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sukhwinder Singh

Inspirational

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sukhwinder Singh

Inspirational

शीर्षक: अहंकार का अंत

शीर्षक: अहंकार का अंत

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शीर्षक: अहंकार का अंत ​एक बार की बात है, एक धनी व्यापारी को अपनी दौलत और बुद्धि पर बहुत अहंकार हो गया था। वह हर किसी को अपने से छोटा समझता था। एक दिन वह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के दरबार में आया और बोला, "महाराज, मेरे पास इतना धन है कि मैं आपकी पूरी सेना का पालन-पोषण कर सकता हूँ, मुझे किसी की सलाह की ज़रूरत नहीं।" ​गुरु साहिब उसकी आँखों में छिपा अहंकार देख चुके थे। उन्होंने शांति से कहा, "कल सुबह नदी के किनारे आना, तुम्हें एक सेवा दी जाएगी।" अगले दिन जब व्यापारी वहाँ पहुँचा, तो गुरु जी ने उसे एक कीमती पत्थर दिया और कहा, "इसे बाज़ार में ले जाकर इसकी कीमत पता करो, लेकिन इसे बेचना मत।" ​व्यापारी पहले एक सब्जी वाले के पास गया, जिसने उसे दो किलो आलू के बदले पत्थर माँगा। फिर वह एक कपड़े वाले के पास गया, जिसने उसकी कीमत दस थान कपड़ा लगाई। अंत में, वह एक जौहरी के पास पहुँचा। जौहरी ने पत्थर देखते ही माथा टेक लिया और कहा, "यह अनमोल हीरा है, मेरी पूरी जायदाद बेचकर भी मैं इसकी कीमत नहीं चुका सकता।" ​व्यापारी वापस गुरु साहिब के पास आया और सारा हाल सुनाया। तब गुरु जी ने मुस्कुराकर कहा, "यही तुम्हारी अक्ल की परीक्षा थी। जैसे पत्थर की कीमत जौहरी ही जान सकता है, वैसे ही इंसान की कीमत उसकी दौलत से नहीं, बल्कि उसके चरित्र और सेवा से होती है। तुम मिट्टी के ढेरों को अपनी अक्ल समझ रहे थे, जबकि असली अक्ल दूसरों के काम आने में है।" व्यापारी का सिर झुक गया और उसे समझ आ गया कि सच्चा ज्ञान और अक्ल अहंकार त्यागने


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