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sukhwinder Singh

Thriller

4  

sukhwinder Singh

Thriller

​300 साल का हिसाब

​300 साल का हिसाब

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महल की ऊँची दीवारों पर जब 300 साल पहले चाँद अपनी रोशनी बिखेरता था, तो वह कोई चांदनी नहीं बल्कि एक आने वाले अंधकार का संकेत था। ऊपर के आलीशान गलियारों में इत्र और महंगी शराब की गंध तैरती थी, जहाँ राजा अपनी अय्याशी के नशे में चूर होकर महफ़िलें सजाता था। वह राजा, जिसके लिए औरतें महज़ बाज़ार की वस्तुएँ थीं और प्यार सिर्फ़ एक व्यापार। लेकिन उसी महल की जड़ों में, धरती के सीने को चीरकर बनी एक गुप्त गुफा के भीतर, एक अलग ही दुनिया बसती थी। वहाँ सन्नाटा था, और उस सन्नाटे को चीरती थी सिर्फ़ एक ही आवाज़—'ॐ नमः शिवाय'। राजा का अपना बेटा, राजकुमार, इस चमक-धमक वाली गंदगी से दूर महादेव की भक्ति में लीन रहता था। उसकी आँखों में वो नूर था जो बड़े-बड़े मुनियों को भी नसीब नहीं होता। राजा चाहता था कि उसका बेटा भी उसकी तरह जिस्मों का सौदागर बने, लेकिन राजकुमार ने साफ़ कह दिया कि वह रूहों के मालिक की सेवा करेगा, न कि इंसानी वासना की।

​यही वह पल था जब एक बाप का अहंकार ज्वालामुखी बनकर फटा। नशे और सत्ता के घमंड में चूर राजा ने वो खौफनाक फैसला लिया जिसे सुनकर आज भी उस गुफा की दीवारें रो पड़ती हैं। उसने पीतल और सोने की एक विशाल पेटी बनवाई, जो कोई संदूक नहीं बल्कि राजकुमार के लिए एक ज़िंदा कफ़न था। राजकुमार को घसीटकर उस अंधेरी कोठरी में लाया गया। उसके हाथ-पैरों को लोहे की भारी बेड़ियों से जकड़ दिया गया, उसकी आँखों पर अंधेरे का पहरा बिठाया गया और उसके मुँह को इस तरह बंद किया गया कि एक आह भी बाहर न निकल सके। शरीर के 21 हिस्सों को उस पेटी के भीतर अलग-अलग जंजीरों और तालों से इस कदर लॉक किया गया कि वह राजकुमार अब एक ज़िंदा लाश से ज्यादा कुछ नहीं था। पेटी का भारी ढक्कन जब बंद हुआ और उस पर 21 ताले जड़े गए, तो राजा को लगा कि उसने भक्ति का गला घोंट दिया है। उसने उस पेटी को इस कदर पॉलिश करवाया कि वह दीवार का एक हिस्सा लगने लगी, जिसे कोई ढूँढ न सके।

​सदियाँ बीतती गईं, साम्राज्य मिट्टी में मिल गए, लेकिन उस पेटी के भीतर का सन्नाटा अब एक भयानक शक्ति में तब्दील हो चुका था। राजकुमार ने उन 21 बंधनों के पीछे अपनी रूह को महादेव में विलीन कर दिया और 300 सालों की अखंड साधना ने उसे एक 'सिद्ध आत्मा' बना दिया। उस पेटी को खोलने की हिम्मत अब किसी इंसान में नहीं थी, क्योंकि उसकी हिफाज़त के लिए कुदरत ने अपना पहरा बिठा दिया था। एक विशालकाय कालिया नाग पेटी के चारों ओर पहरेदार बनकर कुंडली मारकर बैठ गया, जिसकी आँखें अँधेरे में भी अंगारों की तरह दहकती थीं। ऊपर से माता काली का रौद्र साया और पवित्र कुरान शरीफ की आयतों का नूरानी घेरा उस पेटी की रक्षा करने लगा। यह मजहबों से ऊपर का एक ऐसा रूहानी गठबंधन था, जिसने उस सिद्ध आत्मा को किसी बड़े मकसद के लिए महफूज़ रखा था।

​वक्त का पहिया घूमा और कहानी 2026 की दिल्ली की गलियों में आ पहुँची। मेट्रो की घरघराहट और जॉब की तलाश में भागते हज़ारों नौजवानों के बीच एक लड़का है—आर्यन। साधारण सा दिखने वाला, मिडिल क्लास परिवार का यह लड़का अपनी जेब में चंद रुपए और दिल में बड़ी उम्मीदें लेकर दिल्ली के पास के एक गाँव से शहर के दफ्तरों के चक्कर लगाता है। आर्यन को पता नहीं है कि उसके सीने में उठने वाला वो पुराना दर्द दरअसल उन 21 बंधनों की याद है। उसे अक्सर सपने में वही गुफा और वही पीतल की पेटी दिखती है, जिसकी सुनहरी चमक उसकी रातों की नींद उड़ा देती है। वह अपनी इस ताकत से अनजान है कि वह जब आँखें बंद करता है, तो पूरी कायनात के तत्व हिलने लगते हैं।

​लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा और दर्दनाक पेंच तो आर्यन के घर में ही छिपा है। आर्यन के पिता, जो आज एक निस्वार्थ और नेक इंसान हैं, जो मोहल्ले भर की सेवा करते हैं और आर्यन को जान से ज्यादा प्यार करते हैं, असल में वही पुनर्जन्म लिया हुआ राजा है। कुदरत का खेल देखिए, जिस बाप ने पिछले जन्म में अपने ही बेटे को 21 तालों में कैद किया था, आज वही बाप अपने बेटे के लिए अपनी खुशियाँ कुर्बान कर रहा है। वह पिता आज आर्यन को महादेव की राह पर चलने की प्रेरणा देता है, जैसे कि वह अनजाने में ही अपने पुराने पापों का प्रायश्चित कर रहा हो। आर्यन को अपने पिता से बहुत प्यार है, पर कभी-कभी उन्हें देखकर उसकी रूह में एक अजीब सी नफरत की लहर दौड़ती है। यह नफरत आर्यन की नहीं, बल्कि उस पेटी में कैद उस आत्मा की है जो आज भी इंसाफ का इंतज़ार कर रही है।

​आर्यन दिल्ली की सड़कों पर जॉब के लिए भटक तो रहा है, पर उसके कदम हर पल उस रहस्यमयी गुफा की ओर खिंच रहे हैं। वह सिद्ध शक्ति अब और ज्यादा समय तक उस पेटी में बंद नहीं रह सकती। 2026 के इस आधुनिक युग में, जहाँ लोग सिर्फ़ मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में खोए हैं, वहाँ एक प्राचीन प्रतिशोध अपनी आग जलाए बैठा है। क्या आर्यन अपने ही बाप को पहचान पाएगा? क्या वह उन 21 तालों को तोड़कर अपनी रूह को आज़ाद कर पाएगा? यह प्यार का बाज़ार नहीं, यह रूहों का वो इंसाफ है जो 300 साल पहले अधूरा रह गया था। अब वक्त आ गया है कि रूहें अपनी नीलामी रोकें और हिसाब बराबर करें।

सुखविंदर की कलम से

​"इतिहास खुद को दोहराता नहीं, बल्कि वह पुराने घावों पर मरहम लगाने या फिर बदला लेने के लिए वापस आता है। आर्यन की आँखों में जो ज्वाला है, वह दिल्ली की चकाचौंध को भस्म कर देगी। यह कहानी महज़ एक दास्तान नहीं, बल्कि उस सिसकती हुई रूह की पुकार है जो 300 साल से उस पेटी के भीतर महादेव का नाम जप रही है। सावधान रहना, क्योंकि जब 21 बंधन टूटेंगे, तो आवाज़ दिल्ली तक ही नहीं, बल्कि सात आसमानों तक जाएगी।"


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