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chandraprabha kumar

Classics Inspirational

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chandraprabha kumar

Classics Inspirational

पृथ्वी से प्राप्त शिक्षा-१

पृथ्वी से प्राप्त शिक्षा-१

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  पृथ्वी सहनशीलता की प्रतीक है। तेल के गहरे कुएँ खोद कर , विस्फोटों ,प्रदूषण आदि से पृथ्वी पर निरंतर आघात होते रहते हैं, व्यापारिक लाभ के लिए हरे भरे जंगल काट लिए जाते हैं जिससे भूमि बंजर बनती है। युद्ध में लड़ने वाले सिपाहियों के रक्त से पृथ्वी सन जाती है। इतने उत्पातों के बाद बावजूद पृथ्वी जीवों को सारी सुविधाएँ प्रदान करती जाती है। इस तरह मनुष्य पृथ्वी का अध्ययन करके सहने की कला सीख सकता है। 

   अवधूत दत्तात्रेय कहते हैं कि मैंने पृथ्वी से उसकी धैर्य की , क्षमा की शिक्षा ली है। लोग पृथ्वी पर क्या क्या उत्पात नहीं करते ; परंतु वह न तो किसी से बदला लेती है और न रोती चिल्लाती है। संसार के सभी प्राणी अपने अपने प्रारब्ध के अनुसार चेष्टा कर रहे हैं ,वे समय समय पर भिन्न- भिन्न प्रकार से जान या अनजाने में आक्रमण कर बैठते हैं ।धीर पुरुष को चाहिए कि उनकी विवशता को समझे , न तो अपना धीरज खोवे और न क्रोध करें।अपने मार्ग पर ज्यों का त्यों चलता रहे।

   अवधूत दत्तात्रेय कहते हैं कि पृथ्वी के विकार पर्वत और वृक्ष से मैंने पर सेवा अर्थात परोपकार की शिक्षा प्राप्त की है।पर्वत और वृक्ष के सारी चेष्टाएँ दूसरों के लिए ही होती हैं ।यहाँ तक कि इनका जन्म ही परहित के लिए होता है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य को अपना जीवन परहित के लिए रखना चाहिए । पर्वतों से गंगा आदि विभिन्न नदियॉं पर हित के लिए ही बहती हैं।विशाल पर्वतों में अपार मिट्टी रहती है, जिसमें असंख्य प्रकार के जीवन-वृक्ष, घास, पक्षी, पशु- पलते हैं । झरने तथा नदियों के रूप में पर्वत प्रचुर मात्रा में जल भी प्रदान करते हैं, जो सबों को जीवन देता है। पर्वतों से मनुष्य को सब जीवों को सुख देने की कला सीखनी चाहिये। 

   वृक्षों का प्रत्येक फल फूल ,काष्ठ आदि पर हित के लिए ही होता है। स्वयं का कोई स्वार्थ नहीं है। वृक्ष हमें शीतल छाया तथा औषधियों के रस प्रदान करने वाले है। जब वृक्ष को सहसा काट डाला जाता है,और घसीटा जाता है, तो वह विरोध नहीं करता, अपितु ईन्धन के रूप में अन्यों की सेवा करता है। इस तरह मनुष्य को वदान्य वृक्षों से सदाचार के गुण सीखने चाहियें। 

    नदियॉं अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपना फल स्वयं नहीं खाते।मेघ परोपकार के लिए ही जल बरसाते हैं। सुभाषित है- 

   “पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः

   स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।

   धाराधरो वर्षति नात्महेतोः

    परोपकारी सतां विभूतयः॥”

 परोपकार के लिए ही सत्पुरुषों का जीवन होता है। 



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