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Manish Gode

Thriller

4  

Manish Gode

Thriller

सुबह का भूला

सुबह का भूला

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क्षिप्रा नदी के तट पर बसे अवंती नगरी के महाराज भद्रसेन के राज्य में चारों ओर खुशहाली का माहौल था। प्रजा अपने राजा को लेकर बेहद प्रसन्न और सुखी थी। सभी राजा की न्यायप्रियता की कायल थी। वे उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा किये बिना नहीं थकती थी। महाराज भद्रसेन रणकौशल में भी पारंगत थे। एक ओर उनकी बहादुरी के किस्से मशहूर थे तो दुसरी ओर उनकी विनयशिलता और दयावान होने की कहानिया भी बच्चे-बच्चे की जुबान पर थी। युवा अपने महाराज की सेना में भर्ती होने के लिये हमेशा उत्साहित रहते थे। उनमें देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा था।

हालांकी महाराज भद्रसेन के अपने पडौसी राज्यों से अच्छे ताल्लुकात थे, किंतु बुरा समय कब सपने से बाहर आ जायेगा, कोई नहीं बता सकता। कहते है कि शत्रु बाहर से नहीं आता, वह अपनों में से कोई भी हो सकता है। इतिहास गवाह है कि लालच में आकर अपना हितैषी ही अपनी मौत का सामान बनने से नहीं चुकता। ऐसे ही महाराज का एक वफादार सिपाही, कुछ स्वर्ण मुद्राओं के बदले पडौसी राजा को राज की बातें पहुँचाया करता था। एक दिन जबकि चारों ओर अमन और चैन का वातावरण था, महाराज भद्रसेन शिकार पर जाने के लिये तैयार हुए। भोर फटते ही महाराज अपने चुनिंदा सिपाहियों और मातहतों के साथ शिकार पर निकल पडे। काफी दूर जाने के बाद भी उन्हें कोई भी शिकार नजर नहीं आया। दोपहर का वक्त हो चला था। हाँका मारने वाले भी थक कर चूर हो गये थे। महाराज भद्रसेन एक समतल जगह पर डेरा डालने ही वाले थे कि अचानक पडौसी राजा वीरभद्र अपनी सेना की एक टुकडी लेकर उनके साथ मुकाबला करने आ धमका। महाराज भद्रसेन विस्मित नजरों से वीरभद्र को देखने लगे। इतने मधुर संबंधों के बावजुद वह शिकार के समय, बिना किसी पूर्व सूचना के कैसे उन पर आक्रमण कर सकता है भला?

“भद्रसेन, आत्मसमर्पण करने में ही तुम्हारी भलाई है।” वीरभद्र ने चिल्लाते हुए कहा।

“वीरभद्र, यूँ कायरों की भाँती क्या वार कर रहे हो, हिम्मत है तो रणभूमी में अपनी शक्ती आजमा कर देखो, तब पता चलेगा कि कौन किसके सामने आत्मसमर्पण करता है।” भद्रसेन ने उसे ललकारा।

“मैं इतना मुर्ख नहीं कि रणभूमी में अपनी हार का सामना करूँ। मुझे पता है कि मैं तुमसे कभी नहीं जीत सकता, इसलिये तुम्हें कूटनीति से घेर रहा हुँ।” वीरभद्र कुटिलता से बोला।

महाराज भद्रसेन असंमज की स्थिती मे थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि जिस वीरभद्र को उन्होंने अपने छोटे भाई की तरह सम्मान दिया, आज वहीं उसके सामने दुश्मन की तरह खडा था। कितना खुदगर्ज है ये इंसान, वे मन ही मन सोच रहे थे कि अचानक उन्होंने देखा कि एक बाघ, वीरभद्र जिस पेड के नीचे खडे थे, धीरे-धीरे उनकी ओर बढ रहा था।

“सावधान,” कह कर वे अपना भाला लेकर वीरभद्र की ओर लपके। वीरभद्र को लगा महाराज भद्रसेन उन्हें ललकार रहे है। वे भी अचानक होने वाले इस चाल से अनभिज्ञ थे। जब तक वे कुछ समझ पाते, महाराज भद्रसेन ने उस बाघ को अपने भाले के एक ही वार से मार गिराया। बाघ उन दोनों के बीच गिर कर छटपटा रहा था। तब तक वीरभद्र के रक्षकों ने उस पर काबु पा लिया। अब वीरभद्र को काटो तो खून नहीं। वे समझ नहीं पा रहे थे कि वे महाराज भद्रसेन को मारे या उनका आभार माने। आये तो वे उन्हें मारने ही थे, किंतु अब वे लज्जित हो कर जमीन की ओर देख रहे थे। सारे सिपाही दम थामे खडे थे।

“आओ वीरभद्र, नजरे ना झुकाओ। मन से मैल निकाल दो और एक अच्छे पडौसी की तरह फिर से राज करो और अपनी प्रजा की भलाई में अपनी शक्ती लगाओ।” ऐसा कह कर उन्होंने अपनी बाँहे वीरभद्र की ओर फैला दी।

वीरभद्र शर्म से पानी-पानी हुआ जा रहा था। वह धीरे से अपने घोडे से उतरे किंतु आगे नहीं बढ पा रहे थे। तब महाराज भद्रसेन ने खुद आगे बढ कर उन्हें गले से लगाया और कहा, “सुबह का भूला, जब शाम को घर आता है तो उसे भूला नहीं कहते।”   

राजा वीरभद्र की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे।


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