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Meenakshi Kilawat

Romance

2  

Meenakshi Kilawat

Romance

प्यार का झोंका

प्यार का झोंका

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पहला प्यार कहां, कैसे, कब होता है यह कोई नही बता सकता, यह अनुभूती नाजूक फुलों की तरह होती है। कोमल पंखुडियॉ जैसे जैसे खिलती है उसी तरह ह्रदय कमल पर किसी का अहसास भावना बनकर धड़कनों को बढ़ाता है। इस प्रेम बंधन को अपने निजी जिंदगी पर हावी होने में जरा भी देर नहीं लगती है। वह पवित्र प्यार का नशा इन्सान तो क्या प्रकृति के सभी को एक दूसरेके प्रति माया मोह में उलझाकर अपने आगोश में ले लेता है।

निरामय श्वासों पर अप्रगट रहकर घुल-मिल जाता है।" यह अंतरात्मा की महागुफा प्रेम के उपज से नये रंग में रंग जाता है।  

मैंने देखा है एक ऐसे ही प्रेमी को उसकी हर बात से मैं वाकिफ थी। वह शर्मिला नौजवान कोई बीस इक्कीस वर्ष का होगा, एकदम सरल स्वभाव सादगी एवं नम्रता से लिप्त था। हर वक्त कार्य में मग्न रहता था, लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ वह सजिला जवां एकाएक बुझा बुझा, अस्तव्यस्त दिखने लगा। उस युवक का नाम मधुर था, वह अपनी कॉलेज का होनहार विद्यार्थी था। वह सभी का का लाडला था। कॉलेज की लडकियॉ मधुर को पसंद करती लेकिन उसने कभी किसी लडकीसे दोस्ती नहीं की, हाय हैलो तक ही सीमित रहता था। मेरे समझमे ही नहीं आ रहा था, क्या बात है जो की आजकल मधूर कुछ थका थका सा निस्तेज दिखाई दे रहा था। 

 "इक हवां का झोका आया, और मधूर की सारी खशियों को उड़ाकर ले गया। उस हवा ने मधुर के सारे सपनों को रौंदकर तहस नहसकर कर दिया था। ऐसा कुछ दिल पर घना कोहरा छाया कि वह ना तड़प दिखा सकता था ना सागर में तैर सकता, ना कोहरे से झंक सकता था। वह बिना डोर की पंतग बनकर बादलों से टकरा टकराकर जख्मी हो चुका था। उसके अंतरात्मा में घनघोर घटाओं ने अपना स्थान बनाया था। वह टूट टूट कर बिखरता जा रहा था।

 कॉलेज लायब्रेरी में ज्यादा से ज्यादा समय बिताकर वह घर के लिए जा ही रहा था कि, किसी लड़की से टक्कर हो गई, जैसे ही उसने मुड़कर देखा इक लड़की की छवि वहां से निकलकर दूर चली गई। वह सन्न खडा देखता ही रह गया, लेकिन एक पल में कोई बहुत ही मोहक भीनी भीनी महक उसके दिल में समां गई। कुछ देर वह उस महक को अपने में भरकर वैसे ही ठहर गया। लेकिन वह कुछ इस तरह की खुशबू थी जिससे मधूर को कुछ देर मंत्रमुग्ध कर दिया था। उस हवा में भरी मधुर खुशबू मधुर की सोचने समझने की क्रिया को शिथील कर सारी धड़कनों को जकड़कर रह गई।" ऐसा कुछ दिल पर घना कोहरा छाया कि वह तड़पकर रह गया" जब बेहोशी टूटी तो उस खुशबू को ढूंढने लगा। वह तो वहां से काफुर हो गई थी। थक हारकर मधुर अपने घर पहुँच गया। 

 वह हर दिन कॉलेज कुछ जल्दी ही चला जाता और निराशा से घिरकर घर लोटता। कई दिन बीत गये, मंजिल दूर होकर भी एक आशा का दिया हमेशा बल रहा था और फिर इक दिन उसी महकने मधूर को जगाया। फिर से वही महक उसके आसपास मंडराने लगी। उस नवयौवनाका नाम मयुरी था। वह सुंदरता की मिसाल थी,संगमरमर की तरह श्वेत रंग, खिली खिली मुस्कान, सुनहरे घने बाल, गुलाबी गुलाब की तरह ओठ थे, चॉद भी शर्मा जाये उसे देखकर इतनी खूबसूरत मयुरी, पागलों की तरह उस महक को ढूंढ रही थी। उसे जो चाह थी वह उसका सच्चा प्यार था। खूबसुूती से उसे को कोई लेनादेना नहीं था। शायद उसे भी मधुर के तड़पन की आवाज गई होगी। उसे भी उस सुगंध की खोज थी। वह कई महिनो बाद गंवसे लौटी थी और चातक की तरह महक सुंघते हुये उसी लायब्रेरी में आई थी। जब दोनों का आमना सामना हुआ तो दोनों इक दूसरे की महक में खो गये। उस वक्त अहसास ने नई अंगडाई ली। दोनों मे कोई अपरिचीत नही था। जैसे बरसों से दोनों इक दूसरे को जानते हो, कुछ झिझक थी, वह भी प्यार भरी आँखों में खो गई। मधुर को इक नई जिंदगी मिली, मयुरी को भी जैसे अपनी मंजिल मिल गई थी। दोनों के भी दिल में प्रेम का सैलाब उमड़ रहा था।

जब यौवन की दहलीज पर "पहला प्यार" होता है, कितने वादे, कसमें खाई जाती है। ह्रदय में कई कई कमल खिलते हैं। वह क्षण किसी सुहावने मौसम की भाँति, झरझर झरने की तरह मनको प्रेमसे ओतप्रोत भर देती है। सब कुछ नया नया सा लगता है। 

जिसमें सिर्फ कोमल कंवल खिलते है। बिना पिये इक नशा सा छा जाता है। सारी कायनात में अपना प्रियतम प्रिय लगता है। प्रकृति की रचना भी बड़ी निराली है। सभी को इक अनोखे बंधन में बांधे रखती है। यह प्यार का पौधा कभी नहीं मुरझाता, यह प्रेम दिवानगी भी कहलाता है। इसमे डूबने उबरने की कोई चिंता नहीं होती। यह प्रकृति की बेहतरीन सौगात है। 

मिलकर दो दिल खिले और आने वाले सपनों में खो गये, ईश्वर उनकी चाहत को बरकरार रखे। 


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