राज़
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मंगत राम पचहत्तर साल का था, लेकिन मोहल्ले में उसकी सबसे बड़ी पहचान थी — उसके पास रखा एक पुराना, काला चमड़े का सूटकेस। कोनों पर खरोंचें, ताले में हल्की जंग, पर हर सुबह उसे ऐसे पोंछता जैसे वो कोई भगवान की मूर्ति हो।
किसी ने कभी उसे खुला नहीं देखा।
कोई पूछ लेता, तो मंगत बस मुस्कुरा देता,
"ये सूटकेस मेरा है… और इसमें मेरी पूरी दुनिया है।"
मोहल्ले में किस्से उड़ते रहते —
"इसमें सोने के सिक्के हैं।"
"नहीं, जवानी के दिनों का चोरी का माल है।"
"अरे, इसमें उसकी खोई हुई मोहब्बत के ख़त होंगे।"
पर मंगत राम की आँखें ऐसे रहस्य समेटे रहतीं कि कोई सच पहचान ही न पाता।
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वो आख़िरी दिन
सर्दियों की एक सुबह, मंगत राम की तबीयत अचानक बिगड़ गई। अस्पताल जाते वक़्त उसने पड़ोसी हरिहर को चाबी पकड़ाई,
"अगर मैं वापस न आऊँ… इसे खोल लेना।"
शाम तक ख़बर आ गई — मंगत राम चल बसे।
रात को, मोहल्ले के चार-पाँच लोग हरिहर के घर जमा हुए। सूटकेस को बीच में रखा गया। ताले में चाबी घुमाते ही सबकी साँसें थम गईं।
अंदर ऊपर-ऊपर कुछ पुरानी चीज़ें रखी थीं —
एक छोटी-सी कपड़े की गुड़िया, आधी टूटी हुई कंघी, और एक पुरानी, पीली पड़ चुकी तस्वीर — जिसमें जवान मंगत राम एक छोटी बच्ची को गोद में लिए हँस रहा था।
नीचे एक लिफ़ाफ़ा था।
हरिहर ने खोला — पाँच लाख रुपये पुराने नोटों में, एक जंग खाई छोटी पिस्तौल, और पचास साल पुराना अख़बार का कतरन:
"स्थानीय बैंक में डकैती, प्रबंधक की गोली मारकर हत्या। आरोपी फरार।"
धुँधली तस्वीर में वही — जवान मंगत राम, आँखों में ठंडी, कठोर चमक।
सभी चुप हो गए।
लिफ़ाफ़े में एक पर्ची भी थी, सिर्फ़ तीन शब्द लिखे थे:
"माफ़ कर देना, बिटिया।"
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सच की परत
हरिहर की आँखें भर आईं। अब समझ आया — मंगत राम की बेटी उस डकैती की रात बाढ़ में बह गई थी, और शायद उसने अपराध उसी दिन किया था… किसी मजबूरी या ग़लत फ़ैसले में। पिस्तौल, पैसे, अख़बार — उसकी उम्र भर की चुप्पी का बोझ थे।
गुड़िया, कंघी, और तस्वीर — उसकी बेटी की आख़िरी निशानियाँ थीं।
मंगत राम ने सचमुच कहा था — "इसमें मेरी पूरी दुनिया है।"
बस दुनिया सोने-हीरे की नहीं, यादों और पाप की थी।
उस रात सूटकेस फिर से बंद कर दिया गया।
और मोहल्ले में किसी ने दोबारा उसे खोलने की हिम्मत नहीं की।
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