सबका अपना सच
सबका अपना सच
"यह कैसी जिद है पंखुरी? तुम्हारी शादी अपनी जाति में ही होगी। मुझे और कुछ नहीं सुनना। मैंने पहले ही फैसला सुना दिया था और यही तेरा आज का सच है।" हेमंत जी ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा।
"बेटी जवान हो गई है ऐसे मत बोलिए। कहीं भागवाग गई तो फालतू में बदनामी होगी।"
"कुछ नहीं होगा मालती (पंखुरी की माँ) यह बस इनके चोंचले हैं। खाने रहने का ठिकाना नहीं और चले हैं प्यार करने वह भी विजातीय से। याद रखना पंखुरी अगर तूने इस घर के बाहर कदम रखा तो तू हमेशा के लिए हमारे लिए मर गई। मैं सोच लूँगा कि मुझे कोई औलाद थी ही नहीं। मैं बिन औलाद का हूँ।"
"आपने अपना सच सुना दिया और फैसला भी कर दिया पर मेरा अपना सच है। और यह वह है कि मैं समीर से बहुत प्यार करती हूँ। हमारा प्यार जीवन की सच्चाई पर टिका है। कोरी कल्पना में नहीं बह रहा। क्या पता पापा! आप जहाँ शादी करो मैं वहाँ खुश ना रह पाऊँ। फिर आप क्या मेरी शादी तोड़ देंगे। तब फिर आपके सच की परिभाषा बदल जाएगी। अभी मेरा श्राद्ध कर रहे हैं उस समय सचमुच में मैं आपको मरी हुई मिलूँगी।मेरा सच नहीं बदलेगा पापा और मम्मी। मेरा सच समीर है और हमेशा वही रहेगा।”
पंखुरी ने अपनी सच्चाई बयां कर दी जो हेमंत जी और मालती जी को बेजुबां कर गई।
