सिन्दूर की जीत
सिन्दूर की जीत
“प्रवीण ! ये कैसे दिन दिखा रहे हैं हमें ईश्वर। कितने व्रत किए,हवन करवाए पर पता नहीं किसकी नज़र लग गई हमारे परिवार को और नीलू-अबीर की जोड़ी को। एक साल भी नहीं बीता और अबीर-गुलाल पता नहीं कहाँ खो गया। कितने शौक से फौज में गया था वह। कहता था, मेरी दो माँए हैं। एक आप और एक धरती माँ। सभी कहते हैं, अबीर नहीं रहा पर मुझे पता है वह जरूर आएगा। फौज वाले भी तो पता लगा रहे हैं। बेचारी नीलू हमारे लिए दिन-रात एक किए रहती है। बताइए ना, अबीर आएगा न,आएगा न। “और स्नेहाजी फूट फूट कर रो पड़ी।
“सब्र रखो स्नेहा!ईश्वर सभी सही करेंगे। और कितनी परीक्षा लेंगे वे हमारी। तुम्हारे सारे व्रत, हवन, पूजा सभी सफल होंगे।
तुम ही टूट जाओगी तो नीलू को कौन सँभालेगा? वह भी तो अबीर के लिए ही हमारे घर आईथी और अब हमारी ही होकर रह गई। “इतना कहते-कहते प्रवीण जी भी फफक कर रो पड़े। दोनों सच कबूल कर चुके थे पर कहीं एक आस थी अबीर के लौटने की क्योंकि उसकी बाॅडी अभी तक नहीं मिली थी। इसी विश्वास पर दोनों एक-दूसरे को ढाँढस बँधा जी रहे थे। और नीलू, वह तो मशीन बन गई थी।
फौजी पति का सपना देखा था नीलू ने। अबीर जैसा पति पाकर वह निहाल हो गई थी। अबीर उसका पूरा ध्यान रखता था। कभी किसी चीज की कमी नहीं होने देता था। जब भी छुट्टियों में घर आता,एक पल के लिए भी उसे नहीं छोड़ता। नीलू भी उसके संग संग लगी रहती। पर पता नहीं कौन सी वह मनहूस सुबह थी जब वह काॅल आया। “हैलो,मिप्रवीण। अबीर के फादर बोल रहे हैं, अबीर इज मिसिंग। “और तब से नीलू की जिन्दगी बेरंग हो गई। पर उसे अपने सिन्दूर पर भरोसा था। आज भी वह इसी विश्वास में सिन्दूर लगाती थी कि अबीर जरूर आएँगे। तब से वह मशीन बन गई थी। सुबह शाम सब भूल कर, अपने शौक भूल कर वह प्रवीण जी और स्नेहा जी की सेवा में लग गई थी।
क्योंकि वह जानती थी कि अबीर अपने पापा माँ से बहुत प्यार करते थे। उनके इसी सपने को पूरा करने में नीलू ने अपनी जिंदगी लगा दी थी। जब नीलू के माता-पिता उसे ले जाने आए, तो भी वह नहीं गई। “पापा आपने यही सीखा कर मुझे विदा किया था कि अब से वही तेरा घर है, वही तेरे माता पिता हैं। फिर मैं अपने माता-पिता को छोड़ आपके साथ कैसे आऊँ पापा?अबीर जब ये जानेंगे तो बहुत गुस्सा करेंगे। मैं उन्हें नाराज़ नहीं कर सकती पापा। शादी के वचनों में साथ देने का वादा किया था पापा, उसे मैं नहीं तोड़ सकती। मैं उनकी अर्द्धांगिनी हूँ पापा। आधा अंग हूँ। अगर आधा अंग काम करना बंद कर दें तो क्या मैं भी काम करना बंद कर दूँ। नहीं पापा,मुझसे नहीं होगा। आपके संस्कार मुझे इसकी इजाज़त नहीं देते पापा। “और नीलू अपने पापा के गले लगकर रो पडी। “सदा खुश रहो बेटा। “इतना कह वे चले गए। तब से नीलू ने अबीर के परिवार को अपना परिवार मान लिया था।
“पापा-मम्मी आपकी चाय। “प्रवीण जी और स्नेहा जी ने नीलू की आवाज सुनी तो खुद को सँभालने लगे। “तू भी अपनी चाय यहीं ले आ,बेटा। साथ-साथ पीएगें। “हाँ, पापा अभी ले आई। “तीनों अपने गम को एक-दूसरे से छिपाकर हँसने की कोशिश कर रहे थे। ऐसे ही दिन गुजर रहे थे कि जैसे चमत्कार हुआ। शायद ईश्वर को उनका पर दया आ गई। सुबह सुबह आए एक काॅल ने उनकी जिन्दगी बदल दी। “हैलो,मिप्रवीण, बधाई हो। अबीर हमें मिल गए हैं और हमारे पास सुरक्षित हैं। दुश्मनों ने उन्हें कैद कर रखा था जहाँ अपनी बहादुरी दिखाते हुए वे वहाँ से निकलने में कामयाब रहे। कल वे आपलोगों के पास आ रहे हैं। आप सुन रहे हैं न,हैलो,हैलो?प्रवीण जी मानो सुन्न से हो गए हों। उन्हें कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। “स्नेहा,स्नेहा नीलू जल्दी आओ। ईश्वर ने हमारी सुन ली। अबीर ठीक है और कल वापस आ रहा है। “सच कह रहे है आप”।
“हाँ, स्नेहा। नीलू तुम्हारा सिन्दूर जीत गया बेटा। आप सही मैं अबीर की अर्द्धांगिनी हो। “और तीनों एक-दूसरे के गले लगकर फूट फूट कर रो पड़े।
