सुरभित भावनायें
सुरभित भावनायें
आज बाग में कली खिली देख मैं मुस्करा पड़ी। कोयल कूकी - कुहू कुहू , ‘इतनी उत्फुल्ल आज कैसे ?’बौर से लदी आम की डालियों झुकीं- ‘इतनी मदमाती क्यों हो ?’मालती लता की सुगन्ध लिये हवा का झोंका आया- ‘इतनी चंचल क्यों ? ‘ मैं नील महाकाश तले अकेली खड़ी थी। प्रश्नों से चौंकी- ‘क्या नहीं जानती- आज मेरे प्रिय का जन्म दिन है। अति शुभ दिवस है यह। क्यों न मैं खुशियां मनाऊँ ?’
‘ऊँहू…….. प्रिय तेरा निर्दय है। कैसा प्रिय वह जो मंगल वेला में भी अपनी प्रिया के पास न हो।’
‘नहीं नहीं…मैं प्रतीक्षा रत हूँ। प्रिय मेरा आयेगा। आने पर मैं उसे बेला का फूल दूँगी। जिसके सौरभ में मेरे प्यार की लाज भीनी सुवास होगी। जिसकी शुभ्रता में मेरे प्यार की निर्मलता होगी। ‘
‘ अच्छा, तो रहो प्रतीक्षारत। जब जब तुमने प्रतीक्षा की है ,क्या प्रिय तेरा आया है? विवाह की प्रथम वर्षगाँठ पर वह तुम्हारे पास नहीं था। बिटिया के जन्म के समय वह तुम्हारे पास नहीं था। गत वर्ष के अपने जन्मदिन पर भी वह तुम्हारे समीप नहीं था। जब जब तुमने चाहा है - प्रिय ….. आओ…….. आओ…….तब तब वह दूर ही भागा है। भाग्य तुम्हारा, अनचाहे ही वह समीप आता है चाहने पर दूर भागता है, जब चाहे प्यार कर लेता है, जब चाहे उपेक्षा देता है। क्या तुम उसे अपने स्नेह - रज्जु में बॉंध सकी ?’
‘ आरोप न लगा वाचाल । मुखरा ! अब न सहूँगी, क्यों कहती है तू ऐसी बात। प्रिय मेरा खाली नहीं। अनेक कार्य हैं उसके। मेरा ध्यान है उसे, यही क्या कम है ? मैं ठहरी ख़ाली - ख़ाली। हर समय उसका ही चिन्तन करती हूँ। गुस्सा भी कर लेती हूँ, प्यार भी कर लेती हूँ। रूठ भी जाती हूँ, मन भी जाती हूँ।’
‘प्रतीक्षा आकुल कान पद आहट पर सजग रहते है। ये प्रिय के पग हैं…….. वही पग - ध्वनि- क्या नहीं…….? सुखकर है किसी को प्यार कर पाना। प्यार में विरह की ताप सहना। मैं कहूँ……आओ……पर वह हो दूर दूर…… आकुलता बढ़ती जाये।’
‘विकल नेत्र दृष्टि थक जाये। बैठी बैठी सो जाऊँ, भोर हो….निराश संध्या आये। अलस हो बैठी रहूँ— पूजा के पुष्प मुरझा जायें। सहसा ही वह निष्ठुर आये- आकर धीरे से स्पर्श कर ले, मैं कहूँ - “ तुम” !’
“हॉं हॉं प्रिये मैं ही ।”
“ लाओ वह बेला का फूल कहॉं। “

