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श्री राम जी की राजगद्दी

श्री राम जी की राजगद्दी

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युग बदलते ही ईन्सान की सोच भी बदल जाती है , पर धार्मिक ग्रन्थ व उनमें लिखी बाते आज भी वही है । कर्मो का फल ईन्सान को पहले‌ भी भुगतना पड़ता था , और आज भी भुगतना पड़ता है । ईन्सान हो या कोई पन्डित हो , महापन्डित हो , कोई गुरु हो या फिर चाहे कोई देवता ही क्यों ना हो यह नियम सभी पर लागु होता है । यह बात सभी जानते है । अच्छे कर्मो का फल अच्छा होता है और बुरे कर्मो का फल बुरा होता है । माता पिता की आज्ञा का पालन करना यह एक बहुत बड़ा सद्कर्म है । सदियों पहले राज्य प्राप्त करने के लियें कौरवो और पाण्वो में भयंकर युद्ध हुआ था । जिसे लोग महाभारत के नाम से जानते हैं । हर तरफ अनगिनत लाशो के ढैर और निरअपराध मजलुमों के खून से सनी धरती माँ भी महाभारत के युद्ध से काँप उठी थी । महाभारत के युद्ध में वंश के वंश युही तबाह हो गये थे पीड़ियाँ खत्म हो गयी थीं । और का्रण था सिर्फ राजगद्दी प्राप्त करना, राज्य प्राप्त करना ।

पर सायद आपने गौर ना किया हो महाभारत के युद्ध से पहले भी राजगद्दी के लियें एक महाभयंकर युद्ध छिड़ सकता था । भगवान श्री राम और भगवान श्री भरत के बीच , ज्ञात हो कि कैकयी ने भरत को राज गद्दी दिलाने के लियें एक सड्यंन्त्र रचा था । कैकई राजा दशरथ से वचन मांगती है , और उन वचनो में मांगती है श्रीराम के लियें चौदह साल का वनवास और श्री भरत के लियें राजगद्दी । वचनबद्ध राजा दशरथ कैकई की अवहेलना ना कर पाये और उन्होनें श्री राम को चौदह साल का वनवास दे दिया और श्री भरत को राजगद्दी देने का ऐलान कर दिया ।

पिता की आज्ञा मान श्रीराम जी भी खुशी खुशी चौदह साल के वनवास के लिये चले गये । उन चौदह वर्षो के वनवास में श्री राम ने अनैको यातनायें और कष्ट सहे , अनैको दुखो काम सामना करना पड़ा , पर पिता की आज्ञा के कारण उन्हे वो कष्ट भी जन्नत प्रतीत होते थे , और यह माता पिता की आज्ञा का फल ही था जो श्री भरत ने राजगद्दी अस्विकार कर चौदह साल अपने भाई का ईन्तेजार किया ताकि राजगद्दी के असली ह़कदार को ही राज गद्दी प्राप्त हो सके । अन्त में राज्य और राजगद्दी श्रीराम को ही मिली क्योंकि वो एक आज्ञाकारी पुत्र के साथ साथ , भाईयों से विशेष प्रेम रखने वाले भी थे ।

इसलियें मै यह कहता हूँ

मान पिता की बात जो करता अच्छे काम

होता बेड़ा पार है बनते बिगड़ काम ।



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