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Arunima Thakur

Tragedy


3.8  

Arunima Thakur

Tragedy


वो बुर्के वाली

वो बुर्के वाली

7 mins 930 7 mins 930

आज भी उस घटना के लगभग तीस सालों बाद भी किसी भी बुर्के वाली औरत को देखकर मेरा दिल पश्चात की भीषण अग्नि में जलने लगता है। वर्षो पहले मेरे द्वारा ना लिया गया एक फैसला कब तक मेरे दिल को सताएगा । क्या मैंने दिल का फैसला दिमाग से लिया था ? तो दिमाग की गलती के लिए दिल कब तक यह पीड़ा सहेगा ? गलती तो दिल की ही कही जाएगी क्योंकि वह कमजोर पड़ गया था, वह सही समय पर सही निर्णय नहीं ले सका।


आज से लगभग तीस साल पहले मेरी पढ़ाई पूरी होने के बाद मुझे एक बहुत अच्छी कंपनी में मुंबई में नौकरी मिली थी । मुंबई मायानगरी , पर यह माया नगरी मुझे नहीं भरमा पाएगी ऐसा मुझे विश्वास था । इतने सालों तक स्कूल जीवन, कॉलेज जीवन हमेशा ध्येय बनाकर मन से पढ़ाई की थी । क्योंकि मुझे अपनी परिस्थितियों का आभास था। हां तो मुंबई नगरी में कंपनी की तरफ से रहने के लिए फ्लैट मिला था। हम चार लोग साथ में रहते थे। सब कुछ अच्छा था । उन्होंने मुझे पहले दिन से ही मुंबई की जीवन रेखा लोकल ट्रेन से परिचित करवा दिया था। मुंबई के लोगों का अनुशासन देख कर बहुत अच्छा लगा। कोई भी कोई धक्का-मुक्की नहीं । जहां भीड़ हुई वहां तुरंत ही लाइन बना लेते थे ।रोज बांद्रा से चर्नी रोड तक का सफर, जीवन मजे में बीत रहा था। 

   एक दिन ऑफिस जाते समय मैं थोड़ा पहले स्टेशन पर पहुंच गया। मेरी लोकल आने में अभी थोड़ा समय था । तो जो लोकल सामने खड़ी थी उसी में चढ़ गया । सुबह का समय था, ज्यादा भीड़ भी नहीं थी । अचानक से एक भीनी सी खुशबू ने मेरा ध्यान खींचा । मैं नजरें घुमा कर खुशबू का स्रोत देखने की कोशिश करने लगा। आसपास सारे आदमी लोग ही थे। थोड़ी दूरी पर कुछ लड़कियाँ व महिलाएँ बैठी थी । शायद यह खुशबू वहां से आ रही होगी । उनके बीच में एक बुर्के वाली लड़की, जी हां लड़की, औरत नहीं, ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। अब आप सोचेंगे की बुर्के के अंदर की लड़की के प्रति मेरे मन में भाव कैसे आए ? क्यों आए ? मुझे क्यों वह अच्छी लगी ? बताता हूँ भाई .... वह कोई किताब पढ़ रही थी । उसके हाथ इतने गोरे इतने खूबसूरत मानों किसी छोटे बच्चे के हाथ हो । नाजुक जैसे कमल की पंखुड़ी । नाखूनों पर पता नहीं नेल पालिश लगाई थी या नहीं, नहीं मालूम । लग रहा था नाखून स्वाभाविक रूप से गहरे गुलाबी थे। मुझे एक पुरानी कहानी याद आ गई, जिसमें एक चित्रकार महिलाओं के सिर्फ हाथ देखकर उनका चित्र बना देता था। मैं चित्रकार तो नहीं था पर मेरी हालत उसको देख कर कुछ ऐसी ही थी। मैंने भी अपने मन में उसकी एक प्यारी सी छवि बना ली थी। 

       अचानक उसने किताब नीचे रखकर ऊपर देखा। उसकी और मेरी नजरें मिली। शायद लड़कियों में यह जन्मजात गुण होता है कि वह जान जाती हैं जब कोई उन्हें लगातार देख रहा हो। हिजाब से झांकती आँखें भी इतनी खूबसूरत कि मुंबई का समंदर छोटा लग रहा था । पहली बार मेंरा किसी की आंखों में डूबने का मन किया । काजल से भरी सुरमई आंखें किसी को भी डूबा सकने की क्षमता रखती थी। उसको अपनी ओर देखते देख कर मैंने झेंप कर अपनी नजरें हटा ली । पर बार-बार उसकी ओर देखने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा था । मुंबई सेंट्रल तक आते-आते ट्रेन थोड़ी खाली हो गई और मुझे बैठने की सीट उसी के सामने मिल गई । सिर्फ हाथ ही नहीं उसके पैर भी बहुत खूबसूरत इतने गुलाबी की लगा मानों आलता लगा हो । बरसों पहले शायद बिहारी जी की लिखी पंक्तियां याद आ गई जिनका अर्थ कुछ ऐसा था था कि गोपियां श्याम के पैरों पर महावर लगा रही हैं और उनके पैर इतने सुंदर है कि गोपियों को समझ में नहीं आ रहा है कि महावर कहां कहाँ लगा है और कहां-कहां नहीं । मैं सोचने लगा शायद ऐसे ही किसी के पैर देख कर ही फिल्म पाकीजा के लिए डायलॉग लिखे गए थे, "आपके पांव देखे बहुत हसीन है ।इन्हें जमीन पर मत रखियेगा, मैले हो जाएंगे । स्टेशन आने वाला था मैं उठा और साथ ही साथ वह भी उठ गई। दरवाजे पर पहुंचते ही वह भीनी भीनी खुशबू मुझे एहसासों से भिगो गई ।


   ऑफिस में भी और घर लौटने के बाद भी, मेरा पूरा समय यही सोचते बीत गया कि पता नहीं वह बुर्के वाली कितनी खूबसूरत होगी । उसको वापस देखने की चाहत में दूसरे दिन सुबह सुबह वापस जल्दी निकल गया । अब मैंने सुबह उसी ट्रेन जाना शुरू कर दिया। वह रोज ट्रेन में मिलती, हम दोनों साथ ही स्टेशन पर उतरते, स्टेशन पार करके बाहर जाते । वह टैक्सी कर लेती मैं पैदल ही निकल जाता। कभी कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई । यह कैसी कशिश थी ? क्या यह प्यार था ? बिना देखे बिना जाने वाला ।


    खैर एक दिन वह डिब्बे में चढ़ी और थोड़ी दूरी पर जाकर खड़ी हो गई । उस दिन ट्रेन में भीड़ नहीं थी पर बैठने की जगह भी नहीं थी। उसने अपनी किताब निकाली और पढ़ना शुरू किया । उसके किताब निकालते समय मुझे ऐसा लगा कि जैसे उसके बैग से कुछ गिरा । तभी सामने से किसी ने उठ कर उसे सीट दी और वह उधर चली गई । मैंने देखा जहां वह खड़ी थी, वहीं पर कुछ आईडी कार्ड जैसा गिरा हुआ था । मैनें धीरे से जाकर उसे उठा लिया। फोटो तो क्लियर नहीं थी पर नाम . . . . । अरे नाम और सररनेम तो हिंदू हैं । फिर बुर्का क्यों पहनती है ? हो सकता है कि यह पहचान पत्र उसकी किसी सहेली का हो । फिर मैंने आगे बढ़ कर उसे उसका पहचान पत्र वापस किया तो उसने हल्के से गर्दन को हिलाकर सर झुका कर धन्यवाद किया। हाय. . . मुझे तो लगा था कि आज तो उसकी रेशमी आवाज सुनने को मिलेगी।

     ऐसे ही महीनों बीत गए । मैं रोज उसे देखकर प्यार से मुस्कुराता । सोचता कभी तो प्रतिक्रिया करेगी। बहुत हुआ तो ना बोल देगी। मैं तड़पता कि कैसे मैं अपनी भावनाएं उसको बताऊँ। फिर एक दिन रोज की तरह हम साथ साथ ट्रेन से उतरे । साथ साथ चलते हुए स्टेशन पार किया । स्टेशन गेट पर पहुंचकर वह रूकी। उसने मेरी आंखों में आंखें डाल कर देखा। मानो कुछ पूछ रही हो । मैं भी उसी समय अपने दिल की बात उससे कह देना चाहता था । पर मैं कुछ बोल पाऊं उससे पहले ही उसने अपना हिजाब उठा दिया। हिजाब के उठते ही मेरी तो चीख ही निकल गई और वह तेज कदमों से चलते हुए पार्किग की जगह पार करके, टैक्सी करके चली गई।

    यह क्या था ? क्या हुआ हैँ उसके चेहरे पर ? क्या वह जल गई थी ? क्या उसे दहेज के लिए जलाया गया था? नहीं नहीं ऐसा सुना है की जलाने में अपने आप को बचाने के चक्कर में हाथ सबसे ज्यादा जलते हैं पर उसके हाथ तो बहुत खूबसूरत हैं । फिर यह क्या था ? क्या यह एसिड अटैक था? मुझे कभी पता नहीं चल पाया । क्योंकि अपनी बदतमीजी के कारण मुझे हिम्मत ही नहीं हुई कि मैं फिर से उससे आंखें मिला पाऊं । दो दिन तो मैं इसी सदमे में ऑफिस नहीं जा पाया। यही सोचता रहा कि मेरे चिल्लाने पर उसे कितना बुरा महसूस हुआ होगा। आज भी मेरे चिल्लाने पर समंदर जैसी उसकी आंखों से उसे गालों पर ढुलक आए दो आंसू मुझे शर्मिंदा करते हैं । "सत्यम शिवम सुंदरम" पिक्चर देखकर मैंने शशि कपूर को कितनी ही गालियां दी थी। पर जब अपने साथ ऐसा कुछ घटित हुआ तो दिल ने निर्णय लेने से इनकार कर दिया । सारा प्यार ना जाने कहां हवा हो गया। 

     फिर एक हफ्ते तक मैं बाद वाली ट्रेन से ऑफिस जाता रहा । दिल व दिमाग दोनों ही निर्णय नहीं ले पा रहे थे । आखिरकार एक दिन हिम्मत करके अपने दिल और दिमाग दोनों को राजी करके सुबह-सुबह उसी ट्रेन के लिए पहुँच गया। वह नहीं आई थी। ऐसे एक एक करके न जाने कितने महीने निकल गए पर वह दोबारा मुझे कभी नहीं दिखी। उसने मुझे माफी मांगने तक का मौका नहीं दिया जो कि मैं उसकी माफी के लायक था भी नहीं। मैं आज भी यह सोच कर शर्मिंदा महसूस करता हूं कि वह बेचारी तो उस हादसे से लड़ कर वापस जिंदगी जीने के लिए अपने आपको तैयार कर रही थी । पर मेरे कारण उसका हौसला कहीं वापस न टूट गया हो। बुर्के वाली लड़कियाँ मुझे आज भी मुझे मेरे गुनाह की याद दिलाती है । आज उसी के प्रायश्चित स्वरूप मैं अपनी कंपनी में हर संभव कोशिश करके ऐसी लड़कियों को ही लेता हूं जो कि ऐसे किसी हादसे का शिकार हुई है । और सच मानिए इन में जिंदगी जीने का जज्बा हमसे आपसे ज्यादा कहीं ज्यादा खूबसूरत है।



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