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Nalini Mishra dwivedi

Drama

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Nalini Mishra dwivedi

Drama

श्यामा

श्यामा

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देखो, बेटा तुझे पूरी दुनिया मे वो काली लड़की ही पसन्द आयी। माँ उसका नाम श्यामा है, क्यू बार बार काली कहती हो। जतिन ने कहा। "काली है तो काली ही कहूँगी ना।" अब वो जैसी भी है इस घर की होने वाली बहू है। लोग क्या कहेंगे, तू कैसी बहू लाई है, मैं कभी उसे इस घर की बहू नहीं बनाउंगी तू देख लेना । माँ शादी मुझे करनी है, लोगों को नहीं । "मै शादी करूंगा तो सिर्फ श्यामा से, वरना किसी भी लड़की से नहीं करूंगा।" श्यामा....... जैसा नाम वैसा रुप, सांवला रंग, बड़ी आंखे ,घुंघराले बाल, बस रंग ही सांवला था (सांवली सलोनी थी मेरी श्यामा) पिछले सात सालों से मैं जानता हूँ उसे, मुझे आज भी याद है, जब वह पहली बार क्लास में आई तो लोगों ने उसके सांवलेपन का मजाक उड़़ाया। जब मैंने उसका उतरा चेहरा देखा तो फिर मैंने सबको चुप कराया, किसी केे रूप रंग का मजाक नहीं उड़ाते हैं तब से उसकी नजर में मैं हीरो बन गया था।

उसके बाद हमारी बातें होने लगी, उससे बात करना मुझे अच्छा लगता था, धीरे -धीरे हमारी दोस्ती हो गई। मुझे मेरे दोस्त चिढ़ाते थे तुम्हे पूरे कॉलेज में यही लड़की मिली थी, पर उनकी बात का मुझ पर कोई असर नही पड़ता था। क्योंकि दोस्ती तो मन से होती है, चेहरे से नहीं।

हमारी दोस्ती कब प्यार में बदल गई, इस बात का एहसास तब हुआ जब मैं ग्रेजुएशन के बाद एमबीए के लिए बाहर चला गया। जब मैंने प्यार का इजहार किया तो उसकी आँखो से खुशी के आंसू छलकने लगे, उसने कहा- प्यार तो मैं भी करती थी पर कहा नहीं , मुझे डर था कहीं मैं इजहार करके अपने दोस्त को ना खो बैठू। अब तो हमारी बातें मुलकाते और भी होने लगी। हमेशा पूछती थी "क्या तुम्हारे घरवाले मुझे अपनाएंगे "। क्यों नहीं अपनाएंगे । मेरी पसंद को मना नहीं करेगे । 

माँ कमरे में चाय लेकर आयी। और बोला -अगर तुम्हारा यही फैसला है तो ठीक है हमें ये शादी मंजूर है। सिर्फ तुम्हारी खुशी के लिए। मैंने माँ को खुशी से गले लगा लिया।

हमारी शादी होती है, मैं बहूत खुश था। माँ ने बहू के स्वागत में पूरी तैयारी की थी। लेकिन मन से नहीं, ये बात श्यामा भी जानती थी। जब माँ ने मुँह दिखाई में उसे गहने दिये तो उसने कहा - " माँ ये गहने आप मुझे उस दिन देना जिस दिन आप मुझे दिल़़ से बहू मानेगी।"

श्यामा.......ने एक अच्छी बहू की तरह पूरे घर को संभाल लिया था, माँ का वो पूरा ख्याल रखती थी। धीरे धीरे माँ के दिल में उसके लिए प्यार पनपने लगा था । एक दिन माँ की तबीयत खराब हो गई। श्यामा ने उनकी सेवा में रात- दिन एक कर दिया था। उसकी सेवा का नतीजा था कि माँ जल्दी ठीक हो गई। उस दिन से माँ श्यामा को दिल से बहू मान चूकी थी।

एक दिन माँ की कुछ सहेलियां मिलने आती हैं। "कावेरी " जरा बुला अपने बहू को, जरा देखू कैसी पसंद है तुम्हारे बेटे की। श्यामा को देखकर ! क्या कावेरी तेरे बेटे की यही पसंद है। तू तो बड़ा कहती थी कि गोरी, चाँद सी बहू लायेगी। पर.... कह कर आपस में हंसने लगीं।

क्या कमी है हमारी बहू में, "माना कि मेरी बहू सांवली है पर मन से नहीं " मैं भी पहले तुम्हारी तरह चेहरे की खूबसूरती पर भागती थी। पर श्यामा से मिलने के बाद मेरी सोच बदल गई। तुम "ममता तेरी तो इकलौती बहू शमा थी गोरी सुंदर, शादी के एक महीने बाद ही तेरे बेटे को लेकर अलग हो गई । " रीता, सुना है तेरी बहू तुझसे घर के सारे काम कराती है।" कावेरी की बातें सुनकर सारी सहेलियों का सिर शर्म से नीचे झुक गया। हमें माफ कर दो हमने तुम्हारी बहू का मजाक उड़ाया। गलती तुम लोगों की नहीं है इस समाज की है "जहाँ मानसिकता बनी हुई है कि बहू चाहिए गोरी और सुंदर"। हमारी सोच बदलेगी तभी समाज बदलेगा।

सारी सहेलियां श्यामा को आर्शीवाद देकर चली जाती हैं माँ श्यामा को बुलाकर गहने देती है और कहती है कि, आज मैं तुम्हें दिल से अपनी बहू मानती हूँ। श्यामा झुकती है पैर छूने के लिए माँ उसे गले लगा लेती है।


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