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Amita Kuchya

Inspirational

4  

Amita Kuchya

Inspirational

समर्पण

समर्पण

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मनोहर जी को दुकान से लौटते ही शाम हो गई थी, वह काफी निराश से होकर बैठ गये, तब उनकी पत्नी राधा जी उन्हें पानी देते हुए बोली-" अजी आप बड़े दुखी से लग रहे हैं ,आखिर ऐसा क्या हो गया !जो इतने निराश दिख रहे हैं?"


तब राधा जी से मनोहर जी कहते हैं-" देखो आजकल दुकान में दिनों- दिन घाटा पर घाटा हो रहा है। मैं कर्ज भी नहीं चुका पा रहा हूं।जो बैंक से लोन लिया था उसका ब्याज भी बढ़ता जा रहा है।

तब राधा जी सांत्वना देते हुए बोली - " अजी देखिए कोई न कोई रास्ता भगवान जरुर निकाल देगा।आप तो अपनी तरफ से कोशिश कर ही रहे हैं।तभी मनोहर जी बोले -"अपने बस विनय की नौकरी लग जाए तो देखना हमारे घर की सारी परेशानी खत्म हो जाए।"

आप सभी कह रहे हैं अब विनय ही हमारा सहारा बन जाए और हमें क्या चाहिए •••

 थोड़ी देर में •••

विनय अपने इंटरव्यू से लौटता है तब अपने मां-पापा को बताता है ,मां मेरा सिलेक्शन हो गया है।तब मां कहती -" बहुत बढ़िया बेटा, चलो अच्छी खुशखबरी सुनाई है, और तेरे पापा आज कितने निराश थे।


इस तरह बेटे की सर्विस लग जाती है।अब धीरे- धीरे परेशानी मनोहर जी की कम होने लगती है।


एक दिन उनके मित्र व्यापारी अपनी बेटी की शादी प्रस्ताव मनोहर जी के पास लेकर आते हैं और कहते हमारी दोस्ती रिश्तेदारी में बदल‌ जाए तो कितना अच्छा हो,न हमें न लड़का ढूंढना पड़ेगा और न तुझे लड़की••• बता अब तेरी क्या राय है। मनोहर जी बड़े खुश होकर कहते -हां हां मेरे लिए इससे अच्छी क्या बात होगी।अपनी स्वाति बिटिया है ही इतनी गुणी••• आज ही मैं विनय और राधा से बात करता हूं।


फिर सबकी रजामंदी से स्वाति और विनय की शादी हो जाती है।अब स्वाति जी बहुत खुश रहती उन्हें गुणी बहू जो मिल गई थी।


अब स्वाति के आते ही घर में मानो लगता मां‌ लक्ष्मी की कृपा हो गई हो।इस तरह उसे ससुराल में राधा जी बिल्कुल बेटी जैसी रखती न रोक टोक ,न दूसरी सास जैसी ताने बाजी करती।


इस तरह मनोहर जी लगता था।चलो बहू के कदम बड़े शुभ है,पूरे समर्पण से स्वाति ने सबको अपना लिया था,वह सबका बहुत अच्छे से ख्याल रखती । अब मनोहर जी को लगता कि उनकी छोटी बिटिया विनीता है। बस उसकी शादी हो जाए।

कुछ समय पश्चात स्वाति को उल्टी होने लगती है।तब सबने सोचा कि स्वाति मां बनने वाली होगी। इसलिए उल्टी हो रही है ।पर उल्टी रात में होती रही। तब उन्होंने अगले दिन डाक्टर साहब को दिखाया तो पता चला कि वह मां‌ बनने वाली नहीं है। फिर कुछ टेस्ट से पता चला कि उसकी दोनों किडनी खराब हो गई।अब सब परेशान होने लगे।उससे किडनी मैच कराने लगे।तो कोई की मैच ही नहीं हो रही थी।अब उसकी हालत नहीं सुधर रही थी।तब विनीता ने कहा -भाभी को मेरी किडनी मैच करवाने दूंगी।

लेकिन मां ने कहा -"बेटी तेरी शादी होनी है।तू किडनी कैसे दे सकती है ‌।" तब विनीता ने कहा - "अगर मेरी जगह भाभी होती तो‌ क्या वो मुझे नहीं देती। इतना ही कहना हुआ तो भाई गले लगकर बोला नहीं बहन तू रहने दें। तुझे पराए घर जाना है।यही बात का समर्थन उसके पापा ने भी किया।तब वो बोली भाभी हमारे घर के लिए पूरी तरह समर्पित है तो क्या मैं उन्हें मरने के लिए छोड़ दूं?पापा आप भूल गए कि भाभी के आने से घर की किस्मत बदलीं है।तो भी आपकी ऐसी ही सोच है।बेटी और बहु आपके लिए समान नहीं है क्या??"

तब राधा जी कहती हैं कि मैं तुझे कैसे कुएं में ढकेल दूं।

तब वह भाई को समझाती है।भाई नाम के लिए मां पापा ने भाभी को बेटी माना है।अगर वह इस घर में समर्पित नहीं होती तो क्या हमारा परिवार हंसी खुशी से रहता ? नहीं न •••

इस हालत में भाभी को नहीं देख सकती है इस तरह समर्पित होकर विनीता एक किडनी भाभी को दे देती है।तब उसकी भाभी को एक नयी जिंदगी मिल जाती है। और घर में स्वाति के लौटते ही रौनक हो जाती है।

इस तरह मनोहर जी और राधा जी को अपनी ग़लती समझ आ जाती है कि बहू को बेटी बोलने अकेले से बेटी नहीं बन जाती ,बल्कि उसके लिए कोई त्याग और समर्पण भी करना पड़ता है, इसीलिए बेटी से पहले बहु के बारे कुछ त्याग करना पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए। अपनी बेटी को किडनी देने से मना करने की गलती पर अफसोस होता है। और दोनों कहते हैं विनीता तूने तो हमारी आंखें खोल दी,बहु तो दो कुल की लाज होती है। तूने जो अपनी भाभी के लिए किया वो तो एक मिशाल कायम हो गई।


इस तरह ननद भाभी का रिश्ता एक बहन से बढ़कर रिश्ता हो गया। dऔर स्वाति की जिंदगी में विनीता की अहमियत बढ़ जाती है।आज गर्व के साथ सबसे स्वाति कहती कि समर्पण केवल बहू ही नहीं करती। बल्कि ससुराल वाले भी बहू के लिए समर्पित होते हैं।


दोस्तों -बहू बेटी लक्ष्मी की तरह होती है ,बहू को बेटी की तरह स्वीकार करना चाहिए।जब बहू से समर्पित होने की आशा करते हैं हमें भी उसके प्रति समर्पित होना चाहिए।



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