क्रोध को दरकिनार करती वह कुल्फी वाली अपने सिर से पल्ला उतार आम के नीचे बने चबूतरे पर बैठ गई। अपना पसीना पौछती हुई वह आंचल से हवा करने लगी।

राधा के यहां रोज आने का उसका नियम जो था सो आज कैसे ना आती।

इस बीच राधा का नौ-दस वर्षीय बालक बाहर निकल आया,

" अभी नहीं लेना है जाओ, मुझे यह कुल्फी अब नहीं खानी मुझे तो पैकेट वाली खानी है।

अपने को बालक की अघोषित मौसी समझने वाली कुल्फी वाली साधिकार बोली,

" बबुआ कुल्फी ले लो अगर तुम नहीं लोगे तो गांव चली जाऊंगी और लौटुगीं नहीं।"

पल्ले पर से कपड़ा हटा कर वह कुल्फी बालक को देती हुई मुस्कुरा पड़ी।

कुल्फी पा बालक खिलखिलाते हुआ तेजी से बाहर निकल गया।

कच्ची मिट्टी के बने बालक का शरीर ही नहीं मन भी तनिक सी बातों पर बन बिगड़ जाता है।

वह करीब पच्चीस वर्षीय एक श्यामवर्णी छरहरी स्त्री थी। उसकी झील सी आंखें उसके चेहरे को सुंदरता के आयाम दे देतीं थीं।

उसकी होठों की वक्र हंसी अनेकों रहस्य छिपाए रहती।

उस हंसी में बालिका सा अल्हड़पन, युवती सी खनखनाहट व प्रौढ़ा की तरह गंभीरता का समावेश था।

उसकी कमनीय काया अपने सर पर इतना बोझ उठा कर कैसे इतना भ्रमण कर लेती थी, राधा के लिए सदैव कुतूहल का विषय रहता।

वक्त बेवक्त कुल्फी वाली का आना राधा को बहुत अखरता । क्षणिक क्रोध के बाद उसकी स्वादिष्ट कुल्फी खा वह उसकी तरल हंसी में शामिल हो जाती।

उसका बालक भी कुल्फी के स्वाद को अपनी दिनचर्या में शामिल कर चुका था।

कुछ दिनों से वह कुल्फी वाली प्रतिदिन आने लगी थी। आते ही वह ऐसा अधिकार जमाती कि उसके आए बगैर गुजारा ना हो जैसे किसी का।

उसकी पुकारती आवाज सुन राधा कभी-कभी झल्ला ही पड़ती।

"आजकल तुम्हारी कुल्फी की ग्राहक कम हो गए क्या जो यहां की बिक्री के बगैर काम नहीं चलता तुम्हारा।"

"ना जीजी ना तुम्हारे हाथ का जस है। बाबू को खिला आमदनी बहुत फलती है मेरी। मौसी ना खिलाएगी तो बाबू बढ़ेगा कैसे।" कहकर वह ठहाका लगाती।

फिर वही उन्मुक्त हंसी राधा को ईर्ष्या कर दर्शन करा जाती।

"पूरे दिन तक धूप में घूम कर कैसे इतना हँस लेती है यह ।मेरा तो अपना रोज का काम भी मुझे खिजा जाता है ।",

राधा के मनोभाव उससे स्वयं ही द्वंद करते ।

उसकी स्वयंभू मौसी पद पर आसीन होना राधा को आश्चर्यचकित कर जाता।

जितना भी वह उसे आने के लिए हतोत्साहित करती कुल्फी वाली उतनी ही मनोयोग से उसे कुल्फी खिलाकर ही जाती।

पिछले दिनों आई उसके पति की मौसी ने कुल्फी वाली के अघोषित अधिकार पर आपत्ति जताई।

मौसी को कुल्फी वाली का साधिकार घर के बाहर बैठना और बालक को तरह-तरह से रिझाकर कुल्फी खिलाना बिल्कुल नहीं भाया।

"इस तरह अपरिचित का आना जाना ठीक नहीं और आज के जमाने में किसी पर इतना विश्वास भी ।"

उन्होंने एक तरीके से राधा को सचेत कर दिया था।

कुल्फी वाले को भी वह बहुत जोर से डांटती थी।

मौसी के सामने कुछ दिन उसने अपने दर्शन नहीं कराए। उनके जाते ही वह फिर आने लगी।

सही तो कह रही थी मौसी आज के समय ने अच्छे और बुरे का भेद शून्य कर दिया है। इतनी वारदातें सुनने में आती है कि लोग सहज किसी से घुलने मिलने में संकोच करने लगे हैं। फिर विश्वास तो बहुत बड़ी वस्तु है।

मौसी की बातें राधा के मन की गहराई तक पहुंच गई थी। तभी से उसका मन कुल्फी वाली को देख कर खिन्न हो जाता।

अपने बालक से भी वह कहती कि यह बेकार है वह उसे बाजार की बढ़िया 'आइसक्रीम' खिलाएगी।

और इसी बीच एक दिन अप्रत्याशित घटा। दोपहर को खेलकर बालक बहुत देर तक वापस नहीं आया।

कुछ देर तो राधा ने प्रतीक्षा की फिर उसके मन में चिंता गहराने लगी। उसका पहले से ही सशंकित मन अब गंभीर चिंता में पड़ गया था ।

पति के कार्यालय में फोन कर, वह उसे सब तरफ ढूंढती रही।

उसने पति से साफ कह दिया था कि वह कुल्फी वाली ही बालक को ले गई होगी और इसकी पुलिस में खबर देने को भी कह दिया।

थोड़ी देर में राधा के घर की आगे एक छोटी भीड़ जमा हो गई थी।

तभी कुल्फी वाली अपनी चिर परिचित अंदाज में आवाज लगाती हुई आई।

राधा की सब लोगों के सामने पहले ही शंका व्यक्त करने से सब उसकी तरफ चौकन्ने हो गये।

अधीर हो राधा उसे देखते ही बोल पड़ी,

"कहां छोड़ आई मेरे मुन्ने को?"

सब स्थिति समझने की कोशिश करती कुल्फी वाली परेशान हो बोली,

"जीजी मैं कब ले गई थी बबुआ को।"

राधा बिफर पड़ी," तू ले तो नहीं गयी थी , उसको चुरा ले गई तू तो।"

कुल्फी वाली की रुलाई फूट पड़ी ,"अरे जीजी क्या कहती हो मैं तो बबुआ की मौसी हूं।"

पुनः चिंता कर बोली,

" कहां गया बबुआ। कौन ले गया।"

"ज्यादा स्वांग ना रचा।" अपने पति की तरफ मुखर हो बोली," पुलिस कितनी देर में आएगी।"

भीड़ में तरह-तरह के स्वर गूंजने लगे, सबका कहना था पहले इसको पकड़ के रखो।

छीना झपटी में कुल्फी वाली का पल्ला गिर गया था और सारी कुल्फी सड़क पर बह चली थी।

तभी सहसा बालक खिलखिलाता हुआ वहां आ गया।

सब देखते ही उसे चौक पड़े।

राधा ने तुरंत उसे गले से लगा लिया और पूछा,

" तू दोपहर से कहां गायब है।"

"मां मैं राजू के यहां गया था खेलने और खेलते खेलते वही सो गया अभी उठ कर आ रहा हूं।"

सहज भाव से बालक कह गया और कुल्फी वाली को देखकर बोला ,

"अरे मौसी तुम कुल्फी नहीं लाई आज ।'

फिर नीचे गिरे पल्ले को देखकर बोला ,"अरे यह कैसे गिर गया।"

सब तरफ सन्नाटा था। कुल्फी वाली ने धीरे से अपना पल्ला उठाया और चल पड़ी। निअपराधी के सिर झुका कर धीरे धीरे चलते कदम राधा को लज्जा के कुएं में ढकेल गए।

जब वह बहुत दूर निकल गई तो राधा जैसे तंद्रा से जागी उसने उसे पुकारना चाहा। पर यह क्या इतने समय में भी उसे उसका नाम ज्ञात नहीं हुआ था वह तो उसे कुल्फी वाली ही कहती थी। वह पराजित हो मौन हो गई।

राधा दिनों दिन उसके आने की प्रतीक्षा करती रही पर कुल्फी वाली ने कभी उस ओर रुख नहीं किया।

उसकी उन्मुक्त हंसी राधा के कानों में अक्सर गूंजती थी। पर वह चाहकर भी अब उसके दर्शन नहीं कर पाती थी।



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