रेगिस्तान का सुकून: चाचा की अनकही कहानी
रेगिस्तान का सुकून: चाचा की अनकही कहानी
दुबई की तपती रेत और पहली केतली (1986)
बात 1986 की है, जब दुबई की गगनचुंबी इमारतें अभी सिर उठा ही रही थीं। वहाँ की तपती धूप और कंस्ट्रक्शन साइट्स के बीच, एक नौजवान अपनी छोटी सी केतली लेकर खड़ा होता था। वहां के मज़दूरों और इंजीनियरों के लिए, वह इलायची वाली कड़क चाय ही दिन भर की थकान का एकमात्र इलाज थी।
उसने 10 साल दुबई की उस गर्मी में गुज़ारे, जहाँ उन्होंने सीखा कि चाय सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि लोगों को जोड़ने का जरिया है। उन्होंने अरबी 'कवा' और हिंदुस्तानी 'कड़क चाय' के मिश्रण से अपनी एक खास रेसिपी तैयार की थी।
वतन की खुशबू और गुड़ का जादू (1996)
1996 में, जब चाचा वापस इंडिया लौटे, तो उनके पास बहुत बड़ी जमापूंजी तो नहीं थी, लेकिन एक हुनर था। उन्होंने देखा कि यहाँ हर गली में चाय मिलती है, पर वह 'सुकून' गायब है। उन्होंने फैसला किया कि वह चीनी (Sugar) की जगह शुद्ध देसी गुड़ (Jaggery) का इस्तेमाल करेंगे, जो सेहत के लिए भी अच्छा हो और स्वाद में भी सोंधापन दे।
"चाचा की चाय" का जन्म
उन्होंने शहर के एक कोने में एक छोटा सा खोखा खोला। शुरुआत में लोग हैरान थे कि "गुड़ की चाय दूध को फाड़ क्यों नहीं रही?" लेकिन चाचा का दुबई वाला तजुर्बा और गुड़ डालने की उनकी खास तकनीक (Timing) कमाल कर गई।
धीरे-धीरे बात फैल गई— "अगर असली गुड़ वाली चाय पीनी है, तो चाचा के पास जाओ।" जो मज़दूर दुबई में उनके हाथ की चाय पीते थे, आज उनके बच्चे और शहर के बड़े-बड़े लोग अपनी गाड़ियाँ रोककर चाचा की चाय का इंतज़ार करते हैं।
