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Piyush Goel

Drama Classics

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Piyush Goel

Drama Classics

शादी मुबारक हो, श्वेता

शादी मुबारक हो, श्वेता

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जिस दिन की तैयारी पिछले कई महीनों से चल रही थी, आज वही दिन है। टेंट वालों ने घर को पूरी तरह सजा दिया है, ज़मीन पर फूलों की चादर बिछाई जा चुकी है, घर के बाहर लगी लड़ियाँ रात में भी पूरे मोहल्ले को रोशन कर रही थीं और यही रौनक घर के हर सदस्य के चेहरे पर दिखाई दे रही थी। सुदीप जी के चेहरे पर थोड़ी चिंता की लकीरें ज़रूर थीं, लेकिन मन ही मन आज उन्हें संतोष भी था। आज का पल उनके लिए सबसे कीमती और खूबसूरत है, क्योंकि आज एक पिता को बेटी दूसरे घर भेजनी है। यह वही क्षण है जिसका घर को इंतज़ार भी होता है और डर भी।

घर में रिश्तेदार आए हुए हैं, किसी कमरे से मौसियों के हँसने की आवाज़ आ रही है तो कुछ छोटे बच्चे घर में ही पकड़म-पकड़ाई खेल रहे हैं और इधर-उधर दौड़ रहे हैं। घर में शोर मच रहा है, पर ये शोर किसी के कान में चुभ नहीं रहा क्योंकि शायद इसी शोर का इंतज़ार हर शुभचिंतक को था।

इसी शोर के बीच सुदीप जी घर की रसोई में गए, जहाँ पर सुमित्रा जी खाने की तैयारी में मदद करवा रही थीं। सुदीप जी ने सुमित्रा को आँखों के इशारे से अपने पास बुलाया और कहा, “दोपहर के खाने की तैयारी हो गई? रिश्तेदारों का खाना लगवा दो क्योंकि फिर तुम्हें पार्लर भी जाना होगा, और श्वेता कैसी है? उसे कब तैयार होने के लिए भेजना है?”

सुमित्रा जी ने कहा, “बस अभी ही भेज रही हूँ, अभी कमरे में होगी। दिनेश गाड़ी में छोड़ आएगा उसे पार्लर में।”

सुदीप जी ने आँखों से हाँ का इशारा किया और वो श्वेता के कमरे की ओर चले गए।

कमरे में एक बड़ा सा टीवी लगा हुआ है, एक स्टडी टेबल बनी हुई है जिस पर कुछ किताबें और लैपटॉप रखा हुआ है। बेड पर श्वेता बैठी हुई है। श्वेता का रंग गोरा है, उसने अभी येलो कलर का सूट पहन रखा है। श्वेता के साइड में दो लड़कियाँ और हैं। सुदीप जी के कमरे में दाखिल होते ही उन दोनों लड़कियों का ध्यान अचानक से सुदीप जी की ओर चला गया।

सुदीप ने कहा, “हर्षिता, गुड्डू, एक बार रसोई में जाकर अपनी मौसी की मदद करा दो।”

हर्षिता और गुड्डू दोनों कमरे से चली गईं। सुदीप जी श्वेता के सामने बैठ गए और उसकी आँखों में देखने लगे। लगभग एक मिनट तक सुदीप जी अपनी बेटी की आँखों को देख रहे थे। शायद वो आँखों को नहीं, उनमें बसी यादों को देख रहे थे। उस एक मिनट में उन्होंने श्वेता का बचपन, उसका उँगली पकड़कर चलना, उसकी कच्ची आवाज़ में पहली बार “पापा” सुनना, पार्क में झूला झूलना, रोज़ स्कूल तक छोड़कर आना और वापस लाना, सर्दियों में आग सेकते हुए साथ बैठना, भोलेपन में की गई सारी नादानियाँ, कभी “पापा” को “पापी” बोल देना, तो कभी सुदीप जी का श्वेता के बाल बनाना, उसे नए खिलौने दिलाना, रूठने पर उसे प्यार से मनाना, यह सब सुदीप जी को उन आँखों में नज़र आ गया।

वही आँखें जिनकी रोशनी से अब कोई और घर रोशन होने वाला था। सुदीप जी और श्वेता एक-दूसरे की आँखों में देखने लगे तभी श्वेता ने ज़ोर से पापा को पकड़ लिया और उनके गले से जा लगी। उस वक्त वह कमरा सबसे खूबसूरत पल का साक्षी बन गया। उसने पापा और बेटी के प्रेम को देख लिया। दोनों की आँखों से आज पानी नहीं, मोती बहने लगे। यह मोती खारे पानी से नहीं बल्कि पिता-पुत्री की सुनहरी यादों से बने थे।

सुदीप जी कमरे से बाहर आ गए और रुमाल से अपनी आँखों को साफ़ कर उन्होंने दिनेश से कहा, “श्वेता को पार्लर ले जा और वहाँ से सीधा वाटिका में ही आ जाइयो। लड़के वालों से भी बात हो गई है, उनके यहाँ से बारात आठ बजे चलेगी।”

सुदीप जी का आदेश मानकर दिनेश तुरंत श्वेता के कमरे में गया और उससे पार्लर चलने को कहा। श्वेता ने भी आँखें साफ़ करीं और दिनेश के साथ पार्लर जाने के लिए गाड़ी में बैठ गई।

गाड़ी चलने लगी और उससे भी तेज़ रफ्तार से श्वेता के दिमाग में विचार चलने लगे।
आज से मैं किसी की पत्नी हो जाऊँगी। आज से मैं कुंवारी नहीं रहूँगी। एक नया सफर आज शुरू होगा। कैसे करूँगी मैं सब कुछ? मम्मी जितना पापा और मेरे लिए करती हैं, मैं उतना कभी सोहन या उनके पेरेंट्स के लिए नहीं कर पाऊँगी। मैं अगर एक अच्छी बहू नहीं बनी तो मेरे पेरेंट्स पर क्या बीतेगी? नए घर में नए लोग होंगे, नए रिश्ते होंगे, मैं सब कुछ कैसे करूँगी? अब तक तो एक बेटी की तरह मासूम थी, मम्मी-पापा को जो बोलो, वो सब मेरे लिए ला देते थे, पर अब... अब तो मैं बहू हो जाऊँगी। शायद मुझे हक़ भी न रहे कि मैं किसी से कुछ माँग भी सकूँ। कान्हा जी, मैं अब आपके भरोसे हूँ, आपको ही मुझे संभालना होगा।

श्वेता यह सब सोच ही रही थी तभी उसे ज़ोर का झटका लगा। उसने दिनेश की तरफ देखा। दिनेश ने कहा, “बेटी, पार्लर आ गया। तुम्हारी बुआ यहाँ पहले से हैं, जाओ अंदर तैयार हो जाओ।”

शाम हो गई। श्वेता के चचेरे भाई ने उसे पार्लर से पिक कर लिया था और वाटिका की ओर जा रहा था। कार में अमिश ने श्वेता से कहा, “बहन, अब तो तेरी शादी का दिन आ गया। अभी मेरे साथ है, बाद में तो तू जीजा जी के साथ ही गाड़ियाँ मारा करेगी।”

श्वेता हल्का सा मुस्कुराई और बोली, “कैसी बातें कर रहे हैं भैया, उनके साथ घूमूँगी तो सही लेकिन वो भाई-बहन वाला सुकून नहीं मिलेगा। आपके होते हुए कभी मुझे सगे भाई की कमी महसूस नहीं हुई और आज जब मैं यह घर छोड़कर जा रही हूँ तब मुझे आपके साथ लड़ना, रात को लॉन्ग ड्राइव पर जाना, सब याद आ रहा है। मैं जैसे ही कहती थी मेरा मूड ख़राब है, आप तुरंत मेरे लिए मेरी फेवरेट आइसक्रीम ले आते थे। आप मेरे भाई भी हो और बेस्ट फ्रेंड भी, लेकिन आज मुझे आप सब को छोड़कर जाना पड़ रहा है भैया। मैं कैसे रहूँगी आप सब के बिना?”

अमिश ने खुद को संभाला और एक लंबी साँस ली और कहा, “बहन, तू ऐसे क्यों कह रही है? तू पराई नहीं हो रही। तू अभी भी मेरे लिए मेरी प्यारी नकचढ़ी बहन ही है। बस तुझे आज से एक नया सफर शुरू करना है।”

श्वेता ने कहा, “पर इस सफर में मेरा साथ देने वाला कोई नहीं होगा भैया, सब मुझे खुद ही करना होगा।”

अमिश ने कहा, “बहन, हम हमेशा तेरे साथ हैं। तू कभी खुद को अकेला मत समझियो। कभी भी कोई भी दिक्कत हो, तू उसी वक्त मुझे बताइयो। आज शादी में तेरी मनपसंद वनीला फ्लेवर की आइसक्रीम रखवाई है, तेरे कमरे में पहुँचा दूँगा।”

श्वेता और अमिश दोनों हँस पड़े। गाड़ी वाटिका तक पहुँच गई।

वाटिका में सुदीप जी बाकी रिश्तेदारों के साथ पहले से मौजूद थे। श्वेता के आते ही सुदीप जी ने उसे रूम में लेकर जाने का इशारा कर दिया। दिनेश श्वेता को वहाँ ले गया। वक्त बीतने लगा और मेहमान आने लगे। सुदीप जी हर किसी का हाथ जोड़कर अभिवादन करते और आने के लिए उनका सम्मान करते। सुदीप जी का सामाजिक दायरा बहुत बड़ा था, इसलिए उनकी शादी में भी कम लोग नहीं आने वाले थे। एक के बाद एक गाड़ी गेट पर आ रही थी।

इन्हीं गाड़ियों की भीड़ में एक ब्लैक गाड़ी वाटिका के गेट पर रुकी। गाड़ी में से क्रीम कलर का कोट-पैंट पहना सुदीप जी की ही उम्र का एक आदमी बाहर निकला। उस आदमी का रंग गोरा था और चेहरे पर हल्की-हल्की दाढ़ी थी। गाड़ी की ड्राइविंग सीट से वाइन कलर का कोट-पैंट पहना 5'11 हाइट का नौजवान बाहर आया। उस नौजवान के बाल घुँघराले और घने थे, बाएँ हाथ की कलाई में महँगी घड़ी थी और दाएँ हाथ में काला रबर बैंड था। उस नौजवान ने गाड़ी की चाबी वैलेट वाले को दी और गहरी आवाज़ में कहा, “इसे पार्क कर देना, थैंक यू।”

वैलेट वाले ने चाबी ली और गाड़ी को पार्क करने चला गया। वह नौजवान अपने पिता के साथ वाटिका में प्रवेश करता है। सुदीप जी हाथ जोड़कर अभिवादन करते हुए कहते हैं, “आइए आइए, प्रेमनाथ जी। हमारी बेटी की शादी में आकर आपने हमें खुश कर दिया। सार्थक बेटा, अब अगला नंबर तुम्हारा ही है।”

प्रेमनाथ जी हँस पड़े और बोले, “आते कैसे नहीं सुदीप जी, श्वेता मेरे लिए भी बेटी जैसी ही है।”

यह कहकर सब हँस पड़े और प्रेमनाथ और सार्थक अब सुदीप जी के पास से चले गए।

प्रेमनाथ जी अपनी उम्र के लोगों के साथ बैठने चले गए और सार्थक वाटिका में घूमने लगा। तभी उसकी नज़र ब्लैक कोट-पैंट पहने युवक पर गई। सार्थक उस युवक की तरफ गया। सार्थक को देखते ही युवक के चेहरे पर मुस्कान आ गई। सार्थक और उस युवक ने एक-दूसरे को कसकर गले लगा लिया और दोनों का मन खुशी से झूम उठा।

सार्थक ने कहा, “कैसा है भाई? बहुत टाइम बाद मिले। ग्रेजुएट होने के बाद मिलने का टाइम ही नहीं मिलता।”

यश ने कहा, “सही कह रहा है ब्रो। कॉलेज के बाद मिलना कम हो गया है। तू बता, तू ठीक है?”

सार्थक हल्का सा मुस्कुराया और कहा, “मुझे क्या होगा भाई, मैं तो एकदम बढ़िया हूँ।”

यश ने सार्थक की पीठ थपथपाई और कहा, “सार्थक, तू मुझसे भी चीज़ें छुपाएगा अब? जानकर भी अनजान मत बन।”

सार्थक ने कहा, “मैं कुछ नहीं छुपा रहा भाई।”

यश कुछ कहने ही वाला था कि तभी उसकी नज़र उनकी तरफ आती हुई गुलाबी लहँगा पहने लड़की पर पड़ी। लड़की ने पास पहुँचकर यश को गले से लगाया और सार्थक को साइड हग किया। लड़की के चेहरे पर मुस्कान थी।

यश ने कहा, “आ ही गई प्रेरणा तू भी। मुझे तो लगा था कि तू आज नहीं आएगी।”

प्रेरणा ने कहा, “आती कैसे नहीं यश? श्वेता की शादी है। मुझे तो आना ही था। कॉलेज में तुम सब से पहले मैं ही श्वेता से मिली थी, याद नहीं है क्या तुझे?”

फिर प्रेरणा ने सार्थक की तरफ मुँह फेरा और कहा, “तू बता भाई, तू कैसा है? कॉलेज के बाद मिलना कम ही हो गया।”

सार्थक ने थोड़ा चिढ़कर कहा, “तुम सब मुझसे ही आज ऐसे सवाल क्यों कर रहे हो? मुझे क्या होगा? मैं बिल्कुल ठीक हूँ।”

यश ने सार्थक के कंधे पर हाथ रख लिया और कहा, “शांत भाई शांत, टेक ए डीप ब्रीथ।”

सार्थक ने लंबी साँस ली और प्रेरणा की तरफ मुड़कर कहा, “सॉरी बहन, मैं तुझ पर ख़ामख़ा चिल्ला पड़ा।”

प्रेरणा ने हँसकर कहा, “पागल है क्या? सॉरी क्यों बोल रहा है? बहन मानता है न, इतना तो भाई-बहन में चलता है।”

कुछ एक-दो मिनट तक ये तीनों हँसी-ठिठोली करते रहे फिर पीली साड़ी पहने लगभग 55-56 साल की महिला इनकी तरफ आई। यश और सार्थक ने उस महिला के पैर छुए और प्रेरणा ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

उस महिला ने कहा, “तुम सब श्वेता के दोस्त हो? श्वेता अंदर कमरे में है, जाओ श्वेता से मिल लो।”

यह सुन सार्थक इधर-उधर देखने लगा। यश ने सार्थक के कंधे पर हाथ रख लिया और प्रेरणा ने कहा, “जी मौसी जी, हम अभी मिलने जाते हैं।”

उस महिला ने कहा, “जल्दी जा बेटा, श्वेता इंतज़ार कर रही होगी।”

ऐसा कहकर वह महिला चली गई। कुछ सेकंड वहाँ शांति रही। यश और प्रेरणा एक-दूसरे को देख रहे थे जैसे आँखों-आँखों में कुछ बात करना चाह रहे हों। उस शांति को प्रेरणा ने तोड़ा और कहा, “तुम दोनों यहीं रुको, मैं श्वेता से मिलकर आती हूँ।”

यश ने भी प्रेरणा की बात का समर्थन किया। तब सार्थक ने कहा, “नहीं बहन, श्वेता तुम दोनों की दोस्त है, तुम दोनों जाओगे और मैं…”

यह कहकर सार्थक अचानक से रुक गया। प्रेरणा और यश एक-दूसरे को देखने लगे। यश ने सार्थक से कहा, “भाई, तुझे यहीं रहना है तो मैं रुकता हूँ तेरे साथ।”

प्रेरणा ने भी यश की बात में हामी भरी। तब सार्थक ने लंबी साँस ली और कहा, “रुको, मैं भी तुम लोगों के साथ चलूँगा। आखिर श्वेता को बधाई भी देनी तो ज़रूरी है।”

प्रेरणा ने कहा, “भाई, तू पक्का श्वेता से मिलना चाहता है?”

सार्थक ने एक गहरी साँस ली और उसने कहा, “ब्राइडल रूम में चलो।”

सार्थक, यश और प्रेरणा ब्राइडल रूम की तरफ बढ़ने लगे। यश और प्रेरणा के मन में हल्की सी हिचकिचाहट थी, वहीं सार्थक के चेहरे पर एक अजब सा कॉन्फिडेंस था। ऐसा लगता था जैसे वो यह क्षण देखना भी चाहता हो और न भी देखना चाहता हो। प्रेरणा और यश कभी एक-दूसरे को देखते तो कभी सार्थक की तरफ इस तरह देखते कि सार्थक को भी यह बात पता न चले।

ब्राइडल रूम जैसे-जैसे नज़दीक आ रहा था, यश और प्रेरणा के कदम धीमे हो रहे थे और सार्थक के कदम तेज़ हो रहे थे। यश, प्रेरणा और सार्थक ब्राइडल रूम के दरवाज़े के सामने खड़े थे। यश और प्रेरणा ने एक-दूसरे की तरफ देखा। सार्थक ने एक लंबी गहरी साँस ली और दरवाज़े को खटखटाया।

तभी अंदर से पिंक कलर का लहँगा और गले में सोने की चैन पहने हुई एक 24 साल की गोरी लड़की ने दरवाज़ा खोला। दरवाज़े पर सार्थक, यश और प्रेरणा को देखकर लड़की के चेहरे पर मुस्कान आई और उसने मुस्कुराकर कहा, “अंदर आओ भैया, दीदी अपने कॉलेज के दोस्तों का इंतज़ार कर रही हैं। प्रेरणा दीदी, आप तो घर की हो फिर भी इतनी देर से। चलो कोई ना, अंदर आओ, दीदी इंतज़ार कर रही हैं।”

प्रेरणा, यश और सार्थक कमरे के अंदर गए। कमरे में उन्होंने सोफे पर बैठी श्वेता को देखा। श्वेता ने मैरून लहँगा-चुन्नी पहन रखी थी, माथे पर छोटी सी बिंदी थी, कानों में सुंदर झुमके, होठों पर हल्की-हल्की गुलाबी लिपस्टिक थी, गले में आर्टिफिशियल सोने का सेट था और सिर से लेकर पैर तक ऐसा लगता था जैसे रति ने कामदेव के लिए श्रृंगार किया हो।

श्वेता ने अपना चेहरा हल्का सा ऊपर उठाया और प्रेरणा को देखकर मुस्कुराई, पर अगले ही क्षण चिंता के बादलों ने श्रृंगार किए हुए चाँद को ढक लिया जब श्वेता की नज़र सार्थक पर पड़ी।

श्वेता ने तभी अपनी छोटी बहन से कहा, “दीक्षा, मम्मी के पास जाकर देख लो कि कहीं उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत न हो।”

दीक्षा अपनी बहन का इशारा समझ गई और कमरे से बाहर चली गई।

प्रेरणा ने श्वेता को गले से लगा लिया। यश ने श्वेता से हाथ मिलाया और उसे साइड हग किया, और सार्थक श्वेता की आँखों में देखने लगा। माहौल के अंदर सन्नाटा था जैसे सबके मन में बहुत से प्रश्न हों लेकिन पूछने का साहस किसी में न हो।

प्रेरणा ने माहौल को हल्का करने के लिए कहा, “जीजू में क्या खूबी देखी श्वेता जो तुरंत उन्हें हाँ कर दी?”

सार्थक जो अब तक शांत था, उसने कटाक्ष भरे स्वरों में कहा, “इस सवाल का जवाब तो मैं भी जानना चाहता हूँ।”

यश ने सार्थक के कंधे पर हाथ रखा जैसे उसे चुप रहने का इशारा किया हो।

श्वेता ने यश से कहा, “उसे क्यों चुप करा रहे हो यश? आज क्यों न वो बातें पूरी कर ले जो सालों पहले अधूरी छूट गई थीं। आज से मैं एक नया सफर शुरू करने जा रही हूँ तो क्यों न अपने पुराने सफर को ढंग से किनारा ही कर लूँ।”

सार्थक ने एक कुटिल मुस्कान भरी और कहा, “यही तो शिकायत है तुमसे श्वेता, तुमने मुझे हमेशा सफर ही माना, न कि मंज़िल।”

प्रेरणा ने बीच-बचाव करते हुए कहा, “आज खुशी का दिन है, पुरानी बातों को याद मत करो।”

सार्थक ने जवाब दिया, “बहन, बीच में मत बोल। कॉलेज से मैं तुझे बहन मानता आया हूँ और तू जानती है कि मेरे कितने सवालों के जवाब अधूरे हैं।”

प्रेरणा के पास इसका कोई प्रतिउत्तर नहीं था। यश ने भी अपनी आँखें नीची कर ली थीं। प्रेरणा ने यश को बाहर चलने का इशारा किया और वो किसी काम के बहाने बाहर चले गए। अब कमरे में केवल सार्थक और श्वेता अपने सवालों के साथ खड़े हुए थे।

श्वेता: कहो, आज इतने सालों बाद अचानक मेरी याद क्यों आई? ऐसी क्या मजबूरी आन पड़ी कि सार्थक गोयल को मेरी शादी में आना पड़ा?

सार्थक: मैं यहाँ कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं आया हूँ। सुदीप अंकल और पापा काफी पुराने दोस्त हैं। सुदीप अंकल ने घर पर कई बार फोन किया था इसलिए मुझे भी शादी में आना पड़ा।

श्वेता: अब बात समझ में आई। सार्थक अपने पिता श्री की बात कैसे ठुकरा सकते हैं? सार्थक अगर किसी की बात को बिल्कुल अनदेखा और अनसुना कर सकता है तो वो है अपनी प्रेमिका की बात। सारी दुनिया बहुत प्यारी है सार्थक को लेकिन अपनी प्रेमिका के लिए तो आप पर वक्त ही नहीं होता था।

सार्थक: तुम अर्थ का अनर्थ कर रही हो श्वेता। मुझे यहाँ आना पड़ा क्योंकि अंकल ने बहुत प्यार से हम लोगों को शादी में बुलाया था। वो क्या है न, आज भी कुछ लोग रिश्ते-नातों की अहमियत समझते हैं और जानते हैं कि रिश्ता कोई गुड्डा-गुड़िया का खेल नहीं होता जो जब मन में आए तब तोड़ दिया।

श्वेता: रिश्तों के बारे में ऐसी उच्च बातें उस इंसान के मुँह से शोभा नहीं देतीं जिसने केवल समाज के डर से प्रेम के रिश्ते को ठुकरा दिया हो। तुम नहीं जानते सार्थक, प्रेम में हारे इंसान की क्या दशा होती है। किसी दूसरे इंसान पर विश्वास करना तो दूर, उसे देखने तक में डर लगने लगता है।

सार्थक: तुम तो इस तरह कह रही हो जैसे तुमने अकेले ने प्यार किया हो। प्यार तो मैंने भी किया था तुमसे और आज भी करता हूँ। प्रेम में तुम अकेली नहीं हारी हो श्वेता, प्रेम में मैं भी हारा हूँ। पापा कह-कह के थक गए कि मेरी शादी की उम्र हो गई, लेकिन उन्हें कैसे बताऊँ कि मैं आज भी तुम्हारे अलावा किसी और को देख नहीं सकता।

श्वेता: वाह सार्थक वाह, अभी भी नहीं बदले तुम। कॉलेज के दिनों से तुम यही करते आ रहे हो। अपने शब्दों के जाल में मुझे फँसाते जा रहे हो और आज भी वही शब्दों का जाल मेरी तरफ फेंक रहे हो, लेकिन अफसोस, आज मैं तुम्हारे शब्दों के जाल में नहीं फँसूँगी सार्थक।

सार्थक: किस चीज़ को शब्दों का जाल कह रही हो श्वेता? मेरा हर एक शब्द सच्चा होता है। तुम मुझे जानती हो और तुम्हें पता है कि मेरे हर एक शब्द पर तुम्हारा अधिकार होता था। लोग पूछते थे मुझसे कि किसके लिए प्रेम पत्र लिख रहे हो और मेरा एक ही जवाब होता था, “श्वेता।”

श्वेता: यही तो मेरी शिकायत रही है तुमसे सार्थक। तुम्हारा प्रेम कभी भी कागज़ से बाहर निकला ही नहीं। कविताओं, शायरियों में तुमने कहा कि तुम मेरे साथ हमेशा रहना चाहते हो लेकिन सच तो यह है कि सार्थक, तुम्हें मुझसे ज़्यादा समाज की परवाह थी, अपने पेरेंट्स की परवाह थी। तुम्हारा प्रेम इतना कच्चा था कि वो कभी अपने लिए लड़ नहीं पाया।

सार्थक: शायद तुम सही कह रही हो श्वेता। था मेरा प्रेम कच्चा, लेकिन तुम्हारा प्रेम कौन सा शुद्ध था? परिवार के खिलाफ तो तुम भी नहीं गईं। जब मैंने तुमसे कहा कि मिलकर परिवार वालों से बात करते हैं, तुमने कह दिया कि तुम अंकल के खिलाफ नहीं जाओगी और इस बारे में उनसे बात नहीं करोगी। प्रेम को अपने अंजाम तक पहुँचाने के लिए मैं अकेला तो ज़िम्मेदार नहीं हो सकता श्वेता। मैंने हमेशा तुमसे कहा है कि प्रेम करना आसान है, प्रेम निभाना मुश्किल और प्रेम को सफल करना तो बहुत मुश्किल होता है, लेकिन प्रेम भी सफल हो जाता है अगर दोनों प्रेमी कोशिश करें तो।

श्वेता: क्या कहना चाहते हो? मेरे प्रेम में कमी थी? पापा दूसरी जाति में शादी करने के खिलाफ थे और अंकल भी। हम दोनों में से कोई भी घर वालों से लड़ने के लिए तैयार नहीं था और घर की इज़्ज़त के लिए तुम भागकर विवाह करने के खिलाफ थे, तो मैं क्या करती? या तुमने क्या किया? आज मैं दुल्हन का जोड़ा पहनकर खड़ी हूँ, हाथों में मेहंदी है लेकिन इनमें से किसी पर भी तुम्हारा हक़ नहीं है। पता है क्यों? क्योंकि तुमने वक्त रहते प्रेम के लिए आवाज़ नहीं उठाई।

सार्थक: तो क्या आवाज़ उठाने की ज़िम्मेदारी अकेली मेरी थी? मुझे तुम्हारा साथ चाहिए था श्वेता, पर तुम वो न दे सकीं। मेरी कविताओं में मैंने हमेशा कहा कि अपने हाथों से तुझे मंगलसूत्र पहनाऊँ, अपने नाम की मेहंदी तेरे हाथ में रचाऊँ, तेरे बालों में गजरा लगाऊँ, लेकिन अब ये हक़ मेरा नहीं है।

श्वेता: यह हक़ तुम बहुत पहले ही खो चुके थे सार्थक। आज आए हो तो मुझे दुल्हन के जोड़े में विदा होते हुए देखो और देखो कि कैसे हमेशा के लिए मैं किसी और के घर की शोभा बन रही हूँ क्योंकि वक्त रहते तुम समाज से लड़ न सके।

यह कहते-कहते सार्थक और श्वेता की आँखों में आँसू आ गए। तभी सार्थक ने अपनी सीधी कलाई की कोट की बाजू ऊपर की और एक काला रबर बैंड उतारा और श्वेता को दिया और कहा, “ये रबर बैंड तुमने मुझे कॉलेज में दिया था, हमारी रिलेशनशिप की निशानी के तौर पर। रख लो इसे और मुक्त करो मुझे हमेशा के लिए इस बंधन से।”

श्वेता की आँखों में आँसू थे। उसने रबर बैंड लिया और उसे वॉशरूम में जाकर फ्लश कर दिया और सार्थक से कहा, “हमारा बंधन खत्म हो चुका है सार्थक और उसकी कोई भी निशानी मैं अपने पास नहीं रखना चाहती।”

यह शब्द सार्थक के दिल पर पत्थर की तरह लगे। दोनों की आँखों में आँसू थे। सार्थक ने हाथ जोड़कर कहा, “शादी मुबारक हो श्वेता।”

और वह कमरे से बाहर आ गया। तभी दीक्षा कमरे में आई और बोली, “दीदी, आपका मेकअप हल्का-हल्का फैल गया है, इसे ठीक कर देती हूँ। बारात आ गई है।”


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