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satish bhardwaj

Drama


4.4  

satish bhardwaj

Drama


सरपरस्त

सरपरस्त

18 mins 320 18 mins 320

मजहर की एक छोटी सी दुकान थी सूट-सलवार और चुन्नी बेचने की। दिन भर में थोड़ी बहुत कमाई हो जाती थी, इतनी कि वो संतुष्ट था। गरीब तबके के लोगो को उसकी दूकान पर कुछ ना कुछ मिल ही जाता था अपनी बीवी या बेटियों को खुश करने के लिए। दूकान के पीछे ही एक कमरे का छोटा सा घर था उसका। कमरे और दूकान के बीच की जगह में एक छप्पर पड़ा था, जो इस घर का आंगन, रसोई और बैठक सब कुछ था। मजहर के परिवार में उसकी बीवी जैमुमा और बस एक 14 वर्षीय बेटी अंदलीब थी। यूँ तो उसकी बीवी को कई बार दिन चढ़े लेकिन कुल बच्चो में से बस ये एक बेटी ही जिन्दा बची थी। तो बहुत लाडली भी थी माँ बाप की।उसकी बीवी सिलाई कढाई का काम करती थी और अंदलीब भी अब पारंगत हो गयी थी इस काम में।

मजहर के सामने ही रहबर की कस्बे की सबसे बड़ी जनाना कपड़ो की दूकान थी। रहबर की दूकान भी उसके घर में ही थी। रहबर की गिनती कस्बे के रईस लोगो में होती थी। मुस्लिम समाज में तो उसे ख़ासा मुकाम हांसिल था। क्योंकि रहबर इमदाद भी बहुत करता था। उसकी दूकान का सिलाई कढाई का काम मजहर की बीवी ही करती थी। दोनों दुकाने कहने को जनाना कपड़ो की ही थी लेकिन दोनों में कोई मुकाबला नहीं था। रहबर की दूकान पर हर तरह का जनाना कपडा मिलता था तो वहीँ मजहर की दूकान पर गिनती का और सस्ता सामान था। मजहर बोलता था कि रहबर मियां की छाँव में उसका भी पेट पल रहा है।

वो कहते हैं ना कि सबसे बड़ी बात है आत्मसंतोष तो मजहर और उसका परिवार अपनी सिमित सी कमाई और जिन्दगी में बेहद खुश था। लेकिन शायद उनकी इस छोटी सी ख़ुशी को भी नज़र लग गयी। मजहर था तो पतला दुबला सा ही लेकिन वैसे कभी नहीं लगा कि वो अपने भीतर कोई गंभीर बिमारी पाले बैठा है। उसके दिल में छेद था, और एक दिन उसके दिल ने उसका साथ छोड़ दिया।

इद्दत का समय तो गुजर गया लेकिन अब जैमुमा के सामने अपना और अपनी बेटी अंदलीब का पेट पालने का सवाल था। क्या करे? एक औरत यूँ ही दूकान पर भी नहीं बैठ सकती थी, बिरादरी में उल्टी सीधी बातें होने लगेंगी। जो सिलाई कढाई का काम वो करती थी उससे भी कोई इतनी कमाई नहीं होती थी।

अब घर में बस वो दोनों अकेली बैठी थी। कहने को तो महीने से भी ज्यादा बीत गया था लेकिन उन दोनों की आँखें अभी भी नहीं सूख पायीं थी। तभी जैमुमा को बाहर दूकान में कोई आहट सुनाई दी। वो उठकर बाहर आई तो देखा रहबर खड़ा है। जैमुमा ने चुन्नी से चेहरा छिपाते हुए दूकान में पड़े तख़्त पर उसे बैठने के लिए कहा और खुद लकड़ी की बेंच पर बैठ गयी। रहबर कुछ कहता वो बोल पड़ी “सिलाई कढाई का काम अब शुरू कर दूंगी, आप भिजवा देना”

रहबर ने गला साफ़ करते हुए कहा “उसकी फिक्र मत करो, कोई और जरुरत हो तो बताओ?

जैमुमा बोली “जी कुछ नहीं बस खैर है, रह रहें हैं आपके साए में”

तभी अंदलीब पानी लेकर आ गयी। रहबर ने पानी पिया और फिर बोला “देख जैमुमा मजहर मेरे छोटे भाई जैसा था...मुझे पता है कि खाली सिलाई कढाई के काम से तो तेरा खर्च नहीं चलेगा। तू ऐसा कर मेरे घर पर घर के काम में हाथ बटा दिया कर और अंदलीब भी वहीँ मेरी बेटी अनम के साथ खेल लेगी। तू तो जानती है अम्मी तो बिस्तर पर ही है, और रुखसाना उम्मीद से है। डॉक्टर ने पूरे आराम को बोला है।”

जैमुमा को लगा कि रहबर को वाकई खुदा ने फ़रिश्ता बना कर भेज दिया उसके पास। वो कुछ बोलती इससे पहले ही रहबर फिर बोलने लगा “देख ये मत समझना कि तुझे या तेरी बेटी को घर की नौकरानी बनने को कह रहा हूँ...ना बिलकुल नहीं। तू मेरे भाई की बेवा है। तेरी इज्जत मेरे दिल में रुखसाना से लेश मात्र भी कम नहीं। अंदलीब भी मेरे लिए मेरी बेटी जैसी ही है। देख वहीँ कुछ घर के काम में मदद कर देना...अपना घर समझ कर और जो सिलाई कढाई का काम हो वो भी वहीँ पर कर देना। सिलाई कढाई से अलग कुछ कमाई हो जाएगी।”

जैमुमा को भला इसमें क्या दिक्कत होती, वैसे भी रहबर की बेटी अनम भी अंदलीब की अच्छी सहेली थी, अनम 12 साल की थी। इससे छोटे दो बच्चे और थे रहबर के और इससे बड़े दो बेटे जो बाहर रहकर पढ़ रहे थे।

जैमुमा और अंदलीब सुबह से ही रहबर के घर पर चले जाते थे। पुरे दिन दोनों माँ बेटी रहबर के घर में ही रहते थे। रुखसाना और अनम का व्यवहार भी बहुत ही अच्छा था। दोनों समय का खाना रुखशाना उन्हें अपने घर पर ही खिलाती थी। और सिलाई कढाई से अलग कुछ और पैसे भी रहबर से मिल रहे थे उन्हें।

सब सही चल रहा था। लेकिन जैमुमा ने महसूस किया कि रहबर उससे बात करने के बहाने तलाशता रहता है। शुरू में उसे ये अपना वहम लगा लेकिन बाद में उसने महसूस किया कि रहबर कहीं ना कहीं उसके नजदीक आने की फ़िराक में रहता था।

एक दिन वो रसोई का काम कर रही थी। अंदलीब अलग कमरे में कुछ कढाई का काम कर रही थी।उसने रहबर की आवाज सुनी। अब उसे रहबर की आवाज से कोफ़्त होने लगी थी। उसके कान भी कुछ ज्यादा ही सजग रहते थे। रहबर अंदलीब को कुछ काम बताने आया था शायद। तभी रहबर की अम्मी ने जैमुमा को आवाज लगायी। वो एकदम भीतरी कमरे में रहती थी। जैमुमा उसके पास गयी। अपनी कुरखली आवाज में वृद्धा बोली “पेशाब की हाजत लगी है, जरा उठाकर गुसलखाने तक ले चल”

जैमुमा ने बेहद ही मधुर आवाज में कहा “जी अम्मी”

जैमुमा बुढिया को अपने कंधे का सहारा देकर गुसलखाने को लेकर चल दी। चलते चलते बुढिया उसे दुवाएं देती चल रही थी। ये उसकी पुरानी आदत थी “अल्लहा तुझे हर नैमत बख्शे, अंदलीब को शाजादे जैसा शोहर मिले” और भी पता नहीं क्या क्या ।वो समय को भी कोस लेती थी कि क्यों इस बेचारी को बेवा बना दिया?

जैमुमा ने बुढिया को वापस बिस्तर पर लेटाते हुए उससे पूछा “और कुछ दरकार तो नहीं अम्मी”

बुढिया ने अनुग्रहित होते हुए कहा “ना मेरी बच्ची तू देख ले अपना काम”

जैमुमा बाहर आई तो देखा अनम रसोई में ही बैठी है। जैमुमा ने पूछा “अंदलीब कहाँ है?”

अनम ने बेपरवाही से कहा “वो तो सिलाई कर रही है। अब्बू कुछ काम बता रहें हैं उसे”

इतना सुनते ही जैमुमा का माथा ठनक गया। वो तेज कदमो से बाहर के उस कमरे की तरफ भाग ली

कमरे का दरवाजा बंद था। ये देखते ही जैमुमा बदहवास हो गयी और अंदलीब को तेज आवाज लगाते हुए तेज तेज दरवाजा पीटने लगी। ये कमरे उपरी मजिल पर थे तो नीचे तो आवाज नहीं जा रही थी। लेकिन आवाज सुनकर रुखशाना आ गयी।

रुखशाना को जैमुमा की बदहवाशी कुछ नागवार गुजरी।

उसने झल्लाते हुए कहा “क्या कयामत टूट पड़ी?... क्यों इतना चिल्ला रही हो?”

तभी कमरे का दरवाजा खोलकर रहबर बाहर आया। उसके चहेरे पर पसीना था और वो घबराया हुआ था। अंदलीब भागकर अपनी माँ से चिपट गयी।जैमुमा पागल सी हो गयी और चिल्लाते हुए बोली “क्या हुआ, क्या किया इस शैतान ने तेरे साथ?”

अंदलीब रोते हुआ बोली “अम्मी तुम ना आती तो बर्बाद हो गयी थी मैं”

अंदलीब 14 वर्ष की थी तो अब बहुत कुछ समझती थी।

रहबर सकपकाते हुए बोला “अरे कुछ नहीं बस सिलाई का काम बता रहा था इसे, खान साहब अपनी बेटी के लहंगे पर कुछ ख़ास कढाई और जरीदारी का काम करवाना चाहते थे”

रहबर आगे भी कुछ कहना चाहता था लेकिन जैमुमा ने उसको एक जोरदार तमाचा मारते हुए उससे कहा “कमरे के दरवाजे बंद करके काम समझा रहा था जलील आदमी, शर्म नहीं आई तुझे, तेरी बेटी की उम्र की है ये।”

रुखशाना जैमुमा को शांत करते हुए बोली “चुप हो जा जैमुमा”

इतने में ही रहबर बोल पड़ा “एक तो तुझे सहारा दिया और उल्टा मेरे पर ही इल्जाम लगा रही है, मेरी बेटी और मेरी बीवी के सामने ही मुझ पर झूठे इल्जाम लगा रही है हर्राफा औरत...तू खुद बदचलन है, और तेरी ये बदचलन बेटी....” वो इससे आगे कुछ बोलता तभी रुखशाना अपनी जलती हुई आवाज में चिल्लाई “आप नीचे जाओ रहबर मियां”

रहबर ने देखा कि रुखशाना की आँखें जल रहीं हैं। वो चुपचाप नीचे दूकान में चला गया।

अंदलीब अब भी रो रही थी। रुखशाना ने अनम को डांट कर अंदर भेज दिया।

जैमुमा ने अंदलीब से कहा चल बेटी अब यहाँ नहीं आयेंगे। फिर वो रुखशाना की तरफ देखते हुए बोली “क्या रुखशाना तुझे भी नहीं दिखाई देता ये सब, तू तो एक औरत है, कुछ भी नहीं बोली।”

रुखशाना की आँखें अब बह रहीं थी। वो रोते हुए बोली “क्या बोल सकती हूँ मैं जैमुमा? और कहाँ जायेगी तू भी अगर यहाँ नहीं आएगी तो? जैमुमा मैं भी तेरी तरह औरत हूँ और औरत हमेशा मर्द की जमीन ही तो रही है। मर्द जब चाहे उसका सीना चीर दे और जब चाहे उस पर अपनी गंदगी उलट दे.....औरत को तो खामोश रहना है।”

जैमुमा ने ताना मारते हुए कहा “वाह रुखशाना वाह... अपने शोहर को सही साबित करने को क्या खूब कही....मतलब यहाँ रोज़ अपनी और अपनी बेटी की अस्मत लुटवाऊँ..”

रुखशाना ने फिर कहा “जैमुमा मैं कौन होती हूँ किसी को सही साबित करने वाली? और ना ही तुझे आने या ना आने को कुछ बोल रही हूँ। जैमुमा मैं बस ये बता रही हूँ कि मैं एक औरत हूँ इसलिए मैं कुछ नहीं...। हम औरतो को तो कुरान की आयतों में भी कोई सहारा नहीं, वो भी इन मर्दों की ही ढाल हैं।”

जैमुमा ने अब चीखते हुए कहा “जब तेरी बेटी के सीने पर कोई शैतान चढ़ेगा तब देखूंगी क्या बोलेगी। अभी तो तू भुस पर लीप रही है।”

रुखशाना को ये बात बुरी लगी वो बोली “अल्ल्ल्हा ना करे कभी ऐसा हो और अंदलीब के साथ भी कभी अल्लहा ऐसा ना होने दे....तेरी मर्जी जैमुमा। तुझसे बड़ी हूँ और तुझसे ज्यादा दुनिया देखि है। याद रख इस दुनिया में हर औरत तेरी तरह मजबूर है और हर मर्द में तुझे एक रहबर ही मिलेगा। मर्द अपनी बीवी के नजदीक भी उस ही मकसद से आता है और किसी और औरत के करीब भी उस ही मकसद से जाता है।” 

जैमुमा अंदलीब को लेकर अपने घर चली गयी।

जैमुमा आ तो गयी थी लेकिन अब उसके लिए जिदगी का सफ़र एक अंधी गली बन गया था। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करे? सिलाई कढाई का जो काम रहबर दे देता था अब तो वो भी नहीं मिलेगा।

जैमुमा आज दूकान को देख रही थी तीन महीने से सब सामान ज्यों का त्यों ही पड़ा था। तभी अन्दर रुखशाना आई। उसे देखते ही जैमुमा का चेहरा बिगड़ गया।

उसने बुझी सी आवाज में जैमुमा से कहा “कैसी है जैमुमा, सब खैरियत?”

जैमुमा ने उखड़े से अंदाज में जवाब दिया “खैरियत सब, कहिये यहाँ आने की तकलीफ क्यों की?”

रुखशाना ने मुट्ठी में रखे हुए हुए कुछ नोट जैमुमा के सामने रख दिए।

जैमुमा ने उन रुपयों को बेरुखी से देखते हुए कहा “क्या रुखशाना आपा ये पैसे दे रही हो मुझे चुप रहने को, मैं तो चुप ही हूँ।”

रुखशाना ने बुझी सी आवाज में कहा “एक औरत की इज्जत को कोई मर्द ही पैसे में तौल सकता है। एक औरत ऐसा कभी नहीं करेगी जैमुमा। तूने जो काम किया ये उसके पैसे हैं, तू लेकर तो आई नहीं थी।”

जैमुमा ने बेहद ही सख्त लहजे में कहा “रखिये अपने पैसे आप अपने पास, मुझे नहीं चाहियें”

रुखसाना की आँखों में अब आंशु थे, वो रूवांसी होते हुए बोली “जैमुमा इतने बड़े बोझ तले मुझे मत दबा। ये तेरी ईमान की कमाई है, हाथ जोडती हूँ रख ले।”

जैमुमा ने कुछ नहीं कहा और रुखशाना वहाँ से चली गयी।

जैमुमा भीतर कमरे में चली गयी। और फिर से इस उहा पोह में उलझ गयी कि करे तो क्या करे?

अगले रोज सुबह जैमुमा जब उठी तो देखा अंदलीब दूकान को सवांर रही है। जैमुमा दूकान में आई और बोली “ये क्या कर रही है?”

अंदलीब ने बेपरवाही से जवाब दिया “दूकान खोलनी तो है ही तो सफाई ही कर लूँ।”

जैमुमा को ये बेहद ही अजीब लगा। वो झल्लाकर बोली “कौन खोलेगा दूकान?”

अंदलीब : हमारी दूकान है तो हम ही खोलेंगे अम्मी!

जैमुमा (आँखे बड़ी करते हुए) : तेरा दिमाग ख़राब हो गया है क्या? बिरादरी क्या कहेगी? कोई जनानी दूकान पर बैठे देखि है क्या?

अंदलीब : तो फिर अम्मी ऐसा कर... घर में पड़ा है चूहों का चालान, दोनों उसे ही खा लेते हैं। अम्मी ये दुनिया रहबर जैसे मर्दों से भरी हुई है, हर जगह वो ही मिलेंगे।

जैमुमा (भावुक होते हुए) : ख़ुदकुशी गुनाह है मेरी बच्ची। एसी बात मत कर....अल्लहा कोई ना कोई रास्ता जरुर दिखायेगा।

अंदलीब : अल्लहा ने तो रास्ता दिखाया हुआ था अम्मी.... ये दूकान। बस हम ही आँखें मूंदे बैठे थे।

जैमुमा को अंदलीब की बातें समझ नहीं आ रही थी। उसने तो कभी किसी मुस्लिम औरत को दूकान पर बैठे नहीं देखा था।

जैमुमा ने समझाने के अंदाज में कहा “बेटी ये तो काफिरों के अंदाज हैं। उनकी औरते बैठती हैं यूँ बाजारों में। मुसलमानों में तो औरते परदे में ही रहती है मेरी बच्ची। ये तू क्या करने को कह रही है?”

अंदलीब : अम्मी हकीक़त में तो हम पर्दों में रहने वाली हैं बाजारू। जब चाहे कोई भी मर्द आकर लुट ले। काफिर तो बोल दिया अम्मी लेकिन क्या देखा नहीं कि कितनी इज्ज़त और आजादी हैं उनमे औरतो को? उनकी औरते काम करती हैं तो इसलिए ही वो किसी की भी जागीरे नहीं।

जैमुमा उसे एकटक निहार रही थी। अपने हाथो से जैमुमा ने अंदलीब की नज़र उतारते हुए कहा “क्या बच्ची जिम्मेदारी ने तो बहुत ज्यादा समझदार बना दिया तुझे” जैमुमा ने अपनी आँखों के आंशु अपने दुपट्टे से पूंछे।

अगले दिन कस्बे में बहुत सी चर्चाएँ थी। क्योंकि अंदलीब और जैमुमा दूकान पर बैठी ग्राहकों को सामान दिखा रही थी। सभी को ये बहुत ही अजीब लग रहा था।

लेकिन अंदलीब और जैमुमा ने दूकान पर बचे हुए सामान और रुखशाना के दिए पैसो से शुरुवात कर दी थी। औरतो के दूकान पर होने से औरतो की आमद कुछ ज्यादा हो गयी थी। जो एजेंट रहबर की दूकान पर थोक में माल बेचने आते थे उनकी निगाह इस छोटी सी दूकान पर भी पड़ी। रहबर बड़ा व्यापारी था तो सबसे तो सामान लेता नहीं था। और जिनसे लेता था उनके साथ भी उसके अपने अलग ही नखरे होते थे। तो जिनका सामान रहबर अपनी दूकान पर नहीं बेच रहा था उन्होंने जैमुमा की दूकान पर अपना सामान बेचने को दे दिया। जैमुमा को ये सामान उधार में मिल गया था। उन दोनों माँ-बेटियों का व्यवहार भी इतना अच्छा और मधुर था कि ग्राहकों को वो मोह ही लेती थी।

इस तरह चार महीने में ही जैमुमा की दूकान से पीछे का हिस्सा भी लगभग दूकान में ही तब्दील हो गया था। ग्राहकों की भीड़ उसकी दूकान से टूटती ही नहीं थी। अब उसकी दूकान पर वो महंगा सामान भी मिलता था जो रहबर की दूकान पर था। रहबर के ग्राहक भी अब टूटकर जैमुमा की दूकान पर जा रहे थे।

रहबर अपनी झल्लाहट ये कहकर निकाल लेता था “मुझे ईमान का खाना है जनाब, लोग उनका सामान नहीं उनकी जवानी देखने जाते हैं। इखलाक नाम की चीज ही नहीं रही। हमने नहीं देखा कि हम मुसलमानों की औरते यूँ बाजारू हो जाएँ”

लेकिन कुछ समय बाद रहबर को जैमुमा की दूकान पर बढती भीड़ से दिक्कत होने लगी थी। क्योंकि अब उसकी दूकान के ग्राहक टूटकर जैमुमा की दूकान पर जा रहे थे। एक तो रहबर उससे पहले से ही चिढ़ रहा था क्योंकि रहबर को लगता था कि जैमुमा और उसकी बेटी ने उसके सम्मान को ठेस पहुंचाई थी। उसने जो भी अंदलीब के साथ करने की कोशिश की थी वो तो उसे अपना हक लगता था।

अब रहबर की छटपटाहट बढती ही जा रही थी। वो अक्सर समाज के लोगो के मध्य अब जैमुमा के यूँ दूकान पर बैठने का विरोध करता रहता था।

जैमुमा की दूकान पर अलसुबह अभी ग्राहक आने भी शुरू नहीं हुए थे कि शहर काजी और कुछ अन्य लोग आकर खड़े हो गये। जैमुमा भीतर ही थी और अंदलीब दूकान लगा रही थी।

शहर काजी और अन्य लोगो को देखकर अंदलीब ने सर को ढककर उनका अभिवादन किया और उन्हें बैठने को कहते हुए अन्दर चली गयी। थोड़ी देर बाद जैमुमा बाहर आई।

जैमुमा : सलाम आलेकुम काजी जी

शहर काजी ने देखा कि जैमुमा ने बस सर पर एक चुन्नी ढकी हुई है।

शहर काजी के माथे में बल पड़ गए। लेकिन फिर अपना जयका ठीक करते हुए शहर काजी ने अभिवादन का उत्तर दिया “वालेकुम अस्सलाम वा रहमतौल्ल्हा”

शहर काजी ने दूकान को निहारते हुए कहा “बीबी मजहर मियाँ जब तक जिन्दा रहे उन्होंने हर मजहबी सिनाख्त को इस घर में बरक़रार रखा। लेकिन अब देख रहा हूँ कि काफिरों के चलन पर आते जा रहें हो”

जैमुमा समझ गयी थी कि शहर काजी आज क्यों आया है? वैसे भी वो समझ रही थी कि अब उसकी दूकान मुसलमानों को खटक रही है। कितने ही लोग थे जो मजहर की मौत के बाद इन दोनो माँ और बेटियों पर अपनी सरपरस्ती का एहसान करना चाहते थे, रहबर की ही तरह। ये दूकान और जैमुमा की आत्मनिर्भरता अब उनके आड़े आ रही थी।

जैमुमा ने संभल कर जवाब दिया : शहर काजी जी हर मजहबी तालीम का सम्मान अब भी इस घर में होता है। बाकी खाली मजहबी तकरीरो को पढ़ लेने से पेट तो नहीं भर जाता ना। पेट भरने के लिए भी कुछ तो करना ही पड़ेगा।

शहर काजी को जैमुमा से ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। बड़े बड़े रईस मुसलमान जिसके आगे गीड़गीड़ाते हों उसे एक औरत वो भी बेवा यूँ सीधे जवाब कैसे दे देगी भला?

शहर काजी ने मौके की नजाकत को समझते हुए जैमुमा से कहा “आज शाम को मदरसे में आ जाना जैमुमा कुछ बात करनी है। और बिरादरी के मोजिज लोग रहेंगे तो थोडा ख़याल रखना”

शहर काजी का इशारा उसके द्वारा बुरका ना पहनने को लेकर था।

शहर काजी चला गया। अंदलीब बाहर आई और बोली “क्यों आये थे शहर काजी जी? अब इन्हें भी दिक्कत है हमारी दूकान से..”

जैमुमा ने कोई जवाब नहीं दिया लेकिन वो जानती थी कि कितनी बड़ी मुसीबत उनपर टूट पड़ी है।

मदरसे में कस्बे के 10-15 लोग इकठ्ठा थे। रहबर भी बैठा था।

जैमुमा अभी तक नहीं आई थी। उनमें आपस में बातें चल रही थी।

रहबर बोल रहा था “जनाब हम तो कुछ कह नहीं सकते । चालचलन तो इन दोनों माँ बेटियों का पहले से ही गलत था बस ये है कि मजहर था तो निगाह थी इनपर, अब तो ये आजाद हो गयीं हैं। मैंने घर पर काम के लिए बोल दिया था और अपनी तरफ से जो हो रही थी वो मदद कर रहा था। लेकिन इन्हें तो खुला चुगना था।”

तभी एक व्यक्ति बोला “काजी जी माँ बेटी बिना चुन्नी के यूँ ही झुक झुक कर मर्दों से बातें करती हैं। लोंडे खूब आते हैं खरीदारी करने को, उन लोंडो भला क्या चाहिए और”

रहबर ने उसकी बात बीच में रोकते हुए कहा “साहब मैं तो सामने ही रहता हूँ, सारे आला-करम देखता हूँ इन माँ-बेटियों के। लोंडो से हंस हंस कर बातें करती हैं, और दो तीन हिन्दुओ के लोंडे तो अब लगे बंधे आ रहें हैं। वो तो देर सबेर भी आने लगे हैं.....और दूकान नहीं सीधे भीतर घूसते हैं। लोगो में तरह तरह की बातें हो रही हैं”

ये हिन्दुओ के लोंडो वाली बात रहबर ने झूठ कही थी लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव इसने ही किया था वहाँ बैठे लोगो पर।

इतने में ही जैमुमा आ गयी तो उन लोगो में एकदम चुप्पी छा गयी।

जैमुमा ने बुर्का पहना हुआ था।

शहर काजी ने आते ही जैमुमा की सुने बिना ही अपनी कहनी शुरू कर दी “सुन जैमुमा जिस तरह तू और तेरी बेटी यूँ बाज़ार में बैठ रहीं हैं ये इस्लामी चलन नहीं और जायज़ भी नहीं। तू दूकान बंद कर अपनी और रही बात तेरे खर्चे की तो रहबर मियां तुझे काम देने को तैयार हैं। इनके घर पर काम कर तुझे रोटी भी मिलेगी और पैसा भी। जल्द ही हम तेरी बेटी के लिए कोई अच्छा सा लड़का देखकर उसका निकाह कर देंगे, उसकी फ़िक्र तू मत कर।”

जैमुमा को सुनकर बड़ा अजीब लगा। किसी ने उसकी सुनी ही नहीं बस तुरंत अपना फैसला सुना दिया।

जैमुमा ने कहा “काजी जी रहबर मियां की निगाह मेरी बेटी को लेकर ठीक नहीं है और मैं जानती हूँ कि आपको भी इन्होने ही भड़काया है”

इस इल्जाम के लगते ही रहबर फट पड़ा “काजी जी मैं इसलिए ही इस मसले में नहीं पड़ना चाह रहा था। ये बदजात औरत मुझ पर ही इल्जाम लगा गयी। जबकि मैंने हमेशा इसकी मदद की”

शहर काजी और वहाँ बैठे बाकी लोगो ने रहबर का ही समर्थन किया।

शहर काजी अब कड़े लहजे में बोले “बद जुबानी मत कर बेवकूफ औरत। जनानी है तो उस तरह ही रह। बेवा हो गयी तो इसका मतलब ये नही कि अब तूम दोनों माँ बेटियों की अपनी मर्जी से चलेगी। दूकान वुकान बंद कर और जैसा कहा है वैसा कर।”

जैमुमा को अब गुस्सा आ गया “काजी जी कोई चोरी या जीना-खोरी नहीं कर रहीं हूँ। और मेरी बेटी पर मुझे फक्र है। वो कोई गाडी चोर नहीं है तुम्हारे बेटे की तरह। जिसे तुम थानों में जाकर छुड़ा कर लाते हो।”

शहर काजी के तीन लड़के थे और तीनो ही पक्के वाले गाडी चोर और अपराधिक किस्म के थे। लेकिन शहर काजी के बेटे थे तो शहर काजी कुछ ना कुछ करके उन्हें बचा ही लेता था। लेकिन यूँ सब लोगो के बीच में एक औरत उस पर ऐसे ऊँगली उठा दे, ये उसे अच्छा नहीं लगा। वो एकदम चीख पड़ा और एक भद्दी गाली उसने जैमुमा को दी।

जैमुमा ने रहबर को उस दिन जो तमाचा मारा था वो रहबर भूला नहीं पाया था। रहबर के पौरुष पर गहरी चोट लगी थी उस दिन। आज रहबर को मौका मिल गया था। रहबर उठा और एक जोरदार लात जैमुमा के पेट पर मारी जैमुमा की चीख निकल गयी और वो जमीन पर गिर गयी। जैमुमा की आँखों में अँधेरा छा गया था।

शहर काजी बोला “बकवास करती है बदजात औरत। एक तो तेरी मदद करना चाहते हैं ऊपर से हमपर ही गलत इल्जाम डाल रही है।

जितना कहा है उतना सुन समझी नहीं तो मजहब की तौहीन तो तुझे करने नहीं देंगे बिलकुल भी।”

जैमुमा अब मजबूर हो उनकी बाते सुन रही थी।

रहबर ने कहा “काजी जी इसकी बेटी गलत नहीं है लेकिन ये उसे भी गलत बना देगी।”

शहर काजी ने रहबर से कहा “कोई नहीं आप अपने घर का काम काज करवाओ उससे, बाकी मदरसे में भी दिन में एक बार आ जाया करेगी और कुछ साफ़ सफाई कर दिया करेगी। कुछ पैसे मदरसे से भी दिलवा दूंगा”

शहर काजी ने भी अपनी संभावनाएं तलाश ली थी अंदलीब को लेकर।

वहाँ खड़े बाकी लोग बोल पड़े “सुभान अल्लहा... काजी जी आप हैं तो किसी मजलूम या माजूर को कोई दिक्कत नहीं होगी”

शहर काजी ने चहेरे पर मुस्कान लाते हुए कहा “बस अल्लहा की मेहरबानी हैं, आप जैसो की इमदाद से हो जाता है सबकुछ”

फिर सब लोग वहाँ से चल दिए।

जैमुमा और उसकी बेटी की जिन्दगी का फैसला हो गया था।

रहबर कुछ याद करते हुए पीछे मुड़ा और शहर काजी से कहा “वो काजी जी जो आप बता रहे थे मदरसे में वाटर कूलर और कुछ सामान के लिए... मैं आपको पैसे दिलवा भेजूंगा, मंगवा लीजियेगा आप। देखिये दूकान से फुर्सत नहीं हो पाती है और फिर आपकी तो जानकारी भी बहुत है। मुझसे तो बेहतर ही सौदा करेगा कोई आपके लिए।”

शहर काजी ने सहमती में गर्दन हिलाई और आँखें मिचमिचा कर मुस्कुराते हुए अनुग्रह प्रकट किया।



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