प्यार के रंग
प्यार के रंग
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प्यार के रंग
लेखक: विजय शर्मा एरी
प्रस्तावना
इश्क़—यह शब्द जितना छोटा है, उतना ही गहरा। यह केवल दो दिलों का मेल नहीं, बल्कि आत्माओं का संवाद है। हर युग में प्रेम ने समाज को चुनौती दी है, और हर दौर में प्रेम ने इंसान को इंसानियत का पैग़ाम दिया है। यह कहानी उसी इश्क़ की है, जो सीमाओं से परे जाकर अपने अस्तित्व को साबित करता है।
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पहला अध्याय: मुलाक़ात
अमृतसर की गलियों में बसी पुरानी हवेली के आँगन में जब पहली बार आरव ने सना को देखा, तो उसे लगा जैसे समय ठहर गया हो।
सना, एक साधारण लड़की, लेकिन उसकी आँखों में गहराई थी। वह किताबों में डूबी रहती, और उसकी मुस्कान में एक अजीब सी मासूमियत थी।
आरव, दिल्ली से आया एक युवा कवि, जो शहर में साहित्यिक गोष्ठी के लिए आया था। उसकी कविताओं में समाज की पीड़ा और प्रेम की पुकार दोनों झलकते थे।
उनकी मुलाक़ात पुस्तकालय में हुई। आरव ने देखा कि सना "ग़ालिब" की शायरी पढ़ रही थी। उसने सहज ही कहा—
“ग़ालिब को पढ़ना मतलब दिल के दरवाज़े खोल देना।”
सना ने मुस्कुराकर जवाब दिया—
“और ग़ालिब को समझना मतलब इश्क़ को जी लेना।”
यहीं से दोनों के बीच संवाद शुरू हुआ।
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दूसरा अध्याय: दोस्ती से मोहब्बत तक
पुस्तकालय की मुलाक़ातें धीरे-धीरे चाय की महफ़िलों में बदल गईं।
आरव अपनी कविताएँ सुनाता, सना अपने विचार साझा करती।
सना को आरव की संवेदनशीलता भाती थी, और आरव को सना की सादगी।
एक शाम, जब बारिश हो रही थी, आरव ने सना से कहा—
“क्या तुम्हें लगता है कि इश्क़ सिर्फ़ किताबों में होता है?”
सना ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—
“नहीं, इश्क़ तो वही है जो हमें जीना सिखाए। किताबें तो बस आईना हैं।”
उस पल आरव को महसूस हुआ कि वह सना से मोहब्बत करने लगा है।
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तीसरा अध्याय: समाज की दीवारें
लेकिन हर प्रेम कहानी की तरह, उनकी राह आसान नहीं थी।
सना का परिवार परंपरावादी था। उसके पिता चाहते थे कि सना की शादी किसी व्यापारी से हो, जो उनके कारोबार को मज़बूत कर सके।
आरव, एक कवि था—न स्थायी नौकरी, न बड़ा घर।
जब सना ने अपने दिल की बात घर में रखी, तो पिता ने सख़्ती से कहा—
“कवि रोटी नहीं कमा सकता। इश्क़ पेट नहीं भरता।”
सना चुप रही, लेकिन उसके दिल में तूफ़ान था।
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चौथा अध्याय: संघर्ष
आरव ने हार मानने से इंकार कर दिया। उसने सना को लिखा—
“इश्क़ का पैग़ाम वही है जो हमें साहस दे। अगर हम डर गए, तो यह पैग़ाम अधूरा रह जाएगा।”
सना ने जवाब दिया—
“मैं तुम्हारे साथ हूँ, लेकिन मुझे अपने परिवार को भी समझाना है। इश्क़ का पैग़ाम नफ़रत नहीं, समझौता और संवाद है।”
आरव ने अपने शब्दों से समाज को चुनौती देने का निश्चय किया। उसने एक कविता लिखी, जिसका शीर्षक था—
“इश्क़ का पैग़ाम”
उस कविता में उसने कहा कि प्रेम ही वह शक्ति है जो इंसान को इंसान बनाती है।
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पाँचवाँ अध्याय: मोड़
सना के पिता ने जब आरव की कविता सुनी, तो वे चुप हो गए।
कविता में आरव ने लिखा था—
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इश्क़ वही है जो दीवारें गिरा दे,
इश्क़ वही है जो दिलों को मिला दे।
रोटी से बड़ा है मोहब्बत का पैग़ाम,
क्योंकि रोटी तो जिस्म को जीती है,
मोहब्बत आत्मा को।
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यह सुनकर पिता का दिल पिघलने लगा।
उन्होंने पहली बार सोचा कि शायद प्रेम को समझना चाहिए।
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छठा अध्याय: स्वीकार्यता
धीरे-धीरे परिवार ने आरव को स्वीकार कर लिया।
सना और आरव की शादी हुई, लेकिन यह शादी केवल दो दिलों का मिलन नहीं थी।
यह समाज के लिए एक संदेश था—
कि इश्क़ का पैग़ाम किसी धर्म, जाति, या आर्थिक स्थिति से बड़ा है।
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उपसंहार
आरव और सना की कहानी आज भी अमृतसर की गलियों में सुनाई जाती है।
लोग कहते हैं कि जब भी हवेली के आँगन में कोई कविता पढ़ी जाती है, तो हवा में इश्क़ का पैग़ाम गूँजता है।
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संदेश
यह कहानी हमें बताती है कि इश्क़ केवल दो लोगों का रिश्ता नहीं, बल्कि समाज को बदलने की ताक़त है।
इश्क़ का पैग़ाम हमें साहस देता है, हमें जोड़ता है, और हमें इंसानियत सिखाता है।
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