Dr. santosh vishnoi

Tragedy Classics Inspirational


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Dr. santosh vishnoi

Tragedy Classics Inspirational


सच्चा देशभक्त

सच्चा देशभक्त

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डॉ दीपक अपनी दो दिन की लगातार ड्यूटी के बाद आज दोपहर में घर आये। खाना खाया । अपनी एकलोती बेटी रौनक के साथ थोड़ी देर खेलने लगे। ज़ाहन्वी ने खाना खाने के बाद काम समेटा और सफाई- बर्तन करने वाली मेड को कुछ काम का निर्देश देकर कमरे की ओर आ गई। 

जहाँ दीपक रौनक के साथ खेलने में तल्लीन थे। ज़ाहन्वी कमरे के दरवाजे के पास ही खड़ी सोचने लगी। जिंदगी भी कितनी अजीब है। शादी के पहले तीन साल कोशिश करने के बाद भी हमारे कोई बच्चा नहीं हो पाया था। लाख मन्नतों और इलाज के बाद रौनक पैदा हुई थी। जन्म के साथ रौनक को फेफडें की एक अजीब सी बीमारी थी । वो सामान्य बच्चों की तरह दौड़ या हँस नहीं सकती थी, दौड़ने या हँसने की कोशिश भी की तो साँस फूल जाती थी। ऐसे में हमारे लिए रौनक की देखभाल हमारी पहली प्राथमिकता बन गई।  

शादी से पहले मैं एक हॉस्पिटल में डाइटीशियन थी। दीपक उसी हॉस्पिटल में सर्जन थे। एक ही अस्पताल में होने के कारण कई बार मुलाकात हो जाती थी। देखते ही देखते दोनों की नज़रों ने एक दूसरे को पसंद कर लिया। एक कॉमन डॉक्टर के माध्यम से बात आगे बढ़ीं। घर वालों से शादी की बात की। दोनों ही परिवार वालों को इसमें कोई एतराज़ नहीं था। जल्दी ही हम शादी के बंधन में बंध गए।

रौनक के पैदा होने के बाद उसकी स्वास्थ्य स्थिति देखते हुए मैंने अस्पताल जाना कम कर दिया था। बहुत हुआ तो दिन में एक चक्कर लगा आती थी। 

पिता के रूप में डॉक्टर होने के कारण दीपक रौनक को उसके हिस्से का समय भी नहीं दे पाते हैं । ऐसे में जो थोड़ा सा समय मिलता था उसी में वो रौनक के साथ ही बिताने की कोशिश करते थे। 

तभी पापा-बेटी के चहकने से मेरी सोच वर्तमान को लौटी। मैं कमरे के अंदर आकर रौनक और दीपक के पास बैठ गई। धीरे से दीपक से कहा - आप दो दिन से अस्पताल से थक कर आये हैं। चलिए कुछ देर आराम कर लीजिए। मैं तब तक रौनक को सुला देती हूँ। दीपक ने भी हामी भरी और बेडरूम की और चले गए। मैंने रौनक को दवाई दी और सुला दिया। रौनक के सोने के बाद उसे चद्दर उड़ा, माथे को सहलाकर दरवाजा पास कर अपने बेडरूम में आ गई। 

बेडरूम में दीपक बेड का सहारा लेकर आँखे बंद किये बैठे हुए थे। मैं रूम में आयी दीपक के पास बैठ गई। उसके आँखों पर से चश्मा उतार कर टेबल पर रखते हुए बोली

-' क्या बात है दीपक तुम परेशां लग रहे हो। चश्मा भी नहीं उतारा। दो दिन से तुम घर नहीं आये और अब थोड़ा आराम करने को मिला है तो वो भी नहीं कर रहे। किसी खास बात से परेशान हो रहे हो ?

दीपक ने कोई जवाब नहीं दिया। 

मैंने उनके हाथ को अपने हाथ में रखा और उसके गाल पर थपथपा कर पूछा-' बताओ भी क्या हुआ ? कुछ ज्यादा ही थके से लग रहे हो। 

दीपक ने धीरे से आँखे खोली। उसकी आँखे तरल और नमी से भरी हुई थी। मुझे लगा जैसे वो रो रहे हो। मेरा दिल धक्क से रह गया। ऐसा क्या हुआ। माना जाता है कि डॉक्टर के पेशे में आने के बाद अक्सर आदमी पत्थर दिल हो जाता है। क्योंकि रोजमर्रा की जिंदगी में डॉक्टर अक्सर मौत को, दम तोड़ते लोगों को सामने देखता है। ऐसे में एक वक्त ऐसा आता है कि वो दिल से मजबूत होकर अपना कर्तव्य निभाता है।

जहान्वी ने जब दीपक की आंखों में आंसू देखे तो उसका मन अज्ञात आशंका में घबरा गया। 

दीपक ने भर्राई आवाज में बताया - ' अपने देश में कोरोना नाम का एक वायरस आया है जिससे कितने ही लोग संक्रमित हो रहे हैं और उसका इलाज भी संभव नहीं है । यह अगर ऐसे ही फैलता गया तो न जाने कितने लोगों को निगल लेगा, कितनों को बेघर कर देगा और न जाने कितनों को अपने खास लोगों को खोना पड़ेगा। आज मैं भले ही दो दिन बाद घर आया हूँ। हो सकता है आगे आने वाले दिनों में मैं घर भी ना आ पाऊँ। ऐसे में मुझे तुम्हारी और रौनक की चिंता सी हो रही है। 

जहान्वी ने सुना तो दंग रह गई। 

बोली -'क्या मेडिकल साइंस में सच में इसकी कोई दवाई नहीं है'? 

दीपक -' अभी तक तो नहीं । फिलहाल तो बचाव ही इसका उपाय है। 

जहान्वी - 'मैं जानती हूं दीपक तुम्हारा एक पति होने के नाते और एक पिता होने के नाते चिंता जायज है, लेकिन तुम यह भी तो सोचो हमारे देश में आज संकट का समय है। कितने पत्नियों के पति और कितने बच्चों के पिता इस बीमारी से ग्रसित हुए तो उनकी जिंदगी तबाह हो सकती है । एक तुम ही डॉक्टर होने के नाते उनको एक उम्मीद की किरण दे सकते हो, अगर तुम ही कमजोर पड़ गए तो उन लाखों लोगों का क्या होगा जो तुम्हारे हारने से पहले ही हार मान चुके हैं।' 

दीपक - ' मैं मानता हूं एक डॉक्टर होने के नाते मैं नाउम्मीद नहीं हो सकता, लेकिन जब एक पिता होने के नाते अपनी बेटी का चेहरा देखता हूं तो लगता है कि अगर मुझे कुछ हो गया तो रौनक का क्या होगा आखिर मैं भी पिता हूं ना।'

जाह्नवी - ये सच है, दीपक एक इंसान का दिल उसके अपनों में ही बसता है पर जब डॉक्टर बनने पर हमने मानवता की सेवा का कर्तव्य निभाने का वादा किया है। उसे आज पूर्ण करने का समय है । एक डॉक्टर होने के नाते तुम्हारी यही सच्ची देशभक्ति होगी जहां अपने परिवार को प्राथमिकता ना देकर देश हित को प्राथमिकता दो। मैं एक डॉक्टर की पत्नी होने के नाते तुम्हें विश्वास दिलाती हूं कि तुम्हारे कर्तव्य में मैं और रौनक बाधा नहीं बनेंगे।'

दीपक - ' जहान्वी मैं इस वास्तविकता से परिचित हूं कि तुम्हारे लिए भी ये उतना ही कठिन समय है जितना मेरे लिए, लेकिन फिर भी मैं तुम्हारे धैर्य और जज्बे को सलाम करता हूं तुम वास्तव में बड़ी निडर हो।'

जाह्नवी - 'दीपक तुम इस लड़ाई में अकेले नहीं हो मैं और देश के सभी लोग तुम्हारे साथ है । बस तुम हार मत मानना। चाहे इसके लिए तुम्हें जो भी कीमत चुकानी पड़े एक पत्नी होने के नाते मुझे मंजूर है।'

दीपक ने उसके हाथ को हाथ में लेकर उसे विश्वास दिलाया कि वो हार नहीं मानेगे, जब उसका परिवार उसके साथ है तो कोई भी इंसान हार नहीं मान सकता । मुझे सच में तुम्हारी और रौनक की इसी बात की फिक्र थी कि जब तुम्हें पता चलेगा तो तुम क्या कहोगी। अब जब तुम मुझे बदले में विश्वास दिला रही हो तो मुझे उम्मीद है कि हम यह लड़ाई जरूर जीतेंगे। 

तभी दीपक के फोन की घंटी बज उठी। अस्पताल से फोन था कई इमरजेंसी के केस आए हुए थे उन्हें अस्पताल बुलाया जा रहा था, उन्होंने 'आ रहा हूं' बोल कर फोन रख दिया।

जहान्वी ने मुस्कुरा कर कहा चलिए आप तैयार हो जाइये, मैं कॉफी बना कर देती हूं कॉफी पीकर जाइएगा । 

कॉफी पीकर दीपक चले गए।

 उनके जाते ही जहान्वी रूम में जाकर फफक फफक कर रो पड़ी। वह जानती थी कि उसके लिए दीपक कितना मायने रखता है। लेकिन दीपक के सामने वह कमजोर नहीं होना चाहती थी। भले ही एक पत्नी के नाते उसे दीपक की चिंता थी लेकिन एक डॉक्टर के पत्नी होने के नाते उसे देश की भी चिंता थी। वह चाहती थी कि उसकी बेटी रौनक अपने पिता को फ़क्र से देखें। सच्ची देशभक्ति की इससे ज्यादा अच्छी मिसाल क्या हो सकती है कि एक डॉक्टर के लिए उसका सारा देश ही उसका परिवार हो। 


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