सफ़र-ए-ज़िंदगी
सफ़र-ए-ज़िंदगी
एक शहर को अपना उजड़ा हुआ आशियाँ मान जब एक छोटा बच्चा अपने गम को ठेंगा दिखाकर दूसरे की तरफ कदम बढ़ाता है तो जान पड़ता है कि वो अपने अनजान सफ़र पर निकल पड़ा है।
जैसे-जैसे उसके कदम आगे स्वयं ही उठने लगे उसको जीवन की लय-ताल का अंदाजा लगने लगता है।
ऐसा ही एक बालक था प्रमोद, छोटी उम्र में ही उसकी पीठ जमींदार की लाठियों से स्पर्धा कर मजबूत हो गयी थी। उसके पिता ने ना जानें कितने यत्न सहे पर एक स्वतंत्र घर छोड़ कर अपने नाम कुछ भी ना कर सके जो अब उस काल सम जमींदार की भेंट चड़ने वाला था यदि प्रमोद उसको अपना पूरा जीवन समर्पित ना कर देता।
पर प्रमोद को ये हरगिज़ मंजूर नही था, वो निकल पड़ा अपने सफ़र पर जिसमे ना कोई मंज़िल थी ना ही कोई कालीन जिसपर वो आराम से अपने सफ़र का मज़ा ले पाता, बस उसमे था तो एक उद्देश्य जो रोज़ सड़क किनारे सोने से पहले उसको जोर ज़ोर से बताता कि तेरा बाप घर पर अकेला भूखा सो रहा है और तेरी माँ स्वर्ग से तुझे हर दिन इधर उधर मरते देख रही है।
उसका मन इतना मजबूत हो चुका था कि ना वो दो दिन तक कुछ खाता और ना ही किसी के आगे अपने भूखे हाथ खोलता।
जैसे जैसे दिन और हफ्ते बीतते गए और उसकी पूँज़ी भरती गयी वो खत लिखकर अपने पिता की खोज खबर भी नही ले सकता था चूंकि वो चार दिन छोड़कर कभी स्कूल नही गया और उसकें विशाल मन को छोटा साबित कर पाना किसी "स्मार्ट फोन" के बस की बात नही थी।
वो दो साल की कड़ी मेहनत के बाद जब गाँव लौटा तो वहाँ का नज़ारा देखकर उसकी बडी़-बड़ी आँखें पानी से भरकर सूज गयी।
उसने देखा कि उसके बाप का अस्त-व्यस्त पड़ा कंकाल उसकी राह निहार रहा था।
उसके मुँह से ना कोई आवाज निकली ना ही निकली किसी गम में डूबी कोई सिसक जो गाँव वालो को एक पल विचलित भी कर पाती।
उसने अपने बाप का अंतिम संस्कार स्वविधि से किया चूंकि वो जात से "चमार" था उसका आंतरिक विलाप किसी पंडित को सुनाई नही दिया, वो जमींदार को उसके पैसे देकर अपने अनज़ान सफ़र पर वापस लौट गया।
उसकी आग बुझी तो नही पर उसको आगे बढ़ने की शक्ति देती गयी।
उसके बचकानी बदले संतोष में बदलकर रह गए। अब तो वो बड़ा हो चुका है और आज भी जब वो अपने बंगले में बैठ आसमान की तरफ देखता है तो माँ-बाप की याद उसे बस यही पछतावा याद दिलाती है कि काश ये सफ़र थोड़ा पहले शुरू हो गया होता तो "प्रमोद" का जीवन आज "प्रमोद" से भरा होता।
