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sukhwinder Singh

Inspirational

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sukhwinder Singh

Inspirational

शीर्षक: "ज़हरीली प्यास: मरती नदियाँ,

शीर्षक: "ज़हरीली प्यास: मरती नदियाँ,

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​नदी का किनारा अब वह जगह नहीं रही थी जहाँ कभी सुकून मिला करता था। आर्यन और रिया वहाँ खड़े थे, जहाँ दूर-दूर तक सिर्फ प्लास्टिक का अंबार और पानी पर तैरती काली कालिख नज़र आ रही थी। हवा में एक ऐसी भारी बदबू थी जो सीधे कलेजे को चीरती थी। ​रिया ने पानी की तरफ इशारा करते हुए कहा, "आर्यन, कभी सोचा है कि हम किस मोड़ पर आ गए हैं? हम अपनी रूह को साफ़ करने के लिए जिस जल को पूजते थे, आज उसे ही ज़हर पिला दिया। शहरों का सारा कूड़ा, कारखानों का गंदा तेज़ाब—सब कुछ इन नदियों के सीने में उतार दिया गया। हम घरों में लाखों के फिल्टर लगा रहे हैं, पानी को सौ बार छान कर पी रहे हैं, फिर भी बीमारियाँ हमारा पीछा नहीं छोड़ रहीं। जब जड़ ही सड़ चुकी हो, तो डालियाँ कैसे सलामत रहेंगी?" ​आर्यन की आँखों में एक गहरा खालीपन था। उसने झुककर किनारे की गीली, बदबूदार मिट्टी को छुआ और बोला, "हैरत की बात तो देखो रिया, हम तरक्की का जश्न मना रहे हैं और हमारी नदियाँ अपना आखिरी दम तोड़ रही हैं। समुद्र से लेकर छोटी नहरों तक, हमने हर जगह गंदगी का ऐसा जाल बिछाया है कि कुदरत का गला घुट रहा है। लोग कहते हैं कि पानी बिकने लगा है, पर असलियत तो ये है कि अब साफ़ पानी बचा ही नहीं है।" ​उसकी आवाज़ और गहरी हो गई जैसे वह आने वाले कल को देख पा रहा हो। "आज तो हम मशीनों के सहारे जी रहे हैं, पर हमारी आने वाली पीढ़ी का क्या होगा? वो बच्चे जो इस दुनिया में आएंगे, क्या वो सिर्फ कहानियों में सुनेंगे कि कभी नदियाँ नीली और पारदर्शी हुआ करती थीं? हम उनके हिस्से का साफ़ पानी आज ही ज़हर कर रहे हैं। उनके गले प्यासे रहेंगे और उनकी आँखों में सिर्फ रेत और धुआँ होगा। हम अपनी औलादों को विरासत में पैसा नहीं, बल्कि एक प्यासी और बीमार धरती दे रहे हैं।" ​रिया की आँखों से एक आँसू टपक कर उस काले पानी में समा गया। "कितनी बड़ी बेवकूफी है यह सुखविंदर, कि इंसान चाँद पर पानी ढूँढ रहा है और अपनी धरती के बहते अमृत को गटर बना रहा है। अगर आज भी हम न जागे, तो आने वाला कल सिर्फ एक सूखा कब्रिस्तान होगा जहाँ हर प्यासा गला सिर्फ पानी की एक बूंद के लिए तड़पेगा।" ​सूरज पूरी तरह डूब चुका था, और वह काली नदी अंधेरे में और भी डरावनी लग रही थी—जैसे वह अपनी मौत का इंतज़ार कर रही हो। ​सुखविंदर की कलम से: "इंसान ने समंदर को कूड़ादान और नदियों को ज़हर का प्याला बना दिया। याद रखना, मशीनों से छना हुआ पानी शरीर की प्यास तो बुझा सकता है, पर जब कुदरत प्यासी मर गई, तो इंसान का वजूद भी मिट्टी में मिल जाएगा।" ​नेक्स्ट


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