सुप्रकरण १
सुप्रकरण १
श्रीमंत मेरा अपना फुफेरा भाई है। बड़ा ही हँसोड़! मानो हँसने की बीमारी हो। बचपन से ही महत्वाकांक्षी भी । जब चाहा, जिसे चाहा, वह उसका हो गया। उन दिनों पाकिस्तान से लगे जलालाबाद में हमारा मिलन हो गया। हम दोनों एक ही विद्यालय में अध्यापन कर रहे थे। गौरतलब हो कि वह मुझसे २३ वर्ष छोटा है, लेकिन उत्साही बहुत है। अक्सर वह मुझसे प्रिन्सपल बनने के बारे में पूछता रहता। मैंने उसे बताया कि प्रिन्सपल बनने के लिए कुछ आवश्यक योग्यता और अनुभव की अर्हता होनी चाहिए। बेहतर होगा कि तुम प्रिन्सपल बनने से पहले वाइस प्रिन्सपल बन जाओ। अभी उसे जलालाबाद आए हुए कुछ ही दिन हुए थे कि अचानक प्रिन्सपल कौल ने मुझे बुलाया और मेरे प्रिय भाई के बारे में पूछा और उसके वाइस प्रिन्सपल वाले प्रोफाइल के बारे में पूछा, जो उसने लिंकडेन प्रोफाइल में अपडेट किया था। काफी ना-नुकूर के बाद उसने स्वीकार किया कि जल्दी प्रिन्सपल बनने के लिए उसने यह अपडेट किया था, जिसे वह आज ही हटा देगा। इस घटना के एक महीने बाद ही वह अचानक जलालाबाद छोड़ कर चला गया- प्रिन्सपल बनने। हाँ, जाने के एक दिन पहले उसने मुझसे कुछ पैसे लिए थे-तीन हजार रुपये। करीब दो महीने बाद श्रीमंत जी का फोन आया। उनकी नई नियुक्ति आजमगढ़ के एक स्कूल में बतौर प्रिन्सपल हो गई है। मुझे थोड़ा आश्चर्य भी हुआ कि इनकी तो बोर्ड द्वारा निर्धारित अर्हता भी नहीं, फिर ये प्रिन्सपल कैसे बन गए। राज जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।
श्रीमंत जी ने बताया, भैया सब आपकी ही कृपया है। आपके सीवी में मैंने आपके नाम की जगह अपना नाम डाल दिया और बन गया प्रिन्सपल!! क्या, क्या? यह कैसे संभव है? हमारी उम्र के फासले में यह कैसे संभव है। यह सब संभव है भैया! किसको पता है, किसे फुरसत है। न बोर्ड को, न सरकार को, न स्कूल के मालिक को। सबका मोटिव है- प्रॉफ़िट और मैं प्रॉफ़िट दे रहा हूँ, दिलवा रहा हूँ। इस प्रकार श्रीमंत प्रकरण 1 समाप्त हुआ।
