Nisha Nandini Bhartiya

Drama Inspirational


5.0  

Nisha Nandini Bhartiya

Drama Inspirational


रास्ता जीवन का

रास्ता जीवन का

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वह एक छोटे से गाँव फुटेर की रहने वाली थी। उसका नाम फूलमती था। उससे मेरा परिचय मध्य प्रदेश के एक वृद्धाश्रम में हुआ था। वह दौड़-दौड़ कर पूरे मनोयोग से वृद्ध माता-पिता की सेवा कर रही थी। मेरी उत्सुकता उसके प्रति बड़ती जा रही थी। फूलमती देखने में सुंदर और बहुत अच्छे घर की लग रही थी। उम्र यही कोई की तीस साल के आस-पास होगी। मैंने उससे बात करने का निश्चय किया।


उसे अपने पास बुलाया और पूछा, “तुम यहाँ कैसे आयी? तुमने यह काम ही क्यों चुना?”


तब उसने बताया, “मेरा नाम फूलमती है। मैं एक निम्न घर में पली-बढ़ी हूँ।बड़ी मेहनत से मेरे माता-पिता ने मुझे पढ़ाया है। कक्षा दस के बाद की शिक्षा मैंने स्वयं के बूते पर की है। मैंने संस्कृत में एम. ए किया है। मैं एक स्कूल में अध्यापन कार्य कर रही थी। मेरे माता-पिता मेरा विवाह करना चाहते थे इसलिए उन्होंने मेरी नौकरी छुड़वा कर मेरा विवाह टीकमगढ़ निवासी ललित प्रसाद से कर दिया। ललित बहुत ऐयाश किस्म का व्यक्ति था। कोई भी गलत काम उससे अछूता नहीं था। मैं अपने माता-पिता के लिए सब कुछ सहन करती रही। वह मुझे नौकरी भी करने नहीं देता था। प्रत्येक रात मैं उसके अत्याचार का शिकार होती थी। नशे में धुत हो कर मेरी पिटाई करता था। एक बार तो उसने मेरा हाथ भी तोड़ दिया था। मैं चुपचाप सब सहन करती रही। अभी विवाह को तीन महीने ही हुए थे कि एक रात उसने वहशी का रूप धारण कर लिया। वह अपने दोस्तों को घर लाकर मुझे नरक में ढकेलना चाहता था। उस रात मैं उससे छिप कर अपने पिता के घर आ गई थी। पर पिता जी ने घर से निकाल दिया और कहा - अब पति के साथ रहना ही तुम्हारा धर्म है। अब मैं जहाँ जाती वह मुझे पकड़ कर कुकर्म में ढकेलने के लिए उद्यत रहता वह मुझसे धन्धा करवाना चाहता था। वह भावशुन्य आदमी था बल्कि यह कहूँ तो कुछ गलत न होगा कि वह आदमी की शक्ल में हैवान था। उसने विवाह भी सिर्फ अपनी ऐयाशी के लिए ही किया था।”


मैं बड़े ध्यान से फूलमती की बातें सुन रही थी उसने आगे बोलना शुरू किया, “दीदी एक दिन जब वह अपनी सब मर्यादा तोड़ने पर उतारु था। तब जब वह नशे में बेहोश पड़ा था उस समय मैं उसे घर के अंदर बंद करके भाग निकली जैसे ही मैं बस में बैठी ही थी कि मेरी नजर एक समाचार पत्र पर गई जिसमें लिखा था - दर्पण वृद्धाश्रम के लिए एक सुयोग्य व पड़ी-लिखी परिचारिका की आवश्यकता है। बस फिर क्या था। मैंने तुरंत कंडक्टर को बिलासपुर का टिकट बनाने को कहा और यहां पहुंच गई। यहां की हैड दीदी ने मेरा इंटरव्यू लिया और मुझे यहां रख लिया। मैं यहां बहुत खुश हूँ और उस हैवान की पहुंच से बहुत दूर हूँ। वह सोच भी नहीं सकता कि मैं किसी वृद्धाश्रम में हूॅं और ऐसी जगहों का उसके चरित्र से कोई मेल नहीं खाता है। मुझे यहां रहते हुए तीन साल हो गए है। इतने सारे माता-पिता को पाकर मैं अपने माता-पिता भी भूल गई। मेरे माता-पिता को नहीं मालूम की मैं यहां पर हूँ। मेरी उनके साथ बात होती रहती है। उन्हें पता है कि मैं अपने पति के साथ नहीं रहती हूँ। पर कहाँ रहती हूँ वे नहीं जानते है। कई बार उन्होंने पूछा पर उस हैवान के डर से मैंने नहीं बताया। यह सब माता-पिता मुझे अपनी बेटी से भी अधिक प्यार करते है। इनके बच्चे इनको यहाँ छोड़कर फिर दुबारा कभी नहीं आए। मैं इनका दिल हलका करती हूँ और यह लोग मेरा दिल हलका करते है। यहाँ मुझे खाना-पीना आदि सब मिलता है साथ में वेतन भी मिलता है। पर मुझे वेतन की इतनी आवश्यकता नहीं है। जितनी इनके साथ की है।”


मेरी उत्सुकता बड़ती जा रही थी मैंने फिर पूछा - “क्या इनके निजी काम करते हुए तुम्हें घृणा नहीं आती? दिन में कितनी बार तुम्हें इनकी चादर बदलनी पड़ती है।”


वह बड़ी ही प्रसन्नता से बोली, “यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे इतने सारे माता-पिता की सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ है। मैंने बहुत पुण्य कर्म किए होंगे, जो मुझे इनकी सेवा का अवसर प्राप्त हुआ है। यहां भी किसी को नहीं मालूम की वह ललित प्रसाद मेरा पति है। अभी चार दिन पहले ही मैंने उसको टी. वी. न्यूज में देखा था, पुलिस को उसके कुकर्मों का पता चल गया है। पुलिस उसे जेल ले जा रही थी। भगवान हमेशा अच्छे लोगों का साथ देता है।”


फूलमती की कहानी सुनकर मैंने बड़े गर्व के साथ उसको नमन किया। जब मैं जाने लगी तब वह बोली, “दीदी आप यहाँ आते रहिए। आप तो लेखिका है, मैं भी थोड़ा-बहुत लिख लेती हूँ। जब अगली बार आप आएगी तब मैं आपको अपनी पुस्तक भेंट करूँगी।”


मैंने फूलमती को गले से लगा लिया और पुन: मिलने का आश्वासन देकर अपने गंतव्य पर चल दी।


फूलमती की जिंदादिली ने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया था। अगर हम जीवन में अकेले है तो किसी का सहारा बन जाए, हमको स्वयं ही सहारा प्राप्त हो जाएगा।


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