डिग्रियों का बोझ और अक्ल की कमी
डिग्रियों का बोझ और अक्ल की कमी
कहानी: डिग्री का बोझ और रूह की समझ शहर के एक बड़े कॉलेज के बाहर एक सेमिनार चल रहा था। वहाँ मुख्य अतिथि के रूप में एक बहुत ही पढ़े-लिखे प्रोफेसर आए थे, जिनके पास डिग्रियों की लंबी लिस्ट थी। आर्यन और रिया भी वहीं मौजूद थे। प्रोफेसर मंच से बड़े-बड़े शब्दों में भाषण दे रहे थे कि "बिना ऊँची डिग्री और किताबी ज्ञान के इंसान सिर्फ़ एक जानवर के समान है।" भाषण के बाद जब आर्यन और रिया पास के एक स्टॉल पर चाय पी रहे थे, तो वही प्रोफेसर साहब अपनी महँगी गाड़ी के पास खड़े होकर अपने ड्राइवर को बहुत गंदी गालियाँ दे रहे थे। ड्राइवर बेचारा बुजुर्ग था और हाथ जोड़कर माफी मांग रहा था, पर प्रोफेसर का किताबी घमंड सातवें आसमान पर था। रिया से यह देखा नहीं गया। वह आगे बढ़ी और बड़े शांत लहजे में बोली, "सर, शायद आपकी किताबों में ये नहीं लिखा था कि एक बुजुर्ग से बात कैसे की जाती है?" प्रोफेसर ने रिया को ऊपर से नीचे देखा और हँसते हुए बोले, "लड़की, तुम मुझे सिखाओगी? क्या किया है तुमने? मैंने विदेशों से पढ़ाई की है। मेरे पास जितनी डिग्रियाँ हैं, उतना तुम्हारा वजन भी नहीं होगा।" तभी आर्यन आगे आया। उसने प्रोफेसर की आँखों में आँखें डालकर कहा, "सर, आपकी डिग्रियाँ और किताबें अलमारी में सजी हुई तो अच्छी लगती हैं, लेकिन अफ़सोस कि वो आपके व्यवहार में नहीं उतर पाईं। हमारे यहाँ कहा जाता है कि अगर पढ़ने के बाद भी बोलने की तमीज़ और इंसानियत की अक्ल न आए, तो वो आदमी पढ़ाई नहीं कर रहा, बस कागज़ का बोझ ढो रहा है।" प्रोफेसर का चेहरा लाल हो गया, "तुम बदतमीजी कर रहे हो!" आर्यन मुस्कुराया और बड़ी गहराई से बोला, "नहीं सर, मैं बस आइना दिखा रहा हूँ। जो इंसान एक बेबस को इज़्ज़त न दे सके, उसकी पढ़ाई एक गधे की पीठ पर लदी किताबों की तरह है—बोझ तो बहुत है, पर ज्ञान ज़ीरो है। आपने किताबें तो बहुत पढ़ीं, पर लगता है 'ज़िंदगी' पढ़ना भूल गए।" आसपास के लोग तालियाँ बजाने लगे। प्रोफेसर को अपनी गलती का अहसास हुआ या नहीं, पता नहीं, पर उन्हें वहाँ से चुपचाप निकलना पड़ा। रिया ने आर्यन का हाथ थाम लिया और कहा, "आर्यन, आज तुमने साबित कर दिया कि असली 'अक्ल' किताबों के पन्नों में नहीं, इंसान की नीयत और उसकी ज़ुबान की मिठास में होती है।" विशेष संदेश (सुखविंदर की कलम से) "डिग्रियाँ सिर्फ़ कागज़ के टुकड़े हैं अगर वो आपके व्यवहार में न दिखें। पढ़ना-लिखना तब सफल है जब आप किसी को छोटा न समझें। याद रखना, किताबी कीड़ा बनना आसान है, पर 'इंसान' बनना सबसे
