Nisha Nandini Bhartiya

Drama


5.0  

Nisha Nandini Bhartiya

Drama


अस्तित्व

अस्तित्व

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मेरा बचपन उसके साथ बीता था । मैं उसे बहुत गहराई से जानती हूँ । वह मेरी अंतरंग सखी थी । उसकी कहानी दुनिया की सभी स्त्रियों को अपनी सी लगती है।

लीला बहुत बड़े घर की लड़की नहीं थी ।उसके पिता सरकारी अफसर जरूर थे पर दस बहन-भाइयों के परिवार में उनका वेतन नगण्य था। फिर भी उसके माता-पिता भरसक कोशिश करते थे कि अपने बच्चों को सभी प्रकार की सुख- सुविधाएं दे सकें ।

छोटी अवस्था से ही लीला पढ़ने में बहुत अच्छी थी।वह हमेशा कक्षा में प्रथम आती थी । उसकी कोशिश हमेशा यही होती थी कि वह एक अच्छी बेटी बन सके।घर.का काम भी वह बड़ी चतुरता से करती थी । वह पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी । पर उसके पिता शीघ्र ही उसका विवाह करना चाहते थे ।उसके लाख मना करने पर भी उसके पिता ने बाइस साल की आयु में उसका विवाह भोपाल के एक मध्यम वर्गीय व्यवसायी परिवार में कर दिया था । लड़का भी मध्यम स्तर का व्यापार करता था । उसके ससुराल में भी नौ बहन भाई थे । उसका पति तीसरे नम्बर पर था। दो जेठ तीन देवर व तीन नंदे थी दो बड़े भाइयों का विवाह हो चुका था। वह दोनों ही अलग रहते थे । तीन नंदे व तीन देवर अविवाहित थे। लीला ने एम. ए किया था । वह सांस्कृतिक कार्यक्रम व खेलकूद में भी बहुत अच्छी थी । महाविद्यालय में खेल चैंपियन रह चुकी थी ।उसे बहुत सारे पुरस्कार, शिल्ड, मैडल आदि मिल चुके थे । जब वह विदा होकर भोपाल आई तो अपने सभी प्रमाणपत्र व पुरस्कार भी ले आई थी ।

उसके ससुराल के लोग बहुत ही छोटे विचारों वाले थे । लड़कियों का पढ़ना लिखना उन्हें पंसद नहीं था । जबकि लीला के माता-पिता बेटा-बेटी में फर्क नहीं करते थे । लीला की पाँच बहनें थीं। उसके पिता ने सभी बेटियों को भरपूर शिक्षा दी थी। जब लीला का विवाह हुआ। उस समय लीला एम. ए करके पी. एच. डी कर रही थी । ससुराल में आते ही उसके सपनों पर पानी फिर गया ।पहला झटका तो उसे तब लगा जब उसकी सास ने उसके सभी पुरस्कार व प्रमाणपत्र फिकवा दिये और उससे कहा कि किसी को यह मत बताना कि तुम दौड़ती थी व नाचती थी । नहीं तो हम तुम्हें हमेशा के लिए तुम्हारे पिता के घर छोड़ देगें । लीला को अपनी सास के इस व्यवहार पर बहुत दुख हुआ। वह बहुत रोयी थी । उसका पति भी अपनी माँ के इशारों पर चलता था। उसकी सास के कारण ही उसके सबसे बड़ी जिठानी अपने दो माह के पुत्र को लेकर अपने पिता के घर चली गई थी । दो साल से वह पिता के घर पर ही रह रही थी ।अब लीला को भी अपने अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न दिखाई दे रहा था ।

उसने अपने पति से अपनी पी. एच. डी पूरा करने की बात कही तो उसके पति ने अनसुना कर दिया ।उसका पति भी ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था इसलिए लड़कियों का पढ़ना उसके लिए कोई महत्व नहीं रखता था । वह बोला तुमने बहुत पढ़ लिया अब आगे पढ़कर क्या करोगी तुमको नौकरी तो करना नहीं है।

मेरे माता-पिता की सेवा करो । अब यही तुम्हारा धर्म है ।

माता-पिता के घर में वह एक अच्छी बेटी बनी या नहीं पर उसकी कोशिश सिर्फ यही रही कि वह अपने माता-पिता को खुश रख सके। इन बाइस सालों में उसने सिर्फ वही कार्य किया जो उसके माता-पिता को पसंद था ।विवाह के बाद पति के घर में भी उसकी यह कोशिश जारी रही वह एक अच्छी पत्नी, अच्छी बहु, अच्छी भाभी बनने की कोशिश करती रही पर नाकामयाब रही ।

कुछ समय बाद उसने एक बेटी को जन्म दिया ।वह बहुत खुश थी पर उसके ससुराल के लोगों ने ताने देने शुरू कर दिए उसको बहुत बुरा भला कहा । दो दिन उसको भूखा रखा और कोई भी उसकी बेटी को देखता न था । उसकी सास उसे कुलक्षणी कह कर ताना देती थी । लीला अपनी बेटी का मुंह देखती तो फूली न समाती । वह बेटी के लिए सब कुछ सहन करती रही ।उसका पति तो मातृ भक्त था । वह सिर्फ माँ के इशारों पर नाचता था । न जाने कितनी बार लीला पर हाथ उठा चुका था ।

लीला सब कुछ भूलकर अपनी बेटी की परवरिश में लग गई ।बेटी के साथ ही उसका दिन होता और बेटी के साथ ही उसकी रात होती थी। अब लीला परेशान रहती थी हमेशा विचारों में खोई रहती थी जब वह अपनी माँ के पास आती तो बहुत रोती । माँ समझाती थी कि हर बेटी को जीवन में कष्ट सहना पड़ता है। तुम चिंता मत करो हिम्मत रखो । माँ के प्यार व बातों से उसे प्रेरणा मिलती थी ।

ससुराल आने पर फिर वही कष्ट, ससुराल में उसकी स्थिति एक नौकरानी जैसी ही थी । दिन भर गृह कार्य करने के बाद वह शारीरिक रूप से टूट जाती थी। पर अपनी बेटी का चेहरा देखते ही उसकी सारी थकान दूर हो जाती थी ।

एक बार उसके ससुराल वालों ने मिलकर उसकी नन्ही सी परी को मारने की कोशिश की। यह लीला से सहन नहीं हुआ । वह अपनी बेटी को लेकर एक एन. जी. ओ के सुरक्षा गृह में रहने लगी ।

एन. जी. ओ के पदाधिकारीयों ने उसके ससुराल वालों को कन्या को मारने के जुर्म में अरेस्ट करवा दिया । आज लीला का अपने पति से विवाह विच्छेद हो चुका है । लेकिन वह बहुत खुश है । उसकी उसकी परि पाँच वर्ष की हो चुकी है । परी ही उसकी जिंदगी है । आज लीला एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रवक्ता है । उसने छोटा सा एक मकान खरीद लिया है जिसमें माँ बेटी सुख से अपना जीवन यापन कर रही हैं। ससुराल पक्ष से उसका कोई संबंध नहीं है। लीला के माता-पिता लीला के इस साहसिक फैसले से बहुत खुश हैं ।

आज उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है कि काश हम अपनी लीला का विवाह इतनी जल्दी न करते । उसे अपने पैरों पर खड़ा होने का अवसर देते । तो लीला को यह दुख भरे दिन न देखने पड़ते। हम बेटी का शीघ्र अतिशीघ्र विवाह करके अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहते थे । बदले में क्या मिला ।

हर माता-पिता को यह समझना चाहिए कि बेटियाँ कोई बोझ नहीं है। उन्हें बेटे के समान ही अच्छी से अच्छी शिक्षा देकर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहिए। तत्पश्चात् विवाह के विषय में सोचना चाहिए। तभी हमारी बेटियाँ सुरक्षित रह सकती हैं।



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