स्व देह से प्राप्त शिक्षा-२५
स्व देह से प्राप्त शिक्षा-२५
दत्तात्रेय जी कहते हैं"- हे राजन् ! इस प्रकार मैंने इन चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की। इसके अतिरिक्त मैंने अपने शरीर से भी कुछ सीखा है, शिक्षा प्राप्त की है। मैं अपने शरीर से प्राप्त शिक्षा को तुमसे कहता हूँ।
मेरा शरीर भी मेरा गुरु है , क्योंकि यह मुझे विवेक और वैराग्य की शिक्षा देता है ।मरना- जीना तो इसके साथ लगा ही रहता है। यद्यपि इससे भगवान का ध्यान किया जाता है ,मैं इसे अपना नहीं समझता क्योंकि यह तो एक दिन नष्ट होगा ही। यद्यपि इसकी सहायता से ही मैं सारे तत्त्वों का निर्णय करके प्रसन्न मन से बिना अनुरक्ति के अकेला विचरण करता हूँ।यह शरीर ही परिवार का विस्तार करता है तथा उसके भरण पोषण के लिए अनेक कष्ट सहता है ,परंतु अंत में उसे इन स्त्री, पुत्र आदि सब को छोड़कर चले जाना पड़ता है।
यद्यपि शरीर से बहुत बड़ा लाभ यह है कि इससे इस जगत के बारे में जाना जा सकता है किन्तु मनुष्य को चाहिये कि इसके दुखमय अपरिहार्य भविष्य का सदैव स्मरण रखे। मनुष्य को स्वस्थ शरीर से युक्त होना चाहिए किंतु उससे अधिक स्नेह या अनुराग नहीं रखना चाहिए। यद्यपि यह शरीर अनित्य है ,परन्तु यह अत्यंत दुर्लभ है क्योंकि यही ऐसी बुद्धि से युक्त है जो ब्रह्मका साक्षात्कार करा सकती है।
शरीर से आसक्ति रखने वाला व्यक्ति अपनी पत्नी, बच्चों , संपत्ति, पालतू पशुओं, नौकरों, घरों, सम्बन्धियों, मित्रों आदि के पद को बढ़ाने और सुरक्षित रखने के लिए अत्यधिक संघर्ष द्वारा धन एकत्र करता है। वह अपने ही शरीर की संतुष्टि के लिए यह सब करता है। जिस प्रकार एक वृक्ष नष्ट होने से पूर्व भावी वृक्ष का बीज उत्पन्न करता है उसी तरह मरने वाला शरीर अपने संचित कर्म के रूप में अपने अगले शरीर का बीज प्रकट करता है।
जिस प्रकार बहुत सी पत्नियों वाले पुरुष को उसकी सभी पत्नियाँ अपनी अपनी ओर खींचती रहती है , उसी प्रकार एक जीव को सभी इंद्रियाँ अपने अपने विषयों में खींचती रहती हैं। जिह्वा अपने स्वाद विषय की ओर से, जननेंद्रिय भोग की तरफ,त्वचा आदि इन्द्रियाँ स्पर्शादि विषयों की तरफ़ आकृष्ट करती हैं । नासिका इन्द्रिय सुगंध में ,नेत्र सुंदर रूप देखने में खींचते हैं। अतः साधक को हर इन्द्रीय के वशीभूत होकर अपने देव दुर्लभ मानव शरीर को नष्ट नहीं करना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति को निश्चय ही इस बात के लिए प्रयत्न करना चाहिए कि शीघ्र से शीघ्र मृत्यु से पहले ही मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्न कर ले। अनेकानेक जन्म-मृत्यु के पश्चात् यह दुर्लभ मानव जीवन मिलता है जो अनित्य होने पर भी मनुष्य को सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने का अवसर प्रदान करता है।"
दत्तात्रेय जी कहते हैं कि "यह विचार कर ज्ञान का प्रकाश होने पर मुझे इस नश्वर संसार से विरक्ति हो गई और आसक्ति व मिथ्या अहंकार से रहित होकर मैं पृथ्वी पर स्वच्छन्द भाव से विचरण करता हूँ। एक ही गुरु के द्वारा सुदृढ़ और पर्याप्त बोध प्राप्त नहीं होता है, क्योंकि एक ही परम तत्त्व का तो ऋषियों ने नाना रूपों से गुणगान किया है।"
अवधूत के ज्ञानपूर्ण उपदेशों को सुनकर राजा यदु ने सभी आसक्तियों का त्यागकर भगवान् में अपना मन लगाया।
भगवान् श्रीकृष्ण के श्रीमुख से यह कथा सुनकर उद्धव आनंद विभोर हो उठे।
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