पढ़ाई नहीं मंजूर
पढ़ाई नहीं मंजूर
बात कल की ही है। मनीष अचानक नाराजगी भरे लहजे में बोला- "मैं यहाँ पढ़ने नहीं आया हूँ। मैं तो बस आप लोगों से बातें करने आया हूँ।" अचानक पुरानी स्मृतियाँ तरो-ताजा हो गई।वही अपना प्राथमिक विद्यालय। गाँव की खुली हवा और स्वच्छ वातावरण में चटाई और जूट के बस्ते पर बैठने की स्थायी व्यवस्था के बीच कमलेश मामाजी का वहाँ अध्यापक के रूप में आना एक सुखद संयोग था। मेरे सहपाठियों मे एक से बढ़कर एक पढ़ाकू भी थे वहीं कई बहानेबाज बच्चे पढ़ाई से बचना चाहते थे।
मास्टरजी बच्चों को नए-नए तरीके से पढ़ानेमें माहिर थे। लेकिन हमारे सहपाठियों में से एक सेर पर सवा सेर निकला। मास्टर जी ने खेलने के बहाने उसे पढ़ाना शुरू ही किया था कि वह अचानक चिल्ला उठा- "अरे बाप रे ! भाग रे भाग, ई त पढ़वै छौ!"
और अचानक वह वहाँ से छू-मंतर हो गया। अगले दिन हमारी टोली घर से उसे घसीट कर स्कूल ले कर पहुंची। आज मास्टर जी कुछ ज्यादा ही सतर्क थे, इसलिए उसका विद्यालय से भागना संभव न हो सका। मास्टर जी ने गुस्से से लाल होकर कहा- यदि आज तुम नहीं पढ़ोगे तो मैं तुम्हारे कान के नीचे एक जोरदार चाँटा लगाऊँगा और स्कूल से निकाल दूँगा।
बच्चे के चेहरे पर एक विचित्र चमक उभर आई। उसने अत्यंत सहज लहजे में और मासूमियत के साथ कहा- त चाँटा लगा के निकाल न दहौ, कोन बात के देरी छै!! हमू फ्री हो जैबय। कहने का तात्पर्य यह है कि मास्टर जी का एक चांटा बर्दाश्त, लेकिन पढ़ाई नहीं मंजूर।
