सागर की गोद में भाग 2
सागर की गोद में भाग 2
तरू सीधे डॉक्टर आनंद के पास ओपरेशन थियेटर में पहुंच गई, सब मरीजों को छोड़ छाड़ कर। उसे देखकर आनंद ने खुशी से झूमते हुये उसके होंठों को चूम लिया।" बड़ी देर लगा दी मेरी जान। तुम्हें क्या पता कि मेरे लिए एक एक पल काटना कितना मुश्किल हो रहा था" ? अधीर होते हुये आनंद ने कहा।
तरू ने एक तिरछी निगाह आनंद पर फेंकते हुए कहा "आपने बुलाया था तो क्या मैं ऐसे ही चली आती" ?
आनंद चौंकते हुए बोला "अच्छा ! मेरे बुलाने पर क्या कोई विशेष तैयारी करनी पड़ती है" ? अब आनंद उसे छेड़ने लगा।
तरू के होंठों पर एक कातिल मुस्कान तैर गई।"आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे आपको पता ही नहीं है कि आपको क्या क्या पसंद है ? जनाब तो याद रखते नहीं मगर हमें तो रखना पड़ता है ना। अब आपकी पसंद के हिसाब से तैयार होकर आना था, इसलिए थोड़ी देर हो गई। फिर खास "मकसद" के लिए "निमंत्रण" था तो शॉवर तो लेकर आना ही था।" अब तरू की नजरों में शरारत ही शरारत भरी हुई थी।
आनंद खुश होते हुए बोला "अरे, इतना ध्यान रखती हो तुम मेरा ? सुनकर बहुत अच्छा लगा।"
"आपके लिये तो हम कुछ भी कर सकते हैं, सर। आप कोई साधारण आदमी थोड़े ही हैं। आप तो बहुत खास हैं हमारे लिए।" अब वह खिलखिला पड़ी थी।
डॉक्टर आनंद ने फ्रिज खोला और "वोदका" निकाल कर एक पैग बनाया और तरू के हाथ में पकड़ाते हुए कहा "लीजिए, मधुशाला के नाम आज का जाम।"
एक पैग देखकर तरू चौंकी "क्या आप नहीं लेंगे" ?
"जब सामने पूरी मधुशाला हो तो कौन कमबख्त एक जाम लेगा।" आंख मारते हुए आनंद ने कहा
"ओह सर, यू आर सीरीयसली माई फेवरेट पार्टनर। पता है सर, कभी कभी तो मैं सोचती हूँ कि आपको डॉक्टर किसने बना दिया ? और वो भी न्यूरोसर्जन ! आपको तो कोई कवि या शायर होना चाहिए था।" एक सिप लेते हुए तरू बोली।
अब आनंद ने एक सिगरेट निकाल ली और धुंए के छल्ले बनाता हुआ कहने लगा "तुम सच कहती हो तरू। पर इसमें मेरा कुछ कमाल नहीं है। तुम्हें सामने देखकर ऑटोमेटिक "रोमांस" छलांगें मारने लगता है। सागर उफनने लगता है और शायरी खुद ब खुद निकलने लगती है। तुम तो वो चीज हो कि अगर पत्थर भी तुम्हें देख ले तो वो भी शायरी करने लग जाये। और ..."
"बस बस बस। लगता है कि आज तो जनाब "तरू महाकाव्य" ही लिखने बैठ गए हैं। इतनी तारीफ के लिए बहुत बहुत शुक्रिया सर। वैसे इतनी तारीफ की हकदार नहीं हूं मैं।" तरू ने आखिरी सिप लेते हुए कहा।
"तुम क्या चीज हो, यह हमसे पूछो मेरी जान।" आनंद ने तरू को बांहों में कसते हुए कहा।
वोदका का असर होने लगा था। तरू का बदन अकड़ने लगा था। आनंद तो पहले से ही सुरूर में था तो फिर देर किस बात की ? ऐसा नहीं है कि ओपरेशन थियेटर पहली बार "बैडरूम" बनने जा रहा था, यहां तो अक्सर ऐसा होता ही रहता है।
अचानक तरू को कुछ याद आया "सॉरी सर, आज मेरे पास "प्रोटेक्शन" नहीं है। मैं पर्स में रखना भूल गई।"
आनंद कुछ सोचते हुए बोला "नो प्रॉब्लम। अभी इंतजाम हो जाएगा।"
"वो कैसे" ?
"अरे, विभा है ना। उसके पास होगा। अभी मंगवा देता हूं।" "कौन विभा सर" ?
"अरे, नर्स है मेरी। वो ओ टी के बाहर खड़ी खड़ी हमारी बातें सुन रही होगी। बड़ी चालू चीज है।" आनंद ने तरू के कान में फुसफुसाते हुए कहा।
"ओह माई गॉड। इतनी हिम्मत एक नर्स की" ?
"ना ना। हिम्मत मत कहो। ख्वाहिश ही कहो। आखिर वो भी तो एक औरत ही है ना। उसकी भी तो कुछ जरूरतें होंगी ? वो भी तो चाहती होगी कि कभी कोई बादल उसके आंगन में उतरकर उसके घर में सावन ला दे। बस, इतनी सी तो ख्वाहिश है उसकी।"
"आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे आप सब कुछ जानते हैं उसके बारे में। कैसे जानते हैं आप ? क्या किसी का दिल पढ़ना आता है आपको" ? तरू अब मूड में आ गई थी।
आनंद कुछ देर खामोश रहा फिर कहने लगा "चलो आज तुम्हें कुछ दिखाते हैं।" और उसने सामने लगा स्क्रीन ऑन कर दिया। उसमें सोलह सीसीटीवी की पिक्चर दिखने लगी। एक कैमरे से ओटी के बाहर का नजारा भी दिख रहा था। वाकई, ओटी के बाहर एक नर्स दरवाजे पर कान लगाये खड़ी थी। तरू को बड़ा आश्चर्य हुआ
"कुछ कहते क्यों नहीं उस बदमाश को ? ये कौन सा तरीका है" ?
आनंद के चेहरे पर एक मुस्कान तैर गई। कहने लगा "हम लोग कौन से सामाजिक मूल्यों का निर्वहन कर रहे हैं ? हम भी तो स्वच्छंद जीवन जी रहे हैं। अब तुम ही बताओ कि ओटी "इस काम" के लिए है क्या ? जब हम गलत हैं तो किसी और को कैसे टोक सकते हैं ? और फिर बेचारी की ख्वाहिश भी क्या है ? उसे भी तो वही चाहिए जो बाकी की औरतों को चाहिए। बस फर्क इतना सा है कि वह शादीशुदा है जबकि हम लोग "बैचलर" हैं। नहीं मिलती होगी उसे अपने पति से संतुष्टि ? और हमें उस पर इतना ध्यान देने की जरूरत भी क्या है ? वह कोई जबरदस्ती तो करती नहीं है। मेरे और तुम्हारे संबंधों को वह अच्छी तरह से जानती है। ओटी में तुम्हारे सिवा और कोई स्त्री आती नहीं है। जब भी तुम ओटी में आती हो तो उसे पता रहता है कि ओटी में कौन सा "ऑपरेशन" चल रहा है ? सब कुछ जानते हुए भी वह अपने मन को वश में रख लेती है। अपनी उत्तेजनाओं पर काबू करके रखना भी कोई कम तपस्या नहीं है तरू। इसलिए मैं तो उसे एक महान तपस्वी ही मानता हूं ।"
फिर खिसियाते हुए आनंद कहने लगा "अब बहुत "लैक्चर" हो गया, तरू। अब और नहीं सहा जा रहा है। एक एक मिनट भारी पड़ रहा है। तुम कहो तो "प्रॉटेक्शन" मंगवाऊं" ?
तरू के पास अब कोई विकल्प नहीं था। वह खामोश ही रही। आनंद ने घंटी बजाई और विभा तुरंत हाजिर हो गई। आनंद ने उसकी तरह हाथ बढ़ाया। विभा अच्छी तरह जानती थी कि आनंद को "ऑपरेशन" के समय कब किस चीज की जरूरत होती है। स्थिति देखकर विभा तुरंत समझ गई कि इस समय आनंद को क्या चाहिए ? और बाहर जाकर उसने अपने पर्स से "वह" चीज लाकर आनंद को दे दी। आनंद ने मुस्कान से ही थैंक्स कह दिया और वह चली गईं।
आनंद और तरू अपनी मंजिल की ओर बढ़ने लगे। मंजिल पर पहुंचने के बाद और थोड़ा संयत होने पर आनंद ने देखा कि तरू कुछ असंयत सी नजर आ रही है। जैसे कि वह खुश नहीं हो आज की परफॉर्मेंस से। आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था।
आनंद को बड़ा आश्चर्य हुआ कि तरू आज नाखुश क्यों लग रही है ? ऐसी क्या बात है जिसने तरू को उद्वेलित किया हुआ है ? आखिर उसने पूछ ही लिया
"कोई खास बात है क्या तरू ? आज तुम खुश नहीं लग रही हो। क्या इसकी वजह जान सकता हूँ मैं" ?
तरू खामोश ही रही, कुछ भी नहीं बोली। आनंद को थोड़ा और आश्चर्य हुआ क्योंकि तरू संकोची नहीं थी। मगर पता नहीं आज क्यों संकोच कर रही थी कुछ बताने में तरू ? आखिर उसने पुनः पूछा
"साफ साफ बताओ तरू कि बात क्या है ? तुम्हारी ये खामोशी मेरी जान ले लेगी। अब जल्दी से बता भी दो।"
तरू के चेहरे पर कई भाव आ और जा रहे थे। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह बताना नहीं चाहती थी मगर आनंद की बात टालना भी नहीं चाहती थी। बड़ी दुविधा में लग रही थी तरू। आनंद के बार बार आग्रह करने पर वह बोली
"माफ करना सर, पता नहीं ये हकीकत है या मेरा भ्रम कि आज आप कुछ बदले बदले से नजर आए थे।" तरू ने हिचकिचाते हुए धीरे धीरे कहा।
अब डॉक्टर आनंद के चौंकने की बारी थी। उसे तो ऐसा महसूस नहीं हुआ था। मगर तरू कुछ कह रही है तो उसका कोई तो आधार होगा ? ऐसे ही तो नहीं कहती है तरू कुछ भी ? इसका मतलब है कि बात गंभीर है।
"साफ साफ बताओ तरू कि क्या बात है ? मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि तुम कहना क्या चाहती हो ? मैं कहां से बदल गया हूं ? मैं तो वही हूं, आनंद। तुम्हारा आनंद।"
तरू ने एक एक शब्द दृढ़ता के साथ और चबा चबा कर कहा " माफ करना सर। आप आनंद तो हैं मगर आज ऐसा लगा कि आप मेरे वाले आनंद नहीं थे। कोई और आनंद थे। और मैं इस आनंद को जानती तक नहीं थी जिसे आज मैंने महसूस किया था। वैसे एक बात कहूं ? सच सच ? सुनने की हिम्मत रखेंगे" ?
इन शब्दों को सुनकर आनंद एकदम से घबरा गया। पता नहीं क्या कहने वाली है ये तरू ? उनकी घबराहट उनके चेहरे से नजर आने लगी थी। एक प्रश्नवाचक निगाह डाली आनंद ने तरू पर। तरू जल्दी जल्दी अपनी बात रखने लगी
"सर, आज ऐसा लगा कि आपके दिमाग में मैं नहीं थी, कोई और थी। माफ कीजिएगा सर, जो मुझे महसूस हुआ था वह मैंने सच सच बता दिया है। आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था, आज पहली बार ऐसा हुआ था इसलिए मैं थोड़ी पजल सी हो गई थी।" सब कुछ कहने के बाद अब तरू का चेहरा सामान्य हो गया था। मगर आनंद के चेहरे पर पसीने आ गए थे। उसकी चोरी पकड़ी गयी थी।
शेष अगले अंक में
क्रमशः

