सपने अपने सच हुए.
सपने अपने सच हुए.
सपने अपने सच हुए.
गाँव के बाहर एक पुराना, घना इमली का पेड़ था।
सूरज ढलते ही कोई उस तरफ़ जाता नहीं था।
गाँव वालों का कहना था—
“यह पेड़ चुड़ैलों का अड्डा है, ख़ासकर चुड़ैल सपना का!”
उसी गाँव में रहता था सार्थक—
खुद को गाँव का सबसे बड़ा रोमांटिक समझने वाला युवक।
हर लड़की से प्यार करने की कोशिश करना
उसकी आदत थी, और ठुकराया जाना उसका अनुभव।
एक दिन दोस्तों ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा—
“अगर तू इतना ही आशिक़ है,
तो इमली के पेड़ वाली चुड़ैल सपना को पटाकर दिखा!”
सार्थक मुस्कराया—
“वाह! ये तो सबसे अलग लव स्टोरी होगी।”
🌙 पहला सामना
अगली ही रात,
सार्थक इमली की एक टोकरी लेकर
इमली के पेड़ के नीचे जा पहुँचा।
अचानक हवा ठंडी हो गई,
इमलियाँ गिरने लगीं,
और सामने सफ़ेद साड़ी में,
लंबे खुले बालों के साथ
चुड़ैल सपना प्रकट हुई।
सार्थक का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा,
फिर भी उसने हिम्मत जुटाई—
“सुना है आपको इमली बहुत पसंद है…
ये आपके लिए है।
क्या आप मेरा प्यार स्वीकार करेंगी?”
सपना ज़ोर से हँसी—
इतनी ज़ोर से कि चमगादड़ उड़ गए।
“लोग मुझे देखकर भाग जाते हैं,
और तू इमली लेकर प्यार माँगने आया है?”
😂 हास्य का मोड़
सार्थक बोला—
“भागना तो भूतों का काम है,
मैं तो दिल से आया हूँ।”
सपना ने इमली उठाई और बोली—
“ठीक है, लेकिन शर्त है—
शादी के बाद मैं पेड़ पर उल्टा लटककर इमली खाऊँगी।”
सार्थक झट बोला—
“कोई बात नहीं,
मैं खट्टी चीज़ों का दीवाना हूँ!”
दोनों हँस पड़े।
सार्थक को लगा—
उसे सपना से सच में प्यार हो गया है।
👩 माँ की योजना
लेकिन सार्थक की माँ को यह रिश्ता
बिल्कुल मंज़ूर नहीं था।
माँ बोली—
“चुड़ैल से शादी?
नाम भी मत लेना!”
माँ ने उसके लिए
एक सीधी-सादी, पुरानी सोच वाली लड़की ढूँढ ली।
सार्थक मन ही मन बोला—
“ये तो इमली से भी ज़्यादा खट्टी है।”
माँ बोली—
“बेटा, ये चुड़ैल-वुड़ैल सब गाँववालों का डर है,
असलियत कुछ नहीं।”
सार्थक सोच में पड़ गया—
“क्या सपना सच में डर है,
या मेरी आँखों का सपना?”
😱 डर का सच (जो हँसी में बदल गया)
गाँव में लोग बच्चों को
चुड़ैल की कहानियाँ सुनाकर डराते थे।
लेकिन जब माँ ने शादी के लिए
“घी निकालने को उँगली टेढ़ी की,”
तो सच्चाई सामने आ गई।
असल में चुड़ैल सपना कोई थी ही नहीं—
वह गाँववालों की कल्पना थी,
डर से गढ़ी हुई एक कहानी।
🎭 शादी का दिन
शादी वाले दिन सबको लगा—
अब तो चुड़ैल आएगी,
इमली का पेड़ हिलेगा,
कुछ अनहोनी होगी।
लेकिन हुआ क्या?
इमली के पेड़ से
सिर्फ़ इमलियाँ गिरीं।
कोई चुड़ैल नहीं आई।
गाँव वाले एक-दूसरे का मुँह देखने लगे।
🏏 क्लीन बोल्ड
सार्थक हँसते हुए बोला—
“माँ, आपने मुझे चुड़ैल से नहीं,
अपनी टेढ़ी चाल से क्लीन बोल्ड कर दिया।”
गाँव वाले ठहाके मारकर बोले—
“चुड़ैल तो डर थी,
असल चुड़ैल तो ज़िद निकली!”
🏁 समापन
सार्थक की शादी हो गई।
इमली का पेड़ आज भी खड़ा है—
अब डर का नहीं,
कहानियों का गवाह।
बुज़ुर्ग कहते हैं—
“ये पेड़ भूतों का नहीं,
इंसानों की कल्पना का अड्डा है।”
और चुड़ैल सपना?
वह आज भी ज़िंदा है—
कभी डर में,
कभी मज़ाक में,
और कभी…
किसी आशिक़ के खट्टे-मीठे सपने में। 🌙🌿
— समाप्त

