प्यारे दादाजी
प्यारे दादाजी
मेरे दादाजी निहायत ही कंजूस इंसान थे। कमरे के बत्तियां बुझाने से लेकर गीजर के स्वीच ऑफ करने तक की बातें तो फिर भी समझ में आती कि वह बिजली बचा कर देश -हित कर रहे हैं हद तो तब हो जाती वह घरवालों से बातें करते वक़्त इयर प्लग को ऑफ कर दिया करते। उन्हें सुनने की तकलीफ थी। यहाँ बैटरी बचाते।
नए साल पर हम सभी भाई-बहनों के साथ गांव गए थे। हम सभी की गिनती कर बामुश्किल उन्होंने 35 रुपए निकाले और बोले कि रसगुल्ले खा लेना। मेरा भाई
विकी शरारती था। उनसे कुछ और पैसे निकलवाने की कोशिश में बोला, " दादाजी इतने में तो रसगुल्ले ना आयेंगे।"
"जा जलेबी ले आ। मीठा खाने से मतलब है ना।"
हमें उनसे बड़ा लगाव था और उन्हें पैसों से। उन दिनों घर में रिपेयरिंग का काम चल रहा था। उन्हें मजदूरों को कुछ पैसे देने थे। जनवरी महिने की कड़ाके की ठंड थी। कोहरा छाया था। शाम को बाहर घूमते हुए नजदीकी एटीएम मशीन के पास पहुंचे तो देखा कि कार्ड का एनवलप खाली है। उन्होंने एक -एक कर सभी बच्चों को पूछा।यहां तक कि बड़ों को भी ना छोड़ा तो यह चिंता का विषय बन गया कि आखिर एटीएम कार्ड कहां गया। यकीन उन्हें अब भी नहीं हो रहा था। सब पर शक करते रहे और कुछ और पैसे की लालच देकर भी जब कुछ हासिल ना हुआ तो विकी ने पूछा,
"अन्तिम बार कब इस्तेमाल किया था? "
ये पूछने पर उन्होंने बताया कि
" दो दिन पहले रात का समय था। इन्हीं मजदूरों को पैसे देने थे तो 2000 रुपए निकालने एटीएम पहुंचा। कुछ ठीक से दिखता ना था । वहां कोई भी नहीं था। एक बच्चा आया तो मैंने उससे मदद मांगी। उसने पैसे निकाल कर दिया और कार्ड वापस कर दिया।"
"आपने पिन नंबर दे दिया था दादाजी?"
"हां - हां ! बेचारा बिना पिन के पैसे कैसे निकालता?"
"वाह दादाजी वाह! हम पर भरोसा ना किया बाहर वाले पर कर लिया।"
"वह बड़ा सीधा लड़का था। उसने मुझे पूरा पैसा लौटाया। तुम तो सौ रूपए मार लेते हो!" अब भी उसे महान बता रहे थे।
"अरे दादाजी कार्ड और पिन उसके पास आ गया ना तो हमारे तरह जेबखर्च थोड़े ही लेगा वह। उसने तो आपकी जेब काट ली ।"
फिर उन्हें नेक सलाह दी कि सुबह 10 बजे बैंक जाकर कार्ड ब्लॉक कराएं। यह बात 2006 की है तब किसी को हेल्पलाइन से सहायता प्राप्त करने का अनुभव ना था।
खैर सुबह तड़के ही उठ कर तैयार हो दादाजी बैंक पहुंचे।वहां मैनेजर से बात किया और एकाउंट चेक करने पर उन्हें पूरे 35000 गायब मिले। पहले तो उन्हें हम बच्चों की याद आई।कभी खुल कर अपनों को पैसे ना दिए वो किसी बाहर वाले ने उड़ा लिए। बच्चे 100-150 में ही खुश हो जाते थे ।इसने तो पूरा चूना लगा दिया।
खैर संदिग्ध व्यक्ति ने दो दिन ही पैसे निकाले थे । अभी भी कुछ ज्यादा ना बिगड़ा था। कार्ड ब्लॉक कर पुलिस कंप्लेन किया गया।
अगली सुबह अखबार में अपना नाम देख कर बड़े खुश हो रहे थे। हर आने - जाने वालों को अखबार में यह कह कर नाम दिखाते कि पैसे गए तो जाने दो पेपर में नाम तो आया।
"कुछ पैसे निकालिए ना दादाजी !अखबार में फोटो छपवाता हूँ आपका।"
"ठहर बदमाश....अभी बताता हूँ तुुुझे! सारे मेरे ही पैैसे लूूूटने में लगे हैं।"रितेश के कहने पर उसे दौड़ा लिए।
"घरवालों को तरसाते हो ना तभी बाहर वाले लूट रहे हैं।" इस बार विकी बोला।
"दूसरे चाहे लूट लें बेटा पर तुझको नहीं दूंगा। जा! जाकर अपने बाप के पैसे लूट!"
सबके सब मेरे पैसों के दुश्मन बन गए हैं। मन में बड़बड़ाते हुए वह फिर से खिड़की बंद कर अपना बैंक बैलेंस चेक करने लगे थे।
