बिल्ली के गले में घंटी बांधना
बिल्ली के गले में घंटी बांधना
🌺 मुहावरों और कहावतों में संदेश : भाग 32 🌺 😺 बिल्ली के गले में घंटी बाँधना : हास्य–व्यंग्य प्रधान प्रेरणादायक कहानी 😺 ✍️ श्री हरि 🗓️ 4.1.2026 नगर के मध्योमध्य स्थित था — सर्वोदय नगर। नाम के अनुरूप यहाँ हर कोई “सर्वोदय” की बात तो करता था, पर व्यवहार में अधिकतर लोग केवल “स्व-उदय” में विश्वास रखते थे। मोहल्ला पढ़ा-लिखा था, जागरूक था, व्हाट्सएप विश्वविद्यालय से दीक्षित था और हर समस्या पर लंबा भाषण देने में माहिर था—बस एक कमी थी, कदम उठाने की। सर्वोदय नगर की सबसे बड़ी समस्या थी—बिल्ली पुसी देवी। अब आप सोचेंगे, बिल्ली से क्या समस्या? पर यह कोई साधारण बिल्ली नहीं थी। यह थी—नगर की ठेकेदार प्रवृत्ति वाली बिल्ली। रंग ऐसा कि रात में दीवार से चिपक जाए तो अंधेरा भी शर्मा जाए। शरीर ऐसा कि दूध पीकर नहीं, घी-हलवा खाकर बनी हो। और आँखें—जैसे हर समय यह हिसाब लगाती हों कि किस घर से क्या उड़ाया जा सकता है। बिल्ली पुसी देवी का आतंक ऐसा था कि दूधवाले की बाल्टी खाली, मछलीवाले का तराजू हल्का, और गृहिणियों का धैर्य समाप्त रहता। सबसे बड़ी बात—बिल्ली पुसी देवी अकेली नहीं, पूरे मोहल्ले पर राज करती थी। जिस घर में घुसी, वहाँ के लोग समझ जाते—आज उपवास रहेगा। एक दिन मोहल्ले में आपात बैठक बुलाई गई। स्थान—शर्मा जी की बैठक। कारण—पिछले हफ्ते पुसी देवी ने एक साथ तीन घरों की रसोई पर धावा बोल दिया था। बैठक शुरू हुई। शर्मा जी बोले— “अब बहुत हो गया। कुछ तो करना पड़ेगा।” गुप्ता जी ने चश्मा ठीक करते हुए कहा— “बिल्कुल! यह प्रशासन की विफलता है।” वर्मा जी बोले— “पहले भी मैंने कहा था, पर मेरी कोई सुनता नहीं।” शुक्ला जी ने गंभीर स्वर में कहा— “समस्या की जड़ में जाना होगा।” कुल मिलाकर दस लोग थे और बीस राय थीं। तभी कोने में बैठे सेवानिवृत्त मास्टर जी ने कहा— “एक पुरानी कहावत है—बिल्ली के गले में घंटी बाँधनी होगी।” सबने एक साथ कहा— “वाह! क्या बात है!” माहौल गंभीर हो गया। सबको लगा—समाधान मिल गया। अब चर्चा शुरू हुई— “घंटी कौन बाँधे?” एक क्षण का मौन। फिर शर्मा जी बोले— “देखिए, विचार बहुत अच्छा है… लेकिन मेरी उम्र…” गुप्ता जी बोले— “मेरी कमर…” वर्मा जी बोले— “मेरी सामाजिक प्रतिष्ठा…” शुक्ला जी बोले— “मेरी कुंडली में जोखिम योग नहीं है।” यानी घंटी बाँधने का विचार सबको पसंद था, पर बिल्ली के पास जाने का साहस किसी में नहीं था। तभी सामने से आवाज़ आई— “मैं बाँध दूँ?” सब चौंक गए। यह आवाज़ थी—पिंटू की। पिंटू मोहल्ले का सबसे साधारण लड़का था। न बड़ा पद, न बड़ा कद। उम्र कोई पच्चीस वर्ष। साइकिल से ट्यूशन पढ़ाने जाता, शाम को लाइब्रेरी में बैठता। उसे अब तक कोई गंभीरता से नहीं लेता था। शर्मा जी हँस पड़े— “अरे बेटा, ये बच्चों का खेल नहीं है।” पिंटू बोला— “तो फिर ये बड़ों का भाषण क्यों लग रहा है?” सब सन्न। पिंटू ने आगे कहा— “आप लोग रोज़ कहते हैं—कुछ करना चाहिए, कोई आगे आए। आज मैं आया हूँ। घंटी है?” गुप्ता जी बोले— “घंटी तो है… लेकिन…” पिंटू ने कहा— “लेकिन-वेलकिन छोड़िए। आप लोग बस रास्ता बताइए।” मोहल्ले के लोग आपस में देखने लगे। उन्हें लगा—लड़का जोश में है, दो दिन में भूल जाएगा। फिर भी तय हुआ—प्रयोग कर लिया जाए। अगली रात योजना बनी। पुसी देवी का ठिकाना था—पुराना गोदाम। पिंटू ने साधारण-सी घंटी ली, एक मजबूत धागा बाँधा और निकल पड़ा। पूरे मोहल्ले की बालकनियों में लोग ऐसे खड़े थे, जैसे लाइव क्रिकेट मैच चल रहा हो। कोई बोला— “अब भागेगा।” कोई बोला— “अब रोएगा।” कोई बोला— “देख लेना, कल अस्पताल में मिलेगा।” पिंटू चुपचाप आगे बढ़ा। पुसी देवी बैठी थी—राजसी मुद्रा में। पिंटू रुका नहीं। न चिल्लाया, न पत्थर उठाया। बस शांत स्वर में बोला— “डर से घंटी नहीं बँधती, बिल्ली से बात करनी पड़ती है।” यह वाक्य सुनकर लोग चौंक गए। पिंटू ने धीरे से दूध की कटोरी रखी। पुसी देवी ने देखा, सूँघा, और दूध पीने लगी। उसी क्षण पिंटू ने फुर्ती से—टिन… घंटी बँध चुकी थी। एक क्षण सन्नाटा। फिर—टिन… टिन… टिन… पुसी देवी उछली, भागी, पर अब उसकी चाल छुपी नहीं थी। हर कदम पर घंटी बज रही थी। मोहल्ले में तालियाँ बज उठीं। लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था—जो काम वर्षों की बैठकों से नहीं हुआ, वह एक शांत प्रयास से हो गया। अगले दिन सर्वोदयनगर में नया सूरज उगा। दूध सुरक्षित था, मछली सुरक्षित थी, और सबसे बड़ी बात—लोगों का आत्मविश्वास लौट आया था। शर्मा जी बोले— “पिंटू, तुमने तो कमाल कर दिया।” पिंटू मुस्कुराया— “मैंने कुछ नहीं किया। मैंने बस ये साबित किया कि समस्या से डरना सबसे बड़ी समस्या है।” कुछ दिनों बाद नगर निगम की बैठक में भी यह उदाहरण दिया गया। “देखिए, बिल्ली के गले में घंटी बाँधनी हो तो पहले यह तय करना पड़ता है कि कौन बाँधेगा, न कि कितनी जोर से चर्चा होगी।” पिंटू अब मोहल्ले की समिति में था। पर उसने कभी इसका ढोल नहीं पीटा। वह जानता था— हर समाज में सबसे बड़ा संकट बिल्ली नहीं होती, सबसे बड़ा संकट होता है—घंटी बाँधने से डर। एक दिन किसी ने उससे पूछा— “इतना साहस कहाँ से लाए?” पिंटू बोला— “जब सब बोलते हैं और कोई करता नहीं, तब करना ही साहस बन जाता है।” प्रेरणा “बिल्ली के गले में घंटी बाँधना” केवल कहावत नहीं, यह समाज का आईना है। समस्याओं पर भाषण देना आसान है, पर समाधान वही लाता है—जो जोखिम उठाने का साहस रखता है। हर युग को पिंटू चाहिए— जो कम बोले, पर काम करके दिखाए । ।
