पतझड़ -3
पतझड़ -3
कुछ यादें इतनी कड़वी होती हैं कि
उनको याद मात्र करने से मन ही नहीं जुबान भी कड़वी हो जाती है।
ज्ञानवती के बाबूजी को अपनी बेटी के लिए पढ़ा -लिखा दामाद चाहिए था। साँवली -सलोनी, अच्छे खाते -पीते घर की ज्ञानवती के लिए जमींदार, व्यापारी आदि परिवारों के भी रिश्ते आये थे, लेकिन उनके बाबूजी की खोज जगदीशजी पर ही जाकर समाप्त हुई थी। जगदीशजी से ब्याहकर ज्ञानवतीजी अपने ससुराल आ गयी थी।
ससुराल वाला घर सुरुचिपूर्ण तरीके से ही सजाया सँवारा गया था। सामान कम था, लेकिन करीने से रखा गया था। घर के दोनों तरफ दो चबूतरे बने हुए थे, चबूतरों पर मांडणे बने हुए थे, दरवाज़े पर बंदनवार लगी हुई थी। घर में घुसते ही आज की तरह ही बड़ा सा बरामदा था, बाद क वर्षों में बरामदे को दो भागों में विभाजित कर एक बैठक बनवा दी गयी थी। बरामदे से घर के आँगन में पहुँच जाते थे। आँगन में एक तरफ रसोई थी और एक तरफ स्नानघर था।उस समय भी घर में शौचालय बनवाने का प्रचलन नहीं था। घर में शौचालय बाद में बनवाया गया था। आँगन में दो कमरे बने हुए थे और स्नानघर के पास से छत पर जाने के लिए सीढ़ियाँ बनी हुई थी। उन दो कमरों में से एक कमरा ज्ञानवती जी को दिया गया था। ज्ञानवती जी को उनके कमरे में ले जाकर बिठा दिया गया था।
ज्ञानवती जी का अब तक का अनुभव अच्छा ही था। सास उन्हीं के कमरे में उन्हें चाय -नाश्ता दे गयी थी। चाय के साथ उन्हें शीरा नाश्ते में दिया गया था। फिर सास ने उनके लिए स्नानघर में पानी आदि नहाने के लिए रखवा दिया था। सास ने दिन में खीर -पूड़ी, सब्जी का अच्छा सा खाना बनवा कर खिलवा दिया था। उनकी रसोई में चूल्हा, केरोसिन स्टोव और सिगड़ी थी। शाम को भुने हुए काजू -बादाम का कलेवा ज्ञानवती को दे दिया गया था। रात में जगरा लगा दिया गया था, दाल, बाटी और चूरमा बनने वाला था।
दो दिन बाद ज्ञानवती जी पग फेरे के लिए अपने पीहर चली गयी थी और 1 महीने बाद वापस लौटी थी। अभी तक ज्ञानवती जी और जगदीशजी की मुलाक़ात नहीं हुई थी। धीरे-धीरे ज्ञानवती जी अपनी नयी गृहस्थी में रमने लगी थी। जगदीशजी की कोई परीक्षा होने वाली थी, इसलिए वह कमरे में देर रात गए सोने के लिए आते थे। लेकिन नियम से ज्ञानवती जी के हालचाल पूछ लेते थे।
"आपको यहाँ कोई तकलीफ तो नहीं । "उनके प्रतिदिन पूछे जाने वाले इस सवाल का ज्ञानवती जी हर बार मुस्कुराकर यही जवाब देती कि, "अपने घर में भला मुझे क्या तकलीफ होगी । "
"अभी परीक्षा में थोड़ा व्यस्त हूँ। ",जगदीश जी ऐसा कहकर चले जाते थे। इसी बीच जगदीशजी का ममेरा भाई कुछ दिनों के लिए उनके घर पर आया। वह अपने खानदानी व्यापार के सिलसिले में आया था, जगदीशजी के मामाजी तो आ नहीं सके थे, इसीलिए वह आया था। जगदीशजी का छोटा भाई, ज्ञानवती जी का देवर बड़ा ही हँसमुख स्वभाव का था। ज्ञानवती जी को उससे बातचीत करना अच्छा लगता था। घर में अब ज्ञानवती जी की हँसी गूँजती रहती थी। ज्ञानवती जी को ऐसा हँसता -मुस्कुराता देखकर उनकी सास भी बड़ी खुश होती थी।
जगदीश जी का आज अंतिम पेपर था। कल रात से ही ज्ञानवती जी की आँखों में सतरंगी सपने तैर रहे थे .। अब उनके और जगदीशजी के बीच से उनकी सौतन किताबें कुछ दिन के लिए ही सही गायब होने वाली थीं।
जैसा कि पहले है घर में होता था, ज्ञानवती जी तड़के उठकर ही खेतों में लोटा लेकर चली गयी थी और पता नहीं आज कैसा मनहूस दिन था ? एकांत तलाश करते -करते ज्ञानवती जी गांव की सभी महिलाओं से दूर एक अलग कोने में चली गयी थी। शौच से निवृत्त होकर ज्ञानवती जी ने घर की तरफ अभी कदम बढ़ाये ही थे कि दो बलिश्त हाथों ने उन्हें जकड़ लिया और घसीटकर झाड़ियों के पीछे ले गया। ज्ञानवती कुछ समझती और चिल्लाती उससे पहले ही उसने एक हाथ से उनका मुँह ढँक दिया था। उसने उन्हें जमीन पर पटक दिया था और अब वह उसका चेहरा देख पायी थी, यह कोई और नहीं उनका ममेरा देवर ही था।
ममेरे देवर का एक हाथ ज्ञानवती के मुँह पर था और दूसरा हाथ उनके अनछुए शरीर के विभिन्न अंगों पर रेंग रहा था। ज्ञानवती जी की आँखों में बेबसी थी, वहीं आँखें क्रोध के शोलों से सुलग भी रही थी। ज्ञानवती जी अपना सब कुछ अपने देवता को अर्पित करना चाहती थी। इतने जतन से सम्हाला गया कौमार्य एक ही बार में धराशायी हो गया। जब से होश सम्हाला, तब से यही तो सुना था कि बहू -बेटी परिवार की मर्यादा होती है। बेटी सम्हलकर रहना, कुछ ऊँच -नीच न हो जाए। लेकिन किसे पता था कि भेड़िये तो हमारे खुद के घर में ही बैठे हैं। अपनी प्यास बुझाकर, ज्ञानवती जी को अस्त -व्यस्त हालत में छोड़कर, वह तो चला गया था।
सूरज की किरणें सब दिशाओं में फैलकर प्रकाश का सन्देश दे रही थी, लेकिन ज्ञानवती जी के जीवन में घनघोर अँधेरा घिर आया था। कुछ देर तक ज्ञानवती जी रोती रही, खुद को कोसती रही, लेकिन कितनी देर तक वहाँ रूकती। कोई देख लेता तो और दस तरीके की बातें होती। अपने आपको जैसे -तैसे सम्हालकर ज्ञानवती जी घर पहुँची और सीधे रसोई में काम करती सासू माँ के पास पहुँची।
उधर सासू माँ ज्ञानवती जी के अभी तक लौटकर नहीं आने के कारण थोड़ी चिंतित थी और थोड़ी गुस्से में भी थी।
"बहू आज तो बहुत देर कर दी। जगदीश और उसके बाबूजी दोनों कलेवा करके चले भी गए। ",सासू माँ ने उन्हें बिना देखे, उनकी आहट सुनकर कहा।
ज्ञानवती जी सास के और नज़दीक आ गयी थी। सास को उनकी रुलाई कुछ सुनाई दी और सास ने उनकी तरफ देखा और जैसे ही सास की आँखें ज्ञानवती जी से मिली, वैसे ही ज्ञानवती जी सास के गले लग गयी। उनकी हालत देखकर, सास की अनुभवी आँखें सब समझ गयी थी।
