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Sarvesh Saxena

Drama Classics Inspirational


4  

Sarvesh Saxena

Drama Classics Inspirational


पश्चाताप

पश्चाताप

4 mins 161 4 mins 161

अभी कुछ ही देर हुई थी दीपक को घर से गए कि सुमन ने फिर से बूढ़ी सास पर तंज कसा, "बेटा चला गया ना, तो अब तुझे कहना पड़ेगा, तीन दिन तो आराम फरमा लिया" यह कहते हुए सुमन, सास के आगे कपड़ों का ढेर पटक गई l

बूढ़े और कमजोर घुटनों से जैसे तैसे वो कपड़े धोने बैठ ही रही थी कि तभी दीपक आ गया और हंसकर कहने लगा, "मां... लाओ मैं धो दूँ, तुम थक गई होगी "l बूढ़ी आंखें भर आईं और आंसू भरी आंखों से वो छोटे दीपक की यादें कहीं गायब हो गई, जैसे तैसे दिन कट जाते, कभी वह जिंदगी की मोहताज होती तो कभी मौत की, कभी बर्तनों के ढेर और कभी दो वक्त का खाना, बस यही थी उसकी जिंदगी, कोई भी वक्त हो दीपक के बचपन और उसके पति की यादें उसका सहारा बनते l

सारा काम खत्म होने के बाद वो घर के बाहर बने बरामदे मे जाकर लेट गई, तभी नकुल गेट से ही चिल्लाते हुए अंदर आया, "दादी अम्मा, दादी अम्मा", बूढी दादी भी 4 साल के पोते को देख जी उठती की मानो उनका दीपक आगया हो l दादी प्यार से नकुल को गोद मे ले के बैठ गई और उसकी बलैया लेने लगी कि तभी सुमन आई और नकुल का हाथ पकड़ कर अंदर ले चली गई l सुमन ने नकुल को खाना दिया और कहा, "जा दादी को दे कर आ "खाना देख के नकुल बोला, "माँ, दादी ऐसा खाना क्यूँ खाती है?, तो सुमन ने झल्लाहट मे कहा," बूढे लोग ऐसा ही खाना खाते हैं, समझे, अब चुपचाप चला जा" l 

नकुल दादी को खाना देकर चला गया, दादी उठ कर खाने लगी, रात की बासी रोटी और सब्जी, जो भी बचता वो उसी के हिस्से मे आता, उसने कुछ निवाले गले से उतारे ही थे कि तभी आवाज आई, "अरे क्या करती हो?, इधर आओ, कोई नहीं देख रहा, ये लो खास तुम्हारे लिए लाया हूँ, गरमा गरम रसगुल्ले, कितनी भीड़ होती है उस भगवानदास हलवाई के यहां लेकिन तुम्हारे लिए ये क्या, कुछ भी कर लूँ ... और सुनो माँ को मत बताना" l

दादी हंसने लगी, तभी नकुल ने कहा, क्या हुआ दादी? तुम हंस क्यूँ रही हो?" l दादी की आँखें बिना कुछ कहे ही बह चलीं, पति की वो यादें अक्सर ही उसको हंसा के रुला जाती थीं, छुप छुप के उसके लिए नई नई चीज़ें लाना और ना जाने क्या क्या? नकुल दादी से कुछ नहीं बोला और चुप चाप चला गया, दादी ने बाहर खड़ी गाय को आधा खाना डाल दिया और फ़िर बैठ गईl

दिन ऐसे ही गुजर रहे थे। आज दीपक शहर से दो महीने बाद लौट रहा था, सुमन पति के लिए कई पकवान बनाने मे जुटी थी, नकुल दिन भर पापा पापा की रट लगाए था, आज दादी को भी ना भूख थी ना प्यास, शाम से देर रात हो चली थी दादी सो चुकी थी, तभी दरवाजे की घंटी बजी तो दादी ने दौड़कर गेट खोला और बेटे को गले लगा लिया, दीपक कुछ और कहता इस से पहले सुमन आकर बोली, "अरे माँ जी आप भी ना बेटे को यही खड़ा रखोगे, आओ सब लोग अंदर आराम से बैठो" l सुमन ने दादी को घूर कर देखा और चली गई l 

 दीपक भी खाना खाकर सोते हुए नकुल के पास जाके लेट गया वो सोने ही वाला था कि मां के कराहने की आवाज आई, दीपक दौड़कर गया, माँ उसे देख कर रोने लगी, दीपक ने भरे गले से कहा," क्या हुआ माँ?" माँ ने कुछ भी नहीं कहा और दीपक ने माँ का सिर अपनी गोद में रख लिया और थप थपाने लगा कुछ ही देर बाद वो गहरी नींद में सो गई थी, अब वो बिल्कुल ठीक थी और आजाद भी, तभी तेजी से आती हुई गाड़ी एकदम रुकी तो खिड़की पर खड़ी सुमन का ध्यान टूटा और तभी नकुल ने आवाज लगाई, "मां जल्दी करो, खाना खा कर बाहर आओ वृद्ध आश्रम की गाड़ी आ गई है" l सुमन कमजोर घुटनों से रुक रुक कर खाने के पास आई पर एक निवाला भी उसके अंदर ना गया, वो बाहर आने लगी, बेटा नकुल और बहू गेट पे खड़े दो आदमियों से बातें कर रहे थे और दूसरी तरफ खड़ी गाय एकटक सुमन को देख रही थी l

सुमन चुप चाप गाड़ी मे बैठ गई और शीशे मे देखने लगी l आज उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू भरे थे बूढ़ी सास का चेहरा उसे आज अपने चेहरे मे साफ दिखाई दे रहा था l


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