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chandraprabha kumar

Action Classics Inspirational

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chandraprabha kumar

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उतथ्य सत्यव्रत - पुराण कथा

उतथ्य सत्यव्रत - पुराण कथा

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“देवीभागवत” पुराण वाड्.मय का शिरोमणि रत्न है। इस महापुराण को महर्षि वेद व्यास ने स्वयं परीक्षित- पुत्र महाराज जनमेजय को सुनाया था। इस महापुराण में बहुत से रोचक प्रसंग एवं आख्यान संकलित हैं। जिसमें भक्त उतथ्य की कथा आती है। यह इस प्रकार है-

उतथ्य का जन्म प्राचीन काल में कौशल देश में एक विद्वान ब्राह्मण के घर हुआ था ।उसके पिता का नाम देवदत्त एवं माता का नाम रोहिणी था ।पिता ने आठवें वर्ष में उसका यज्ञोपवीत संस्कार विधि पूर्वक संपन्न कराया और वेदाध्ययन के लिए उतथ्य को गुरुदेव के यहॉं भेजा गया,परन्तु वह ऐसा मूर्ख था कि एक शब्द भी उच्चारण नहीं कर सकता था। कई प्रकार से उसे पढ़ाने का प्रयत्न किया गया ,परंतु सभी व्यर्थ सिद्ध हुए। उतथ्य की बुद्धि किसी भी रीति से रास्ते पर नहीं आयी। 

  देवदत्त को पूर्वजन्म के बात स्मरण हो आई। उसने पुत्र प्राप्ति के लिए भी विधिपूर्वक पुत्रेष्टि- याद का आयोजन किया था। मुनिवर गोभिल मंत्र गान कर रहे थे । उनका मंत्रोच्चारण में कुछ स्वर भंग हो गया। इस पर देवदत्त कुपित होकर बोल उठे -“ मुनिवर आप मूर्ख हैं, आपने स्वरहीन मंत्र क्यों उच्चारण किया”?”

इस पर गोभिल मुनि बोले-“ देवदत्त! तुम्हें शब्दशून्य नितांत मूर्ख पुत्र प्राप्त होगा। तुमने अकारण मुझे कटु शब्द कहा है ।”

 यह सुनकर देवदत्त को बड़ा पश्चात्ताप हुआ। वह क्षमा याचना करने लगा। वह बोला -“मुनिवर !मुझे क्षमा करें , मुझ पर प्रसन्न हों, मैं मूर्ख पुत्र लेकर क्या करूँगा। “

  गोभिल मुनि तुरंत शांत हो गए और प्रसन्न होकर बोले-“तुम्हारा पुत्र मूर्ख भले ही हो ,परंतु बाद में वह बहुत बड़ा विद्वान होगा।”

देवदत्त के अथक प्रयास के बाद भी उतथ्य की मूर्खता में कोई अंतर नहीं आया। बारह वर्ष बीत गये। सब लोग उसका उपहास करते । एक दिन कटूक्तियों से ऊबकर उतथ्य वन में चला गया। जाह्नवी के पावन तट पर एक पवित्र स्थान पर उसने एक कुटिया बना ली और वहीं रहने लगा। वन के फल मूल खाकर जीवन व्यतीत करने लगा और “कभी भी झूठ न बोलने का” उत्तम नियम ले लिया। वह कभी किसी का अहित नहीं करता था। 

सत्य में महान तेज होता है।सदैव सत्य बोलने से वाक्- सिद्धि प्राप्त हो जाती है।सत्य बोलना श्रेष्ठ है ,सत्य से उत्तम और कुछ भी नहीं है।

 उतथ्य के सत्य बोलने के बाद चारों ओर फैल गई । एक दिन उतथ्य अपनी कुटिया के बाहर बैठा था ।उस समय एक सूकर अत्यंत भयभीत होकर बड़ी शीघ्रता से भागता हुआ उसके पास पहुँचा ।वह बाण से बिंधा हुआ था ।उस की देह रुधिर उसके से लथपथ थी। वह भय से थर थर कांप रहा था।उस दीन हीन पशु पर उतथ्य की दृष्टि पड़ी। दया के उद्रेक से वह कॉंप उठा। उसके मुख से “ ऐ” का उच्चारण हो गया।

  उतथ्य को यह ज्ञात नहीं था कि “ऐ “सरस्वती का बीज मंत्र है। उसे सत्य के बल से वाक् - सिद्धि प्राप्त हो गई थी। यद्यपि सरस्वती देवी के वाक् बीज मंत्र का शुद्ध उच्चारण “ ऐं” है परन्तु कृपामयी भगवती देवी सरस्वती उतथ्य के “ऐ “शब्द के उच्चारण से ही उस पर प्रसन्न हो गईं और भगवती की कृपा से उसे संपूर्ण विद्याएं स्फुरित हो गईं। 

  वह सूकर भागकर एक झाड़ी में छिप गया। थोड़े ही देर में उसके पीछे पीछे एक जंगली व्याध दौड़ता हुआ पहुँचा। वह कान तक खींचे हुए हाथ में धनुष लिए था। उस व्याध ने उतथ्य मुनि से पूछा-“कृपया बताएँ कि मेरे बाण से बिंधा हुआ वह सूकर कहॉं गया ?”

 उतथ्य बड़े धर्म संकट में पड़ गए।वे जानते थे वह सत्य सत्य नहीं है यदि उसमें हिंसा भरी हो ।यदि दया युक्त हो तो अनृत भी सत्य कहा जाता है क्या निर्णय करें वे कुछ समझ नहीं सके।उतथ्य का हृदय दया से ओतप्रोत था। भगवती सरस्वती देवी की उन पर कृपा हो चुकी थी। तुरंत उनके मन में स्फुरणा हुई और वे बोले-

“ व्याध ! जो ऑंख देखने वाली है, वह बोलती नहीं और जो वाणी बोलती है ,उसने देखा नहीं तो फिर तुम बार - बार क्यों पूछ रहे हो।”

  मुनिवर उतथ्य के यह कहने पर उस पशु घाती व्याध को निराश होकर ख़ाली लौटना पड़ा। 

  तदनन्तर उतथ्य ने सारस्वत बीजमन्त्र “ऐं” का विधिवत् जाप किया। उनका यशोगान और विद्या की प्रभा चारों ओर फैल गई। जिस पिता ने उन्हें त्याग दिया था वे उन्हें बड़े आदर के साथ घर ले गए। वाल्मीकि जी की तरह उतथ्य मुनि भी एक महान कवि बन गए। यह सब सत्य की महिमा एवं भगवती सरस्वती देवी की कृपा का फल था। 


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