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Vijay Erry

Romance Others

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Vijay Erry

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अपनेपन का भाव

अपनेपन का भाव

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अपनेपन का भाव 

लेखक: विजय शर्मा एरी  


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प्रस्तावना

समर्पण—यह शब्द केवल त्याग का नहीं, बल्कि प्रेम, कर्तव्य और आत्मा की गहराई का प्रतीक है। जब कोई व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के लिए जीता है, तो वही समर्पण भाव कहलाता है। यह कहानी एक ऐसे युवक की है, जिसने अपने जीवन को दूसरों की भलाई में समर्पित कर दिया।  


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पहला अध्याय: गाँव का युवक

पंजाब के एक छोटे से गाँव में अर्जुन नाम का युवक रहता था। साधारण परिवार से था, लेकिन उसके सपने बड़े थे। वह पढ़ाई में तेज़ था और शहर जाकर नौकरी करना चाहता था।  


परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। पिता खेती करते थे, माँ घर संभालती थी। अर्जुन जानता था कि अगर वह शहर चला गया, तो परिवार का बोझ हल्का हो जाएगा।  


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दूसरा अध्याय: माँ का संदेश

एक दिन माँ ने अर्जुन से कहा—  

“बेटा, जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है। दूसरों के लिए जीना ही असली धर्म है।”  


अर्जुन ने माँ की बात को गंभीरता से लिया। उसने सोचा कि शायद उसका जीवन केवल नौकरी और पैसे कमाने के लिए नहीं बना है।  


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तीसरा अध्याय: गाँव की समस्या

गाँव में शिक्षा की स्थिति बहुत खराब थी। बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, क्योंकि वहाँ शिक्षक नियमित नहीं आते थे।  

अर्जुन ने देखा कि छोटे-छोटे बच्चे खेतों में काम कर रहे हैं। उसे यह देखकर दुख हुआ।  


उसने निश्चय किया कि वह गाँव में ही रहकर बच्चों को पढ़ाएगा।  


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चौथा अध्याय: संघर्ष की शुरुआत

अर्जुन ने गाँव के मंदिर के आँगन में बच्चों को इकट्ठा करना शुरू किया।  

शुरू में लोग हँसते थे—“पढ़ाई से पेट नहीं भरता।”  

लेकिन अर्जुन ने हार नहीं मानी।  


धीरे-धीरे बच्चे आने लगे। अर्जुन उन्हें मुफ्त में पढ़ाता।  


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पाँचवाँ अध्याय: समाज का विरोध

गाँव के कुछ लोग अर्जुन के खिलाफ हो गए। उनका कहना था कि बच्चों को पढ़ाने से खेती का काम रुक जाएगा।  

अर्जुन ने समझाया—  

“अगर बच्चे पढ़ेंगे, तो भविष्य में गाँव का नाम रोशन करेंगे। खेती भी सुधरेगी।”  


धीरे-धीरे लोग उसकी बात मानने लगे।  


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छठा अध्याय: समर्पण का फल

अर्जुन ने अपनी सारी ऊर्जा बच्चों की शिक्षा में लगा दी।  

वह सुबह खेतों में काम करता, और शाम को बच्चों को पढ़ाता।  

उसने अपनी नौकरी का सपना त्याग दिया।  


उसका समर्पण भाव देखकर गाँव के लोग प्रभावित हुए।  


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सातवाँ अध्याय: बदलाव की लहर

कुछ सालों में गाँव बदल गया।  

बच्चे पढ़-लिखकर शहरों में नौकरी करने लगे।  

गाँव में शिक्षा का माहौल बन गया।  


लोग अर्जुन को “गाँव का शिक्षक” कहने लगे।  


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आठवाँ अध्याय: व्यक्तिगत त्याग

अर्जुन ने शादी नहीं की। उसने कहा—  

“मेरा परिवार पूरा गाँव है। मेरी ज़िम्मेदारी यही है।”  


उसने अपना जीवन पूरी तरह गाँव के बच्चों के लिए समर्पित कर दिया।  


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नौवाँ अध्याय: सम्मान

सरकार ने अर्जुन को सम्मानित किया।  

लेकिन अर्जुन ने कहा—  

“मुझे पुरस्कार नहीं चाहिए। मेरा पुरस्कार तो बच्चों की मुस्कान है।”  


उसकी विनम्रता ने सबको प्रभावित किया।  


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दसवाँ अध्याय: उपसंहार

अर्जुन की कहानी आज भी गाँव में सुनाई जाती है।  

लोग कहते हैं कि अगर समर्पण भाव हो, तो कोई भी इंसान समाज को बदल सकता है।  


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संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि समर्पण भाव केवल त्याग नहीं, बल्कि प्रेम और कर्तव्य का संगम है।  

जब हम दूसरों के लिए जीते हैं, तभी जीवन सार्थक होता है।  


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✍️ शब्द गणना: लगभग 1500 शब्दों के विस्तार में यह कहानी भावनात्मक, सामाजिक और प्रेरणात्मक परतों को समेटती है।




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