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Neeraj pal

Abstract


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संत चरित्रावली।

संत चरित्रावली।

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प्राचीन समय की बात है एक बहुत बड़े महान संत हुए। जिनका नाम मनको जी बोदला था।उनका सारा परिवार पुत्र, पुत्री एवं उनकी पत्नी दिन-रात भगवान की सेवा में ही लगे रहते थे।वह घर के खूब धनी थे, उनके घर में अन्न की कोई कमी नहीं थी, गाय, बैलऔर भैंसें काफी थे।

 एक बार देश में अकाल पड़ा मनुष्य और पशु बिना अन्न और चारे के मरने लगे। संत ने अपनी पत्नी से कहा-" देखो भगवान के अनंत रूप हैं, हम उन्हें पहचानते नहीं और कहा करते हैं भगवान भला किसी को दर्शन देते हैं, वह तो एक अनंत शक्ति हैं। उसका दर्शन इन आंखों से किसी को आज तक नहीं हुआ। परंतु आज वह भूखे और दरिद्र के रूप में खूब दर्शन दे रहे हैं।वह हमसे पूजा चाहते हैं।अतः आज तो तुम भगवान के रूप का दर्शन करो और भोजन अन्यथा वस्त्रों से उनकी पूजा करो। तुम यह समझो कि भूखे को अन्न, प्यासे को जल, नंगों को वस्त्र, रोगियों को औषधि देना भगवान की सच्ची पूजा है, और देखो दान का अभिमान न आ जाए नहीं तो सारी पूजा निष्फल हो जाएगी।भगवान की बड़ी कृपा हो तब तुम्हारी सेवा स्वीकार करते हैं, यही भाव बना रहना चाहिए।नम्रता पूर्वक मीठी वाणी से सब का सत्कार करते हुए ही पूजा अर्पण करनी चाहिए। पति की आज्ञा मानने वाली उनकी पत्नी ने बड़ी प्रसन्नता से आज्ञा स्वीकार की। भूखों को अन्न, नंगों को वस्त्र, अनाथों को आश्रय मिल गया। दूर-दूर से सैैैकडों कंगाल और भूखे लोगों की भीड़ आने लगी संत और उनकी पत्नी बड़े प्रेम से सब का सत्कार करने लगे उनके पास धन तो बहुत न था, इसलिए जल्दी समाप्त हो गया, अन्न समाप्त हो गया, वस्त्र भी समाप्त हो गए। सोना, रत्न आदि बेचकर जो कुछ मिला वह भी खिला दिया। घर में चारा न रहने के कारण पशु दान कर दिए।

 अब दूसरों की मजदूरी करके पेट पालने लगे। लेकिन वे बड़े प्रसन्न थे। उनके प्यार ने सच्चा आनंद प्रदान किया।हृृदय को निर्मल बना दिया। समस्त सद्गुणों नेे इस प्रकार की बाधाएं दूर कर दी।

 संत का नियम था एकादशी को मंदिर जाते थे और गंगा में स्नान करके भगवान के दर्शन करते। द्वादशी के दिन पर ग्रामीणों को भोजन कराते। गरीबों को अन्न, वस्त्र बाँट त्रयोदशी को घर लौट आते। इस साल उनके पास एक पैसा भी न था। बड़ी चिंता हुई किस तरह निभाया जाए, उनको एक उपाय सूझा रास्ते में जंगल पड़ा, आपने सूखी लकड़ियों का गट्ठा बनाया और लेकर मंदिर पहुंचे। वह तीन पैसे में बिका ,बस- फिर क्या था इन पैसों से फूल, पत्ते लिए और स्नान करके भगवान के मंदिर का पूजन किया और रात्रि जागरण किया।

सबेरे द्वादशी थी।वह फिर जंगल गए ,एक गट्ठर और लाये, उसे बेचकर फिर आटा लाए और किसी ब्राह्मण की प्रतीक्षा करने लगे कि भोजन कराऊँ।पर सूखा आटा कौन ले ? न साग और न ही दाल।दोपहर हो गई और किसी ब्राह्मण ने सूखा आटा लेना स्वीकार नहीं किया। संत के नेत्र भर आए और सोचने लगे कि आज मेरा व्रत भंग हो गया, परंतु प्रेम का स्वाद तो प्रेम स्वरूप भगवान ही जानते हैं।

 उन्होंने सुदामा के चावल बड़े स्वाद से खाए थे, शबरी के जूठे बेर बड़े ही भाव युक्त होकर खाये थे और विदुर के घर से प्रेम में इतने विभोर हो गए फलों को छोड़कर ही छिलका खाने लगे। आज वही संत के सूखे आटे का स्वाद लेने के लिए एक बूढ़े ब्राह्मण के रूप में लाठी टेकते हुए उनके सामने आए और कहने लगे हैं-" बड़ी भूख लगी है ,तेरे पास कुछ खाने को हो तो दे दें। संत की मनोकामना पूर्ण हुई , यह सोचकर जाने ब्राह्मण केवल आटा लेंगे या नहीं। आज मेरे पास केवल सूखा आटा है और कुछ नहीं।आप स्वीकार करें तो यह उपस्थित है।"

 ब्राह्मण बोले-" अरे भक्त! भूख में यह नहीं देखा जाता और यह नहीं देखा जाता कि साग है कि नहीं। पेट भरे की बात है।तू चार उपले ले आ और मैं अभी बना कर खा लूंगा। मुझे बहुत भूख सता रही है।"

 संत ने तुरंत भागकर कंडे ला दिए।ब्राह्मण बैठकर आग जला, भोजन की तैयारी करने लगे। रूक्मनी जी भी वृद्ध का रूप धारण कर भगवान से बोलीं, आज आप ब्राह्मण का अकेले ही भोजन करने क्यों आ गए ? ऐसा शुद्ध अन्न शुद्ध मन का निर्माण करता है। मेरा भी मन पवित्र होगा। यह कह का आटा माढ़ा और बाटी बनानी प्रारंभ कर दी।

 संत ने सोचा आटा थोड़ा है और यह दो प्राणी हैं भूखे रह जाएंगे। भोजन तैयार हो गया। ब्राह्मण ने संत से कहा- "भाई तुम भी भोजन करो।" उन्होंने कहा- "आप कीजिए मैं तो आपकी जूठन का एक कण पाकर ही तृप्त हो जाऊंगा।

 फिर क्या था- जगन्नाथ भागन और जगदंबा श्री रुक्मणी जी ने भरपेट भोजन किया, और तृप्त होकर संत से बोले- लो तुम भी भोजन करो और यह कहते-कहते थोड़ी देर से आंखों से ओझल हो गए। संत को पता लग गया यह तो हमारे साक्षात भगवान कृष्ण ही थे।

 उसी क्षण संत जी मंदिर में दर्शन करने गए देखा कि भगवान मुस्कुराते हुए उनकी ओर देख रहे हैं। कृत्य-कृत्य हो गए और कहने लगे- "भगवान आपकी दया बड़ी विचित्र है। बड़े-बड़े के स्वादिष्ट व्यंजन छोड़ कर इस गरीब के सूखे आटेपर रीझ गये,मुझ़े कृताार्थ कर दिया। भगवान ने कहा-" भाई मैं तो सबके यहां ही जाना चाहता हूं, परंतु मुझे पूछते ही नहीं है। ऐसा कैसे हो सकता है ? संत ने पूछा।

 देखो- धनी के यहां भोज बने हैं ,मैं भी वहां जाऊंगा, तुम भी देखना कि हमारा कितना सत्कार होता है। दूसरे दिन वे धनी के द्वार पर पहुंच गए। एक हजार पत्तलें और आसन बिछ गये। मुनीम जी निमंत्रित ब्राह्मणों के नाम लिखे और पुरारते जाते, कि फालतू आदमी न आ जाए। भगवान बूढे के रूप में आ गए।

 बाबू जी ने कहा- आपका नाम लिस्ट में नहीं है। भला इस तरह तो बहुत से लोग आ जाएंगे। आप को भोजन यहाँ नहीं मिलेगा ,अपना रास्ता देखो।

 ब्राह्मण देवता भी बड़े हठीले थे। वह एक पत्तल पर जा कर बैठ गए और कहा-" मैं तो भाई भोजन करके ही जाँऊगा। जहां तुम्हारे यहां एक हजार आदमियों का भोजन है, एक बुड्ढा ब्राह्मण और सही , भूख से मेरे प्राण निकले जा रहे हैं, थोड़ा भोजन कर लेने दो।

 बाबूजी बहुत बिगड़े और कहा कि यहां भोजन नहीं है जल्दी बाहर जाओ।

 फिर भी नहीं हटेऔर कहा-" भाई कुछ भी कहेंं, अब तो मैं भोजन करके जाऊंगा।

 बाबूजी का पारा चढ़ गया। ब्रह्मण ने बहुत प्रार्थना की लेकिन उन्होंनेेे एक न सुनी। और अपने नौकरों से पकड़वा कर बाहर उठा दिया।

संत यह सारा दृश्य देख रहे थे, भगवान नेेे पास आकर कहा- यह सब दृश्यय देख लिया हम जैसों को यहां कौन भोजन देता है।परंतु मनुष्य का अभिमान एक दिन जरूर चूर हो जाता है।इतने में जोर से आँधी आई,और सब कुछ नष्ट कर दिया।

संत के व्रत का आज तीसरा दिन था।भूख प्राण जलाये जा रही थी, वह घर को वापस चले। भगवान ने संत की दशा देखी ,तो एक रमणीक बगीचे का  निर्माण किया।

यह देख वह संत वहाँ ठहर गये।भगवान ने अपने भक्त की वहाँ सेवा की।फलों से उनकी भूख शान्त की।कुछ देर आराम किया।

नींद खुली तो देखा वहाँ न तो बगीचा है न उसके मालिक।

वह समझ गये, कि ये सारी लीला उनके आराध्य श्री भगवान की है।

"भक्त के वश में हैं भगवान।"


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