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Nikki Sharma

Romance

3  

Nikki Sharma

Romance

पत्र जो भेज न पाई

पत्र जो भेज न पाई

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190

कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जिन्हे हम चाहकर भी नहीं भुल पाते ।ताउम्र वो हमारे साथ हमारा पीछा करती है।हाँ कुछ यादें हम जेहन में समेटे रहना चाहते हैं कुछ हमेशा के लिए भूल जाना चाहते हैं।आज पुराने फाइल साफ करते समय ये खत मिला तो फिर तुम्हारी याद न चाहकर भी आ गई।पढ़ना शुरु किया अपने लिखे एहसास जो कभी कह न पाई थी ।


हेल्लो

कुछ बातें जो तुमसे कहना चाहती थी ,बताना चाहती थी पर कह नहीं पाई आज तुम्हे लिखकर बताना चाहती हूँ पता नहीं तुम समझो या न समझो।बस अपने एहसास को जता रही तुमसे ।


  *खुद को देखा आईने में तो क्या देखा*

  *हमारी सुरत देखो तो कुछ बात बने*

जब भी देखा तुम्हें मन में हजारों घंटी बज जाती है।पता नहीं क्यों तुम्हें देखकर आँखें खिल सी जाती है।एक नशा सा छा जाता है जेहन में रोम रोम में अजीब सी सिरहन दोड़ सी जाती है।तुम्हें एक झलक देखने को मैं न जाने कब से छत पर घंटों खड़ी रहती थी।तुम्हें देखकर हल्की सी ओट में छुप जाती थी।तुम्हें तो खबर ही नहीं थी मेरी कुछ भी बेखबर,अनजान थे तुम तो मेरे इस प्रेम से।हाँ प्रेम ही तो था जो मुझे तुम्हारी तरफ खिचता जा रहा था।एक अलग एहसास से भीगोंता जा रहा था।मैं... मैं नहीं थी अब हर वक्त तुम्हारा ही चेहरा मेरे आँखों के सामने आया करता था।तुम तो तुम थे बेपरवाह मस्त अपनी जिंदगी से हर चीज चाहकर पुरी करने की आदत थी तुम्हें।मैं हर पल तुम्हारा सोचती और तुम किसी और का मुझे कहां पता था तुम तो पहले ही अपनेआप को किसी और को सौंप चुके हो।हर किसी से सुना पर कहावत है दिल जो सुनना चाहता वही सुनना चाहता हैऔर मैंने भी अपनी ही दिल की सुनी।मैंने मन को समझाया नहीं तुम किसी और को नहीं चाह सकते।मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ प्लीज मेरे बन जाओ।आज आँखों में दर्द के आँसु हैं तुम्हें न पाने का।कल जब तुम्हें तुम्हारी दोस्त जो मेरी भी थी कभी तुम्हारे साथ थी और तुम्हारे हाथों में उसके हाथ।मेरा कलेजा मुँह को आ गया जिसको अपना समझा वही बेगाना निकला।तुम हँस हँसकर सोनम के साथ बातों में व्यस्त थे और मैं हर पल पल मरती रही एक घुटन सी महसुस करती रही।पल भर में ही सब कुछ खत्म हो चुका था।तुम सबकी बातों से साफ जाहिर था तुम्हारा रिशता सोनम से दोस्ती से बढ़कर था।बड़ी मुश्किल से गुजरे थे वो पल कैसे बताऊँ.. क्या झेला था मैंने उस पल।घर आकर कितना रोई थी कितना तड़पी थी पल पल बिखरी थी मैं।जिसे दिलोजान से चाहा था आज किसी और का था।मैं तो अपने जज्बात अभी बता भी नहीं पाई थी।तुम्हारे लिए जो एहसास थे मेरे दिल में जता ही नहीं पाई आज सारे एहसास आँखों से बह गयें हैं ।कुछ न कह पाने का दर्द लेकर कागज के पन्नों पर उकेर रही हूँ।कह तो नहीं पाई कभी तुम्हें शायद कागज के पन्नों पर बयां कर तुम्हें बता दुं।बहुत चाहा था तुम्हें चाहती रहुंगी।हाँ सच है तुम मानों या न मानों पर ये एहसास भले ही एकतरफा रहा पर हमेशा मेरे जेहन में रहेगा।मैंने तुम्हें चाहा था तहे दिल से और हमेशा मन में रहोगे।हाँ ये कसक हमेशा रहेगी काश मैं तुम्हें बता पाती फुलों के गुलदस्ते के साथ अपने प्यार का इजहार करते तुम भी कभी ये ख्वाव पुरे कर पाती।हर चाह उस दिन के बाद अधुरी रह गई हमारी तुम्हारी कहानी भी अधुरी रह गई।तुम्हें न कह पाने का गम सालता रहा इसलिए आज पन्नों पे लिख डाला मैंने हर गम आज उकेर डाला है हमने।पढ़ लो तुम तो शायद मेरी चाहत को समझ लो।कैसे कहुं बहुत चाहा है तुम्हें भले कह न पाई कयी बातों से कतरायी।समाज का डर या खुद का मालुम नहीं पर दिल की बात तुम्हें बता न पाई।मैं कैसे भुल जाउंगी तुम्हें शायद कभी नहीं हाँ कभी नहीं।पता नहीं तुम्हें मेरी चाहत का अंदेशा भी है या नहीं आज ये खत से बताना चाहती हूँ हाँ सचमुच तुममें घुल जाना चाहती हूँ।*ये लिखकर तुम्हें अपना अनकहा प्यार जताना चाहती थी बताना चाहती थी

लिख डाले सारे जज्बात पर नहीं भेज पाई आज फिर तुम्हें मेरे यार*


चाह कर भी तुमसे मैं कभी कुछ कह ना पाई

समझ लोगे आँखों की भाषा हर पल यही दिल को समझाई

आरजू थी पाने की तुम्हें हर पल मगर प्यार किया उसे, जिसके दिल में कभी मैं न रही

क्या शिकायत करूं जिंदगी से अब मैं इस हकीकत को मैं तो समझी पर दिल को समझा ना पाई

छूट जाता खयाल तेरा मेरे खयालों से कभी पर्

चाह कर भी मैं यह कभी कह ना पाई मिला दर्द जो तुम्हें चाहने का हमें मगर मोहब्बत की रोशनी में तुम्हें कभी दिखा ना पाई

मेरे हाथों में महकते फूल मुरझा गए हमेशा

तेरे आंखों में जब खुद के लिए प्यार देख ना पाई 

दिल आज भी रोता है क्यों तुम्हें कुछ कभी कह न पाई

लिखा जो पत्र था तुम्हें कभी हमने, वो भी कभी भेज न पाई


ट्रीग-ट्रीग फोन की घंटी बजी शायद सिया की होगी ओह मैं भी कहां फिर इस पत्र में उलझ गई।पत्र को वापस सहेज कर फाइल में डाला।आज भी इसे सहेज कर रखा है क्योंं? पता नहीं पर अच्छा लगता है।इस एहसास को सहेजकर रखा है मैंने आज भी 10 साल हो गयें तुमसे अलग हुएं फिर भी आज भी एहसास जिंदा हैं।कसक के साथ आखिर क्यों ये पत्र भेज न पाई।भेजती तो भी क्या तुम्हारे लिए इसका कोई एहसास होता नहीं शायद नहीं इसलिए तब भी युँ ही रह गई किताबों में कहीं आज दबी है फाइलों में कहीं


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