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Vijay Erry

Abstract Others

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Vijay Erry

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रिश्तों की कीमत

रिश्तों की कीमत

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रिश्तों की कीमत 

लेखक: विजय शर्मा एरी  


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प्रस्तावना

रिश्ते जीवन की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। ये हमें सहारा देते हैं, हमें पहचान देते हैं और हमें जीने का अर्थ समझाते हैं। लेकिन जब रिश्तों में दरारें पड़ती हैं, जब अहंकार और अपेक्षाएँ बीच में आ जाती हैं, तब वही रिश्ते कशमकश का कारण बन जाते हैं। यह कहानी इसी द्वंद्व की है—जहाँ प्रेम और विश्वास के बीच अहंकार खड़ा हो जाता है, और जहाँ समझौते की जगह संवाद की कमी रिश्तों को उलझा देती है।  


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कहानी


अमृता और विवेक की शादी को दस साल हो चुके थे। दोनों ही पढ़े-लिखे, आधुनिक सोच वाले लोग थे। अमृता एक कॉलेज में हिंदी साहित्य की प्राध्यापिका थी और विवेक एक आईटी कंपनी में मैनेजर। बाहर से देखने पर उनका जीवन आदर्श लगता था—अच्छा घर, अच्छी नौकरी, एक प्यारी सी बेटी, और समाज में सम्मान।  


लेकिन भीतर ही भीतर, उनके रिश्ते में दरारें धीरे-धीरे गहरी होती जा रही थीं।  


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पहला अध्याय: अपेक्षाओं का बोझ

अमृता को लगता था कि विवेक उसके काम को उतनी गंभीरता से नहीं लेता। जब भी वह अपनी किसी उपलब्धि का ज़िक्र करती, विवेक बस औपचारिक मुस्कान दे देता। उसे लगता कि विवेक की दुनिया सिर्फ़ उसकी नौकरी और ऑफिस के प्रोजेक्ट्स तक सीमित है।  


विवेक को लगता था कि अमृता छोटी-छोटी बातों को बड़ा बना देती है। उसके लिए घर और परिवार की ज़िम्मेदारियाँ ही सबसे बड़ी उपलब्धि थीं। वह सोचता—"क्या ज़रूरी है कि हर बात पर चर्चा हो? क्या ज़रूरी है कि हर उपलब्धि का जश्न मनाया जाए?"  


धीरे-धीरे दोनों की अपेक्षाएँ एक-दूसरे से टकराने लगीं।  


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दूसरा अध्याय: संवाद की कमी

शुरुआत में वे झगड़े छोटे थे। "तुमने मेरी बात सुनी ही नहीं," अमृता कहती।  

"तुम हर बात को तूल क्यों देती हो?" विवेक जवाब देता।  


लेकिन समय के साथ ये झगड़े चुप्पी में बदल गए। अब वे बहस नहीं करते थे, बल्कि एक-दूसरे से दूरी बना लेते थे। अमृता किताबों और लेखन में डूब जाती, विवेक ऑफिस के काम और दोस्तों में।  


बेटी सिया अक्सर पूछती—"मम्मी, पापा इतने चुप क्यों रहते हैं?"  

अमृता बस मुस्कुरा देती, लेकिन भीतर से टूट जाती।  


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तीसरा अध्याय: अहंकार की दीवार

एक दिन अमृता ने विवेक से कहा—"तुम्हें कभी लगता है कि मैं भी कुछ कर रही हूँ? मेरे काम की कोई अहमियत है?"  

विवेक ने ठंडे स्वर में कहा—"अमृता, तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें कम समझता हूँ। लेकिन सच कहूँ तो मुझे लगता है कि तुम मुझे कभी समझती ही नहीं।"  


यह वाक्य अमृता के दिल में तीर की तरह लगा। उसे लगा कि विवेक ने उसके अस्तित्व को ही नकार दिया।  

विवेक को लगा कि अमृता हमेशा शिकायत करती है, कभी उसकी थकान नहीं समझती।  


दोनों के बीच अहंकार की दीवार खड़ी हो गई।  


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चौथा अध्याय: रिश्तों की कशमकश

अब उनका रिश्ता एक अजीब मोड़ पर था। बाहर से सब कुछ सामान्य दिखता था, लेकिन भीतर से दोनों अकेले थे।  

अमृता रात को डायरी में लिखती—  

"रिश्ते कितने अजीब होते हैं। कभी सहारा बनते हैं, कभी बोझ। कभी मुस्कान देते हैं, कभी आँसू। क्या यही जीवन है?"  


विवेक देर रात ऑफिस से लौटकर सोचता—  

"क्या मैं गलत हूँ? या अमृता गलत है? या हम दोनों ही अपनी-अपनी दुनिया में खो गए हैं?"  


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पाँचवाँ अध्याय: बेटी की मासूमियत

सिया ही वह कड़ी थी जो उन्हें जोड़ती थी। उसकी मासूम बातें कभी-कभी दोनों को पास ले आतीं।  

एक दिन सिया ने कहा—"पापा, मम्मी, आप दोनों क्यों नहीं हँसते जैसे पहले हँसते थे?"  


उसकी आँखों में मासूम सवाल था। अमृता और विवेक दोनों चुप हो गए। उन्हें एहसास हुआ कि उनकी कशमकश सिर्फ़ उनके बीच नहीं थी, बल्कि सिया की दुनिया को भी प्रभावित कर रही थी।  


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छठा अध्याय: आत्ममंथन

अमृता ने एक दिन कॉलेज में रिश्तों पर व्याख्यान दिया। उसने कहा—  

"रिश्ते संवाद से चलते हैं। जब संवाद टूटता है, तो रिश्ते भी टूटने लगते हैं।"  


उसके अपने शब्द उसे भीतर तक झकझोर गए।  

विवेक ने एक दिन ऑफिस में देखा कि उसका सहकर्मी अपनी पत्नी को हर छोटी-बड़ी बात बताता है। उसे लगा कि शायद वही गलती कर रहा है—वह अमृता से बातें साझा ही नहीं करता।  


दोनों ने अलग-अलग जगहों पर आत्ममंथन किया।  


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सातवाँ अध्याय: पहला कदम

एक शाम विवेक ने अमृता से कहा—"चलो कहीं बाहर चलते हैं।"  

अमृता हैरान रह गई। महीनों बाद विवेक ने पहल की थी।  


वे दोनों एक कैफ़े में बैठे। शुरुआत में चुप्पी थी, लेकिन धीरे-धीरे बातें खुलने लगीं।  

अमृता ने कहा—"मुझे लगता है कि तुम मुझे समझते ही नहीं।"  

विवेक ने कहा—"मुझे लगता है कि तुम मुझे सुनती ही नहीं।"  


दोनों ने पहली बार अपने दिल की बातें बिना झगड़े के कही।  


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आठवाँ अध्याय: समझौते की राह

अमृता ने स्वीकार किया कि वह कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा अपेक्षाएँ कर लेती है।  

विवेक ने माना कि वह अमृता की उपलब्धियों को नज़रअंदाज़ कर देता है।  


दोनों ने तय किया कि वे हर हफ़्ते एक दिन सिर्फ़ अपने लिए निकालेंगे—बिना ऑफिस, बिना कॉलेज, बिना किसी और चिंता के।  


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नौवाँ अध्याय: रिश्तों का पुनर्जन्म

धीरे-धीरे उनके बीच की दूरी कम होने लगी। अमृता ने विवेक के काम में दिलचस्पी दिखानी शुरू की। विवेक ने अमृता की कविताएँ पढ़नी शुरू कीं।  

सिया फिर से हँसने लगी, क्योंकि उसके मम्मी-पापा फिर से हँसने लगे थे।  


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उपसंहार

रिश्तों की कशमकश कभी खत्म नहीं होती। यह जीवन का हिस्सा है। लेकिन जब संवाद, समझ और प्रेम साथ होते हैं, तो हर कशमकश हल हो सकती है।  


अमृता और विवेक की कहानी हमें यही सिखाती है—  

"रिश्ते जीतने के लिए नहीं होते, निभाने के लिए होते हैं।"  


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