डिग्रियों का बोझ और अक्ल का अकाल
डिग्रियों का बोझ और अक्ल का अकाल
सरकारी स्कूल की घंटी बजी, पर वह घंटी ज्ञान की नहीं, बल्कि एक और थका देने वाले दिन के खत्म होने का ऐलान थी। स्कूल के बरामदे में प्रिंसिपल साहब हाथ में छड़ी लिए खड़े थे। उनके सामने तीन लड़के गर्दन झुकाए खड़े थे, जो क्लास में बैठकर मोबाइल पर 'रील' बना रहे थे। प्रिंसिपल चिल्लाए, "ये स्कूल है या कोई स्टूडियो? पढ़ाई छोड़कर तुम लोग ये क्या तमाशा कर रहे हो?" उनमें से एक लड़का बुदबुदाया, "सर, आजकल पढ़ाई से क्या होता है? एक रील वायरल हुई तो पैसा ही पैसा! ये किताबें तो बस बोझ हैं।" तभी वहां से आर्यन और रिया गुजर रहे थे। आर्यन रुका और लड़के की बात सुनकर कड़वाहट से मुस्कुराया। प्रिंसिपल ने आर्यन को देखा और बोले, "देखो आर्यन, आजकल की पीढ़ी को! इन्हें लगता है कि मोबाइल का कैमरा ही इनकी तकदीर बदल देगा।" आर्यन ने बड़े शांत लहजे में कहा, "सर, गलती सिर्फ इनकी नहीं है। जब हमारा समाज और स्कूल बच्चों को सिर्फ़ 'नंबरों की मशीन' बनाने में लग जाए, तो बच्चे अपनी पहचान स्क्रीन में ही ढूंढते हैं। हमने उन्हें रटना तो सिखा दिया, पर ज़िंदगी जीना सिखाना भूल गए।" अभी यह बहस चल ही रही थी कि गेट पर शोर मचा। सातवीं क्लास का नन्हा राहुल, अपनी फटी हुई किताबों का बस्ता टांगे ज़मीन पर गिर पड़ा था। रिया भागी और उसे उठाया। पता चला कि राहुल स्कूल के बाद पास की कंस्ट्रक्शन साइट पर ईंटें ढोने जाता है ताकि बीमार पिता की दवा ला सके। आज कमजोरी की वजह से उसे चक्कर आ गया था। आर्यन ने उन रील बनाने वाले लड़कों को पास बुलाया और राहुल की तरफ इशारा करके बोला, "देखो इसे! तुम्हें रील बनाने के लिए 'फेम' चाहिए, और इसे अपनी जान बचाने के लिए 'पैसा'। तुम लोग सब कुछ होते हुए भी अक्ल के अंधे बने घूम रहे हो, और यह बच्चा अक्ल की कीमत जानता है, पर इसके पास हालात नहीं हैं।" आर्यन फिर उन प्रिंसिपल और वहां खड़े अन्य टीचर्स की तरफ मुड़ा और बड़े गरजते हुए अंदाज़ में बोला: "साहब, आज का समाज सिर्फ 'रिजल्ट' और 'परसेंटेज' का भूखा है। 95% और 100% नंबर आने पर लोग ऐसे जश्न मनाते हैं जैसे कोई जंग जीत ली हो। पर कोई ये नहीं पूछता कि वो नंबर आए कैसे हैं? कोई रट्टा मारकर लाया है, तो कोई नक़ल की बेवकूफी से। क्या कागज़ पर लिखे वो नंबर मुसीबत में पड़ने पर इस बच्चे की अक्ल का काम करेंगे?" आर्यन की आँखों में एक चमक थी। उसने आगे कहा, "हमने शिक्षा को एक सौदा बना दिया है। गरीब का बच्चा मजबूरी में पढ़ नहीं पा रहा, और अमीर का बच्चा सुविधाओं के नशे में अपनी अक्ल खो रहा है। असली पढ़ाई वो है जो तुम्हें ये सिखाए कि किसी गिरते हुए को कैसे उठाना है, न कि ये कि कैमरे के सामने कैसे चमकना है।" प्रिंसिपल साहब चुप हो गए। उन रील बनाने वाले लड़कों के सिर शर्म से झुक गए। रिया ने राहुल का हाथ थामा और उसे सहारा देकर ले गई। स्कूल की वो पुरानी दीवारें जैसे गवाही दे रही थीं कि आज आर्यन ने वो पाठ पढ़ाया है जो किसी किताब के सिलेबस में नहीं था। विशेष संदेश (सुखविंदर की कलम से) "आज का समाज सिर्फ नंबरों का सौदागर बन गया है। जिसे देखो उसे 95% और 100% की भूख है। लोग खुशियाँ मनाते हैं जैसे उनके बच्चे ने कोई महान जंग जीत ली हो, पर कोई यह नहीं देखता कि वो नंबर कैसे आए हैं। कागज़ पर लिखे वो नंबर कभी ये नहीं बता सकते कि मुसीबत में पड़ने पर वो बच्चा अपनी 'अक्ल' का इस्तेमाल कर पाएगा या नहीं। समाज को 'रिजल्ट' चाहिए, लेकिन देश को 'इंसान' चाहिए। याद रखना, 100% नंबर लाने वाला अगर किसी का दर्द न समझ सके, तो उसकी पढ़ाई महज़ एक सफेद कागज़ है। बच्चों को किताबी कीड़ा नहीं, दुनियादारी का जानकार बनाओ।" — सुखविंदर की कलम से
