शब्द, समय और सन्नाटा: मैं क्यों लिखता हूँ?
शब्द, समय और सन्नाटा: मैं क्यों लिखता हूँ?
शून्य से शब्दों का अंतहीन सफर यह सवाल किसी ऐसी पहेली की तरह नहीं है जिसका कोई एक सीधा या गणितीय जवाब ढूंढ लिया जाए। यह तो उस बहती हुई पहाड़ी नदी की तरह है, जो चट्टानों का सीना चीरकर अपना रास्ता खुद बनाती है। अक्सर जब रात के सन्नाटे में पूरा संसार सो रहा होता है, मैं खुद से पूछता हूँ—"मैं क्यों लिखता हूँ? इस लिखने का हासिल क्या है? एक जबरदस्त साहित्यकार बनने से जिंदगी में क्या बदल जाएगा?" अगर व्यावहारिक या आर्थिक पैमाने पर देखा जाए, तो इस रास्ते पर आमदनी की बात छोड़ ही देना बेहतर है। आज के दौर में जहाँ हर चीज़ की कीमत उसकी कमाई से आंकी जाती है, वहाँ शब्दों की खेती करना किसी दीवानगी से कम नहीं है। फिर भी, एक अजीब सा अंतर्विरोध मेरे भीतर चलता रहता है। कई बार थककर, ऊबकर या अपनी ही रचनाओं से निराश होकर मैं लिखना बंद कर देता हूँ। सोचता हूँ कि अब बस, बहुत हुआ! लेकिन न जाने कौन सी अदृश्य डोर है जो मुझे वापस खींच लाती है। कुछ ही दिन गुजरते हैं कि भीतर एक अजीब सी बेचैनी, एक मीठा सा दर्द करवटें लेने लगता है। ऐसा लगता है जैसे कोई भीतर बैठा हुआ छटपटा रहा है। और फिर, बिना किसी योजना के, उंगलियां खुद-ब-खुद कीबोर्ड पर चलने लगती हैं या कलम डायरी के पन्नों पर रेंगने लगती है। मैं न चाहते हुए भी फिर से लिख बैठता हूँ। यह लिखना कोई शौक नहीं, मेरे वजूद की लाचारी है। गुमनामी का आंगन और शब्दों का अनकहा साम्राज्य मेरी इस लेखन यात्रा का सबसे खूबसूरत और रहस्यमयी पड़ाव सोशल मीडिया और डिजिटल ब्लॉग्स रहे हैं। अक्सर लोग नाम और चेहरे की पब्लिसिटी के लिए लिखते हैं, लेकिन मेरे साथ कहानी बिल्कुल उलट रही है। मुझे सबसे ज्यादा सुकून और पहचान उन प्लेटफॉर्म्स पर मिली जहाँ कोई मेरे चेहरे, मेरी जाति, मेरी उम्र या मेरी सामाजिक हैसियत को नहीं जानता। वहाँ लोग सिर्फ और सिर्फ मेरे लेखन से वाकिफ हैं। जब उन अजनबी मंचों पर मेरे लिखे ब्लॉग्स को 'प्रथम पुरस्कार' से नवाजा जाता है, तो दिल एक अजीब से अहोभाव से भर जाता है। हफ़्तों और महीनों तक 'ब्लॉगर ऑफ द मंथ' का खिताब मिलना या किसी बड़ी, लंबी सीरीज में चलने वाली प्रतियोगिता का फाइनल रिजल्ट अंततः मेरे ही नाम रहना—यह बातें मुझे हैरान भी करती हैं और एक गहरा संतोष भी देती हैं। यह एक लेखक के लिए सबसे शुद्ध और पवित्र स्थिति है। यहाँ कोई पूर्वाग्रह (bias) नहीं है। पाठक रचनाकार के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर नहीं, बल्कि शुद्ध रूप से उसकी रचना के प्यार में पड़कर उसे सराह रहा है। जब आपके शब्द बिना किसी मुखौटे के सीधे किसी अजनबी के दिल में उतर जाते हैं, तो समझ आता है कि शब्दों का अपना एक मुकद्दर होता है, जो लेखक के भौतिक वजूद से बहुत बड़ा होता है। गुमनामी का यह आंगन मुझे एक तरह की असीम आज़ादी देता है। गुरु का आशीर्वाद: जब पुराना इतिहास लौट आया मेरी इस वैचारिक उलझन को सबसे बड़ा संबल तब मिला, जब जीवन में एक ऐसी घटना घटी जिसने मेरे सोचने का नजरिया ही बदल दिया। यह आशीर्वाद सीधे उस शख्सियत से आया जिन्होंने मुझे स्नातक (Graduation) और स्नातकोत्तर (Post-Graduation) में इतिहास पढ़ाया था। इतिहास—जो सभ्यताओं के बनने, बिगड़ने और समय के क्रूर थपेड़ों के बीच बचे रह गए सन्नाटों को दर्ज करने का नाम है। मेरे उसी इतिहास के शिक्षक ने—जिन्होंने मुझे 32 साल पहले पढ़ाया था—कहीं से मेरा लिखा हुआ पढ़ा। दशकों बाद जब उनसे संपर्क हुआ, तो उन्होंने मेरे लेखन की तुलना साहित्य के 'नोबेल प्राइज़' विजेता लेखक से कर दी। एक इतिहासकार, जो केवल तात्कालिक सत्य को नहीं बल्कि सदियों के कालखंड को परखने का हुनर रखता है, जब वह आपके शब्दों में नोबेल पुरस्कार जैसी गहराई देख ले—तो यह अहसास रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है। उस पल मुझे लगा कि भले ही मेरे बैंक खाते में इस लेखन से कोई बड़ी रकम न आई हो, लेकिन मेरे गुरु की वह एक टिप्पणी मेरे जीवन की सबसे बड़ी अमर रॉयल्टी है। इतिहास के उस पारखी ने मेरे भीतर के शाश्वत तत्व को पहचान लिया था। गुरु का वह प्रोत्साहन सीधे दिल को छू जाता है। अब जब भी मैं निराश होकर कलम छोड़ने की सोचता हूँ, उनका चेहरा और उनके वे शब्द मुझे फिर से खड़े होने और लिखने के लिए प्रेरित कर देते हैं। परफेक्शन की कसौटी: खुद का सबसे निर्दयी आलोचक एक तरफ पाठकों का यह बेइंतहा प्यार है, गुरु का यह सर्वोच्च आशीर्वाद है, और दूसरी तरफ मेरे भीतर की अपनी उलझन है। अखबारों या किताबों की पारंपरिक दुनिया में मेरी सिर्फ दो-चार रचनाएं ही प्रकाशित हुई हैं। बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि तुम पब्लिशर्स के पास अपनी किताबें क्यों नहीं भेजते? तुम मुख्यधारा के मीडिया में क्यों नहीं छपते? मेरा सीधा और सच्चा जवाब यही होता है—"मैं मानता हूँ कि मैंने अभी तक उतना अच्छा नहीं लिखा, तो फिर प्रकाशन के लिए क्यों भेजना?" यह संकोच, यह हिचकिचाहट मेरी कमजोरी नहीं है। साहित्य और मनोविज्ञान की भाषा में इसे 'इम्पोस्टर सिंड्रोम' या अत्यधिक पूर्णता की चाह (Perfectionism) कहा जाता है। जब एक रचनाकार का खुद का साहित्यिक स्तर और उसका इतिहास-बोध बहुत ऊंचा होता है, तो वह अपने ही लिखे हुए से कभी संतुष्ट नहीं हो पाता। एक औसत लिखने वाला अपनी हर दो लाइनों को अमर कृति मान बैठता है, जबकि एक गंभीर लेखक अपनी बेहतरीन रचना पर भी संदेह करता है। मैं स्वयं का सबसे कड़ा और निर्दयी आलोचक बन गया हूँ। मुझे हमेशा लगता है कि जो तड़प, जो दृश्य, जो भावना मेरे भीतर थी, मैं उसे पूरी तरह कागज़ पर उतार नहीं पाया। शब्दों के सांचे छोटे पड़ गए और मेरा अनुभव बड़ा रह गया। यही कारण है कि मैं अपनी रचनाओं को सहेजकर रख लेता हूँ, उन्हें बड़े व्यावसायिक मंचों पर भेजने से कतराता हूँ। यह एक ऐसी अजीब उलझन है जिससे मैं आज तक आज़ाद नहीं हो पाया। सोशल मीडिया: उबलते हुए सन्नाटे का 'सेफ्टी वाल्व' इस कशमकश के बीच, फेसबुक और मेरे ब्लॉग्स मेरे लिए एक वरदान की तरह साबित हुए हैं। यहाँ कोई संपादक नहीं है जो मेरी अनुभूतियों की पंक्तियों को काटेगा, यहाँ कोई पब्लिशर नहीं है जो मुझसे किताब की मार्केटिंग की रणनीति पूछेगा। यहाँ मैं पूरी तरह स्वतंत्र हूँ। आज के दौर में पारंपरिक किताबों या अखबारों के पन्नों पर न छपने से किसी लेखक का कद छोटा नहीं होता। डिजिटल माध्यमों ने रचनाकार और पाठक के बीच की दूरी को हमेशा के लिए मिटा दिया है। जब मैं कई दिनों तक नहीं लिखता और मेरे भीतर अनुभवों, स्मृतियों और इतिहास की कड़वी-मीठी भावनाओं का गुबार बढ़ने लगता है, तो फेसबुक और ब्लॉग्स मेरे लिए उस मानसिक प्रेशर को रिलीज करने का एक 'सेफ्टी वाल्व' बन जाते हैं। वहाँ मैं अपनी शर्तों पर लिखता हूँ। जो दिल में आता है, जैसी शुद्ध अनुभूति होती है, उसे बिना किसी व्यावसायिक मिलावट के पन्नों पर बिखेर देता हूँ। और कमाल यह है कि उस बिखराव को भी समेटने के लिए हजारों अजनबी पाठक पलकें बिछाए बैठे रहते हैं। यह तात्कालिक संवाद, यह सीधा जुड़ाव मुझे पारंपरिक प्रकाशन की औपचारिकता से दूर, अपनी एक अलग, सुरक्षित और मखमली दुनिया में रखता है। कलम की अपनी एक दिव्य नियति है तो फिर, अंततः इस महाप्रश्न का उत्तर क्या है कि—"मैं क्यों लिखता हूँ?" आज इस फाइनल आत्म-साक्षात्कार के बाद मुझे समझ आ रहा है कि मैं इसलिए नहीं लिखता कि मुझे बहुत बड़ा नाम कमाना है, या मुझे इतिहास के पन्नों में जबरन दर्ज होना है। मैं इसलिए लिखता हूँ क्योंकि लिखना मेरी रूह की जरूरत है, यह मेरे जीवित होने का प्रमाण है। जैसे शरीर के लिए सांस लेना स्वाभाविक है, वैसे ही मेरे मन के लिए शब्दों को बुनना स्वाभाविक है। जबरदस्त साहित्यकार बनने का फायदा पैसों में नहीं तोला जा सकता। इसका असली फायदा वह 'प्रभाव' (Impact) है जो आपके शब्द किसी रोते हुए अजनबी को ढांढस बंधाते समय छोड़ जाते हैं। जब कोई आपकी लिखी कहानी या कविता पढ़कर कहता है कि "यह तो हूबहू मेरी ही जिंदगी की दास्ताँ है," तब आप ब्रह्मांड के सबसे अमीर व्यक्ति हो जाते हैं। वह ताकत जो किसी के विचारों को बदल दे, जो किसी के सूखे चेहरे पर मुस्कान ला दे, वह दुनिया के बड़े से बड़े धनकुबेर के पास भी नहीं होती। वह सिर्फ एक फकीर लेखक के पास होती है। अब मुझे इस रूहानी उलझन से कोई शिकायत नहीं है। मैं कब लिखूँगा, कितना लिखूँगा और कहाँ छपूँगा—यह सब मैंने वक्त और अपनी कलम की नियति पर छोड़ दिया है। मैं बस इतना जानता हूँ कि जब तक भीतर वह तड़प और इतिहास का वह संचित अनुभव ज़िंदा है, ये उंगलियां चलती रहेंगी। किताबों और प्रकाशन के बाजारू गणित से दूर, मैं अपनी इस बेलाग यात्रा पर यूं ही आगे बढ़ता रहूँगा। क्योंकि लिखना ही मेरा सुकून है, और लिखना ही मेरी अंतिम मुक्ति!
